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सुधा शर्मा की हास्य-व्यंग्य कविता : सब्जी का शोरूम

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सब्जी का बहुत बड़ा शोरूम खुला था,
वेजिटेबिल शोरूम ज्वैलर्स शॉप की नकल था.
काउंटर पर छोटा सा धर्मकॉंटा लगी था,
शोरुम के गेट पर पहरेदार खड़ा था .
       कांच के शोकेस में माल रखा था,
       सभी पर रेट का लेबल जड़ा था.


भिंडी हजार रूपए तौला 
,घीया पर डिस्काउंट चला था.
प्याज आउट आफ स्टॉक ,
अरबी के भाव से दिल दहला था.
       करेला पहुंच से बाहर था,
       टमाटर, आलू पर खुला ब्लैक चला था.


कटहल के रेट सुनकर
सिर चक्कर खा रहा था.
हरी मिर्च और धनिया,
बढ़  चढ़कर मुंह चिढ़ा रहा था.
       मैंने थैले को  तह बनाकर,
       शर्म से चुपचाप रख लिया.
     सब्जी खरीदने के जुगाड़ पर
    मन ही मन विचार किया.
शोरुम के बाहर खड़ा होना भी,
औकात से बाहर नजर आ रहा था.


          सोचा बैंक में जाकर ,
          लोन के लिए अर्जी दूंगी.
         फल व सब्जी के लिए ,
          एक लाख का लोन लूंगी.
लोन का फार्म पढ़,
बैंक मैनेजर ने बुलाया.
ऊपर से नीचे तक देखा.
और मेरी हैसियत का जायजा लगाया.
          बोला तू मुझे उल्लू बना रही है
           प्याज,फल खाने के सपने सजा रही है.


सब्जी खाकर तू लोन,
हजम कर जाएगी.
ब्याज तो दूर,
तू मूल भी नहीं चुकाएगी.
        सब्जी के लिए लोन कैसे चुकाएगी
        ये सोचकर डरते हैं.

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