राजेन्द्र नागदेव की कविताएँ

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जहर 
     
बहुत दूर तक नहीं जाना है
आसपास ही देखना है
बगल में सहमी-सहमी खड़ी हवा को छूना है
समझने  के लिए कि जहर क्या होता है

आभार किसी का कि हम जीवित हैं अभी तक
अभी तक मुर्गियाँ  दे सकती हैं अण्डे    
चूजों के साथ चुग सकती हैं दाने
अभी तक बकरियाँ  चर सकती हैं हरी घास
अभी तक चिड़िया सकोरे से पी सकती है पानी
क्योंकि मुर्गियों, बकरियों, चिड़ियों की कोई विचारधारा नहीं होती

अभी तक डरे हुए-से ही सही
बैठ सकते हैं बरामदे में
चाय के साथ पीते हुए अखबार
जबकि, हम नहीं जानते
अखबार के पीछे की हवा
कब हथियार में बदल जाए

कल दूर वह जो धब्बा-सा था वहाँ
काले बवंडर में बदल गया है

चिड़ियों, मुर्गियों, बकरियों तक को
हो जाना चाहिए सावधान
कोई विचारधारा उनके लिये भी गढी जा रही होगी कहीं
लिखी जा रही होगी उनके लिये आचार-संहिता।
*                  *               *               *
                                                

  

बिका हुआ घर
         

एक चील की छाया अभी-अभी ज़मीन पर चलती हुई
छत पर चढी
फिर जमीन पर दूसरी तरफ उतर
पेड़ों के झुरमुट में समा गई

अब वहाँ कोई नहीं रहता
जाने किसने, जाने कब
जाने किनके लिए बनाया  होगा मकान
जो अब उम्र के आखिरी दौर  में है
और कभी भी अपनी ज़मीन के साथ खरीद लिया जाएगा

लगता है चील कोई आत्मा है
मकान कभी इसका घर रहा होगा
कई संबंध कोई संबंध न रहने पर भी टूटते नहीं
जलते नहीं पिघलते नहीं,
नहीं रहा मकान आदमी के अंदर रहता है

सहज नहीं होता
बचपन, यौवन और बुढापा
किसी घर-आंगन में छोड़ बिना मुड़े निकल जाना
गोबरलिपी ज़मीन की गंध
खपरैलों में बसे घोंसलों में गोरैया के अण्डे
दरकती दीवारों में गुमसुम पड़ी कितनी ही स्मृतियाँ
एक भरापूरा संसार कल दब कर ज़मीन पर बिछ जाएगा
आकाश तक फैली इमारत की नींव बन

बरसों बाद कोई आएगा कुछ ढूँढता हुआ
पूछेगा यहीं तो था मेरा घर
दिखाई क्यों नहीं देता?
*                  *                   *  

          राजेन्द्र नागदेव
                                        डी के 2 – 166/18, दानिशकुंज
                                        कोलार रोड, भोपाल- 462042
              फो 0755 2411838   मो 8989569036     

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