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प्रभा मुजुमदार की कविताएँ

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वजूद

मैं एक प्यादा

शतरंज की बिसात पर

बिछाया हुआ

शहादत के लिये

किन किन के

निहित स्वार्थों की

पूर्ती के लिये

शह और मात की

कुटिल चालों में

ढाल की उपयोगिता लिये.

मैं भीड का एक हिस्सा

कभी तालियां बजाने

तो कभी

पत्थर फेकने को

उकसाया जाने के लिये.

मैं एक ग्राहक

विज्ञापनों के मायाजाल में

ठगा जाने के लिये

हीरे की पैकिंग में

पत्थरों को बटोर लाने के लिये.

मैं एक नागरिक

आंकडों के मोहक जाल में

बहलाये जाने के लिये

आश्वासनों और

दिवास्वप्नों के लोक में

विचरने के लिये.

मैं एक अनुगामी

गेन्द की तरह

कभी इस

तो कभी उस पाले में

फेंके जाने के लिये

मैं एक श्रोता

जब तब

जिस तिस के द्वारा

सम्बोधित किये जाने के लिये

मैं एक वोटर

वक्त बेवक्त के चुनावों के लिये

मैं एक दर्शक

आपके कार्यक्रमों की

टी.आर.पी. बढाने के लिये.

 

अव्यवस्था में

समेटने को पडी है

बडे दिनो से

अस्त व्यस्त हुई अल्मारियाँ

बरसों पहले खेले गये

खिलौने

किसी की चाभी गुम

किसी का रिमोट

कुछ गोटियाँ

पहिया टूटी गाडियाँ

पुराने फैशन के हुए

या छोटे पडते कपडे

धूल जमी किताबें

पीली मटमैली

कॉपी और डायरियां.

घिसे और खरोंच लगे बर्तन

एक्सपायरी डेट निकली

दवाईयां

उधडे हुए स्वेटर

बंध टूटी चप्पल

अरसे से नही देखी गई अलबम.

बेकार पडे कैसेट्स

अधूरी लिखी चिठ्ठियां.

कही से भी

किया जा सकता है आरम्भ

शुरु की जा सकती है सफाई

घर के कोनों/ अंतरों को

चमका देने के

संकल्प और ऊर्जा से भरी थी मैं

मगर जड सी हो जाती हूँ

यादों का एक एक पल

गूंथा है

निर्जीव और बेमानी लगती

इन सब चीजों से.

जिंदगी के तमाम खुशनुमा पल

अपने मीठे अहसास, खुशबू

और गुदगुदी के साथ.

गुस्से, झगडे, शिकायतें

और मान-मनौव्वल

चलचित्र की तरह

स्मृतियाँ कैद कर लेती है.

यह मेंरा तहखाना

अपना खुद का कोना

छूट जाता है बार बार

गहमागहमी में.

मुट्ठी से जैसे

फिसलते जा रहे सारे अहसास

मैं भींच लेती हूं इन्हें

खालीपन के डर से.

 

वक्त मिलने पर

किसी दिन

जब वक्त मिलेगा मुझे

पूरी करुंगी अपनी कविता

अधूरी पडी किताब

जिसके चरित्र

वक्त बेवक्त पीछा करते है

तथ्य और विमर्श

जो मथते हैं अकेला पाकर

थोडी देर ही सही

मैं उनसे रुबरु होना चाहती हूँ.

किसी दिन

जब वक्त मिलेगा मुझे

देखूंगी आइने में अपने को

पहचान सकूंगी शायद तब

आँखों के नीचे की झांईयों

सफेद झडते बाल

झुर्रियों के जाल

और चर्बी की जमा हुई

पर्तो के पीछे का

बरसों पुराना चेहरा.

समझ पाउंगी तभी

समय के इस अंतराल में

क्या खोया है मैंने

क्या पाया है मैंने.

किसी दिन

जब वक्त मिलेगा मुझे

तो छेडूंगी अपनी पसन्द का राग

धूल से अटे

इसी साज से निकलेगी

पहचानी सी कोई धुन

गुनगुनाउंगी

थिरकूंगी अरसे बाद

शायद बाकी हो

थोडी सी नादानी

मासूमियत और बेपरवाही

निष्पाप हँसी

सिर्फ दोस्ती के लिये दोस्ती

तृप्ती के लिये किये

ढेरों काम.

किसी दिन वक्त मिलेगा

वक्त मिलेगा

तो जरुर पढूंगी

धुन्धलाती इबारतों को

पुराने पत्रों और डायरियों में

दोहराऊंगी

उन बातों को मन ही मन

जो कभी रुलाती थी

हंसाती गुनगुनाती थी.

कैसी होगी अनुभूति अब

बीते पन्नों को

पलटाने पर.

किसी दिन

जब वक्त मिलेगा मुझे

आँख मूंद कर

सोचूंगी यही सब.

--

(ऊपर का चित्र - दिवाकर खानोरकर की कलाकृति)

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