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प्रदीप कुमार साह की कहानी - त्याग और प्रेम

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एक समय किसी गाँव के समीप एक सुन्दर सरोवर हुआ करता था. सरोवर के पास छोटा सा एक पवित्र मंदिर था. उसी मंदिर के पास अत्यंत वृद्ध किंतु परम परोपकारी सन्यासिनी झोपड़ी में रहती थी. उनके पास नित्य बहुत से लोग अपनी समस्याओं के निराकरण हेतु आते थे.

एक दिन एक समृद्ध युवा दंपत्ति आकर उनसे कहने लगे कि उन्हें सुख और शांति का अनुभव नहीं होता. कारण पुछने पर पत्नी ने कहा कि उसका पति उससे उतना प्रेम नहीं करते जितना वह करती है. पति का शिकायत भी वही था.

उनकी बातें सुनकर वृद्ध सन्यासिनी थोडी देर कुछ सोचती रही . फिर उनसे सामने सरोवर से एक कमल -पुष्प लाने को कहा. दंपति पुष्प लेने चल दिये. पति पुष्प लेने के लिये सरोवर में गया तो दलदल में फँस गया और पत्नी से मदद मांगने लगा. पत्नी इधर-उधर देखने लगी कि कोई मदद मिल जाये. परंतु वहाँ कोई नहीं था. अचानक उसकी दृष्टि एक लता पर गयी और वह लता लाकर उसकी एक सिरा पति के तरफ दिया और पति से उसे पकड कर बाहर आने के लिये कहा. किंतु लता की वह रस्सी छोटी थी जो उस तक पहुँच नहीं रहा था. किंतु पत्नी आगे बढकर उस सिरा को पति तक पहुँचाना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे डर लग रहा था कि वह भी पति के तरह दलदल में फॅस न जाए. पति उत्तरोत्तर दलदल में अंदर धँसता जा रहा था पर वह बिल्कुल भी हिम्मत बटोर नहीं पा रही थी. ऐसा देखकर वृद्ध सन्यासिनी आगे बढकर लता की सिरा पति तक पहुँचाया तो उस पत्नी की हिम्मत भी बंधी. जब पति लता के सहारे दलदल से बाहर निकला और पत्नी पर क्रोध से चिल्लाने लगा तब वृद्ध सन्यासिनी ने उन्हें शांत किया. अब वृद्ध सनयासिनी के सामने पुष्प न ला पाने के कारण लज्जित युवा दंपत्ति खड़े थे.

सन्यासिनी ने पति को संबोधित कर कहा कि वह कुछ भी काम करने से पहले संयम से अच्छी तरह सबकुछ सोच समझकर भावी योजना बनाया करे. संयम क्रोधादि दुर्गुणों को हटाकर और सद्गुण का विकास कर पाया जा सकता है. इसलिए वह सद्गुणों के विकास का नित्य अभ्यास करे और क्रोध न करे. सभी से प्रेम करे.

पुनः पत्नी से कहा कि तुम्हारे पास प्रेम तो बहुत है किंतु त्याग नहीं. त्याग के बिना प्रेम निष्प्राण है. त्याग के भाव के बिना हिम्मत पैदा नहीं हो सकता. हिम्मत जीवन का सबसे बड़ा ऊर्जा सूत्र है. इसके बिना कोई भाव, कोई विचार कार्यरूप में नहीं बदलता. इस तरह तुम्हारा प्रेम भी त्याग के बिना वाह्यरूप में प्रकट होने से रह जाता है. साथ ही त्याग सभी गुणों का मुल है और त्याग के गुण भी समस्त लोभादि दुर्गुणों पर नियंत्रण पाने पर आता है.

अपनी कमियों को स्वीकारते हुए उस युवा दंपत्ति ने अत्यंत लज्जित होकर एक दूसरे से माफी मांगी. फिर वृद्ध सन्यासिनी को अपने दुर्गुण त्यागने का वचन दे कर विदा मांगा.

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