सोमवार, 9 नवंबर 2015

व्यंग्य कविताएँ || महेश संतुष्ट



आदमी

भीड़ के आवागमन में
भीड़ का अंश हो गया - आदमी
लगता है लम्बी भीड़ में
भेड़ हो गया है आदमी

भयंकर रेल दुर्घटना के बाद
बिखरी हुई लाशों की
शिनाख्त कर भारी भीड़ में
एक एक कर छंट गया है आदमी

मुर्दे की अर्थी पर
मरघट तक आँसू बहाकर
अपने हिस्से की तलाश में
खो गया है आदमी

शादी, जश्न, जलसे एवं
भीड़ की अन्य किश्तों में
निमंत्रण पत्र की तरह
औपचारिकता का शिकार हो गया - आदमी

कानून कचहरी में
एक दरख्वास्त के बाद
हस्ताक्षर के लिए, कागज और
कैलेंडर की आखिरी तारीख हो गया आदमी।

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महेश संतुष्ट के व्यंग्य कविता संग्रह - कैलेण्डर की आखिरी तारीख से साभार

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