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सागर जख्मी की प्रेम कहानी–वो बेवफा थी

वो बेवफा थी

दोस्तों बात उन दिनों की है जब मैं पेशे से अध्यापक था ।

सुबह का वक्त । घड़ी में लगभग साढे सात बजे हैं। भगवान भानु तमराज की सेना को पराजित कर कुशल पूर्वक नभ में निकल आये हैं। काम काजी महिलायें अपनी घरेलू कार्यों में व्यस्त हैं। किसान अपने खेतों की तरफ जा रहे हैं। आंगन में पक्षियों की चहचह्आहट सुनायी दे रही हैं।

चाय नाश्ता करके मैं खुशी मन से मैं कालेज पहुंचा । ऑफिस में घुसते ही मुझे टीचर स्टाफ में एक नया चेहरा दिखलायी पड़ा।

गोरा रंग । काले केश । साधारण कपड़े । विषाद रहित पर ,तेज युक्त मुख मण्डल । उम्र लगभग 22 - 23 वर्ष । कद लगभग 5-6 इंच ।

मैनेजर सर की आवाज ने मेरा ध्यान भंग किया, ‘‘ प्रिय अध्यापक बन्धु! ये हैं मिस ज्योति जी । आज से आप लोगों के साथ ही अध्यापन कार्य सम्भालेगी मुझे आशा नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास हैं कि इन्हें इनके हिस्से की इज्जत अवश्य मिलेगी।‘‘ मैनेजर सर का भाषण सुनने के पश्चात सभी टीचर अपने - अपने क्लास में चले गये (मैं भी) । अब रोजाना स्कूल पहुंचते ही सर्वप्रथम मैं ज्योति जी को नमस्कार करता तत्पश्चात किसी दूसरे काम को अन्जाम देता । वे भी बे झिझक में भावनाओं की कद्र करती थी। उनकी इन्हीं अदाओं का तो मैं कायल था। समय पंख लगाकर उड़ता गया और हम दोनों एक दूसरे के पक्के मित्र बन गये। ज्योति अपने दिल की हर बात मुझसे कहती (सिर्फ वही बातें जो कहने योग्य होती थीं) और मैं उनसे । हम दोनों की पक्की दोस्ती देखकर अध्यापक वर्ग के कुछ लोग हम शक करने लगे थे कि हमारे और ज्योति जी के बीच में कुछ चल रहा हैं। उनमें से मुख्य थीं कुमारी रोशनी जी । नाम के विपरीत ही उनका का था। वे कुछ झगड़ालू स्वभाव की थी ।

एक दिन रोशनी जी को कालेज आने में काफी देर हो गयी । सुबह से उन्हें न देख पाने के कारण मैंने उनसे पूछा,‘‘ आज सुबह से आप दिखलाई नहीं पड़ी। कहॉ थी आप? ‘‘

‘‘ हां भई , अब हम आपको कैसे दिखलायी पड़ेगें आजकल तो आपकी निगाहें किसी दूसरे फूल पर टिकी हुई हैं।‘‘

मैं कभी सपने में भी सोच सकता था कि एक दिन रोशनी इतनी नीचे गिर जायेगी कि हम पर झूठा इल्जाम लगायेगी । रोशनी की व्यंग्य भरी बातें सुनकर मेरी ऑखें लाल हो गयी । मेरे सामने कोई मेरे अजीज दोस्त की बुराई करे और मैं चुपचाप सुनता रहॅू , यह कैसे हो सकता था । मैंने आव देखा न ताव पलट कर रोशनी को जवाब दिया , ‘‘ अपनी जबान को लगाम दीजिए रोशनी जी। आप जैसा समझ रही है वैसा कुछ भी नहीं है हमारे बीच । हम दोनों सिर्फ सच्चे दोस्त है इसके सिवा कुछ भी नहीं। संसार में कोई भी इन्सान बुरा नहीं होता है बुरी तो हमारी अपनी निगाहें होती हैं जिनको दूसरों के गुण नहीं बल्कि अवगुण दिखाई देते हैं। अगर आज के बाद आपने हमारे पवित्र रिश्ते के बारे में कुछ भला बुरा कहा तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा । ‘‘

मेरे तमतमाते चेहरे को देखकर शायद रोशनी मेरे अन्दर चल रहे तूफान को भॉप गयी और पराजय स्वीकार करने के स्वर में बोली , ‘‘ माफ कीजियेगा सागर जी , मुझसे भूल हो गयी । दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी । ‘‘ यह कहते हुये रोशनी आफिस में चली गयी।

रोशनी और मेरे बीच हुई वार्तालाप की खबर जब ज्योति जी के कानों तक पहुंची तो उन्होंने मुझसे पूछा , ‘‘ मैं आप से इक बात पूछूं? ‘‘

‘‘क्यों नहीं, अवश्य पूछिये । ‘‘

‘‘ सुबह रोशनी क्या कह रही थी ? ‘‘

पहले तो मैं कुछ हिचकिचाया लेकिन बाद में सारी हकीकत बयां कर दिया । मेरी बाते सुनकर ज्योति जी की ऑखें भर आयी उन्होंने मुझसे कहा,‘‘ अगर मुझे पहले से ही पता होता कि आपके कालेज में ऐसा नाटक होता है तो मैं यहां पढ़ाने ही नहीं आती हैं।‘‘ सदैव हंसने वाले चेहरे पर विषाद की गहरी रेखा देखकर मेरा दिल चाक हो गया । अपने अजीज दोस्त को दुःखी दोस्त को देखकर मैं अपने आप को सम्भाल ना पाया मेरी ऑखें भर आयी अपने आसुओं को छिपाते हुये मैं ऑफिस में चला आया ।

जब से ज्योति जी से मेरी दोस्ती हुयी है मैं खुद को कुछ बदला - बदला सा देख रहा हॅू । अगर कोई शख्स मेरे सामने ज्योति जी की बुराई करता है तो मेरे अन्दर भूचाल सा आ जाता है। जी चाहता है कि कहने वाले का सर कलम कर दूं ।

शाम को बैठा मैं अपने हालात पर मैं इक गजल लिख रहा था -

‘‘ दर्द भरी बात न पूछो ,

कैसे है हालात न पूछो ।

तनहाई के इस आलम में,

कैसे कटती रात न पूछो।। ‘‘

अभी गजल के मिसरें पूरे भी न हो पाये थे कि मेरे एक पुराने मित्र का आगमन हुआ। उनकी नजर मेरी डायरी पर पड़ी। डायरी के कुछ पन्ने पलटने के बाद उन्होंने मुझसे कहा,‘‘ सागर जी , अब तो आप गये काम से ।‘‘

‘‘ वो कैसे ? मैंने पूछा ।

‘‘ क्यूंकि आपको इश्क हो गया है।‘‘

मित्र की बाते सुनकर मेरी नजरे शर्म से झुक गयी लेकिन मैंने अपने मित्र की बातों को हवा में उड़ा दिया । क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी एक छोटी सी गलती मुझसे मेरा एक अजीज दोस्त छीन लें । मैं ज्योति जी से कितना प्यार करता हॅू बयां करने के लिए अल्फाज नहीं मिलते।

ज्योति जी से दोस्ती हुये मुझे इतने दिन हो गये लेकिन मैंने आज तक उनसे यह न पूछ पाया था कि आप कहा तक पढ़े हैं। अगले दिन जब मैं कालेज पहुंचा तो ज्योति जी का मुखमंडल मुझे कुछ मुरझाया सा लगा मैंने सवाल दागा ,‘‘ आज आप इतनी उदास क्यों हैं? किसी ने कुछ कहा है क्या ? ‘‘

‘‘ आपसे ये किसने कहा ,मैं कहां उदास हूं। उदास तो आप ही दिख रहे है। ‘‘

उनमें अपने लिये इतना अपनत्व देख कर मैं सीधे मुद्दे पर आ गया ।

‘‘ कि आप कहां तक पढ़ी हैं ? ‘‘

‘‘ मैंने समाजशास्त्र से एम0ए0 किया हैं। लेकिन आज आप मुझसे ये सब क्यों पूछ रहे है ? ‘‘

‘‘ क्योंकि मैं आप पर इक कहानी लिख रहा हूं।

‘‘ क्या आप कहानी भी लिखते हैं ? ‘‘ ज्योति जी ने चौंक कर पूछा।

‘‘हॉ ,सिर्फ कहानी ही नहीं बल्कि गीत,गजल, कविता, उपन्यास,दोहे,इत्यादि भी लिखता हूं। क्या आपको इन चीजों में दिलचस्पी हैं? ‘‘

‘‘नहीं‘‘ ज्योति जी ने मेरी आशा के प्रतिकूल उत्तर दिया ।

‘‘फिर भी मैं आपकी रचनाओं को पढना चाहूंगी।

उन्होंने हंसते हुये जवाब दिया।

अचानक मौसम में परिवर्तन हुआ आधी आ गयी और कालेज की छुट्टी हो गयी। और कालेज ये घर आने के पश्चात रात भर मुझको नींद नहीं आयी। मैं सिर्फ यही सोचता रहा कि मैं ठहरा एक प्रेम रचनाकार और मेरी हर रचनायें प्रेम पर आधारित होती है मेरी रचनाओं को जब ज्योति जी पढे़गी तो मुझे न जाने कैसा इंसान समझेगी । यही सोचते - सोचते सुबह हो गयी ।

अगले दिन जब मैं कालेज पहुंचा तो ज्योति जी ने मेरा कहानी संग्रह को वापस करते हुये कहा,‘‘ सागर जी , आपकी हर एक कहानी मेरे दिल को छू गयी। ‘‘

‘‘ धन्यवाद । ‘‘

मैंने आपके पुस्तक के पिछले पृष्ठ में मैंने आपके लिये कुछ लिखा हैं। घर जाकर पढ लिजियेगा । ‘‘

ज्योति जी ने मुस्कुराते हुये कहा ।

घर जाकर जब मैंने अपनी यह पुस्तक खोली तो हैरान रह गया पुस्तक के एक पृष्ठ पर लाल स्याही से लिखा था ,‘‘ मेरी लाईफ के सबसे खास दोस्त आप ही हो । मुझे आपकी बातें तो अच्छी लगती ही है लेकिन उससे कहीं अधिक ज्यादा आपकी ऑखें अच्छी लगती हैं।‘‘

यह पंक्ति पढ़ते ही मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयी मेरी ऑखों से अश्रुधारा बहने लगी मैंने खुदा का शुक्रिया अदा किया क्योंकि जिन्दगी में माता - पिता के बाद पहली बार किसी ने मुझे अपना समझा था।

अगले दिन कालेज के ऑफिस में मैंने उनसे कहा एक हफ्ते के अन्दर ही गर्मी की छुट्टी होने वाली हैं, कालेज बन्द हो जायेगा । और हम दोनों एक दूसरे से बिछड़ जायेंगे। आपके बिना मैं जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता मेरी ऑखें भर आयी ।

‘‘ ऐसा क्यूं सोचते हो कि कोई हो रहा है जुदा ,

ये क्यूं नहीं सोचते कि वो दे रहा है यादें सदा के लिये । ‘‘

उन्होंने मुस्कुराते हुये कहा। क्लास अटेन्ड करने का समय हो गया था। हम दोनों अपने - अपने कमरे में चले गये ।

धीरे - धीरे वक्त गुजरता गया आज कालेज में अध्यापक और बच्चों का आखिरी दिन है । खुद को ज्योति जी से जुदा होते देख मेरी ऑखें ऑसुओं से भर गयी । ज्योति जी से मैं कितना प्यार करता हूं लफ्जों में बयां नहीं कर सकता । मेरा गमगीन चेहरा देखकर मैंनेजर और सोहन सर ने मुझसे सवाल किया कि, ‘‘सागर जी आज आप बहुत परेशान लग रहे हैं । ‘‘

‘‘ नहीं सर , ऐसी कोई बात नहीं है मैंने अपनी आंखों को पोंछते हुये कहा । वेतन का हिसाब होने के बाद सभी अध्यापक अपने घर जाने लगे मैं एकान्त में बैठा रो रहा था । ज्योति जी मेरे पास आयी और कही ,‘‘सागर जी ! मैं आपसे आखिरी मुलाकात करने आयी हॅू अब मुझे घर जाने की आज्ञा दीजिए। ‘‘

ज्योति जी की बात सुनकर मैंने अपना गमगीन सर उपर उठाया और उनके भोले चेहरे को निहारते हुये कहा,‘‘ ज्योति जी ! जाने वालों को आज तक कौन रोक पाया हैं लेकिन जाते - जाते आप मुझपर एक एहसान करते जाइए। मुझे अपना एक छायाचित्र देती जाइए। आज के बिछडे न जाने कभी मिलेंगे या नहीं मैं अपने पहले प्यार को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता ।‘‘

इतना कह कर मैं फफकर रो पड़ा । मुझे तड़पता देखकर उन्होंने कहा,‘‘सागर जी! जाते वक्त मैं आपको एक सच्चाई बता देना चाहती हूं ।

‘‘कहिए। ‘‘

मैंने अपने ऑसू पोंछते हुये कहा।

‘‘ मैं आप से प्यार वार नहीं करती मैंनें तो आपसे छोटा सा मजाक किया था। ‘‘

इतना कहकर उन्होंने अपना मुंह फेर लिया और अपने घर का रास्ता लिया। मैं रोता हुआ अपने घर आया और खाट पर मुंह ढाप कर खूब रोया। अचानक मैंने एक आवाज सुनी जो मेरे दिल से आ रही थी ,

‘‘ वह बेवफा थी ------- वह बेवफा थी ।‘‘

‘‘रात जगे दिन को सोए,

अपनी किस्मत पे रोए।

इश्क किया बरबाद हमें,

सब कुछ पाकर भी खोए।।

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सागर यादव

8756146096

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