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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - मरे नहीं सुधरने वाले ये मनहूस हरामखोर

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इंसान जिन तत्वों से बना होता है उन्हीं के स्वभाव, गुणधर्म और व्यवहार का परिचय वह अपने जीवन में देता है और इन्हीं के आधार पर वह जाना-पहचाना जाता है।

इंसान के रूप में परमात्मा सभी आत्माओं को पूरी शुद्धि और मौलिकता के साथ भेजता है लेकिन सांसारिक ऎषणाओं, क्षुद्र स्वार्थों और स्वेच्छाचारी उन्मुक्तता के साथ पुरुषार्थहीनता के भंवर में फंस कर वह अपनी मौलिकता खौ बैठता है, मनुष्य स्वभाव को तिलांजलि दे देता है और उसका स्वभाव क्रूर हो जाता है, व्यवहार आत्मकेन्दि्रत होकर रह जाता है।

बहुत बार पूर्वजन्म की पशुता और हिंसा, क्रूरता और श्वान वृत्ति भी इसका बड़ा कारण होती है। ऎसे इंसान के मुखमण्डल को जरा गौर से देखें तो किसी न किसी राक्षस या हिंसक जानवर की प्रतिच्छाया जरूर दिखेगी ही।

इन लोगों का पूरा का पूरा जीवन येन-केन-प्रकारेण संग्रह और भोग-विलासिता प्रधान होकर रह जाता है।  इंसान के रूप में पैदा होने के बाद अपने आपको इंसान बनाए रखना दुनिया का सबसे कठिन काम है और ऎसा करने वाले बिरले ही होते हैं।

अन्यथा अधिकांश लोग मनुष्य के भीतर समाहित ऊर्जा, शक्ति और सामथ्र्य से नावाकिफ होकर मामूली स्वार्थों और विलासिता के जंगलों में भटक जाते हैं। बहुत सारे लोग परिश्रम से जी चुराने वाले होते हैं इसलिए पराये संसाधनों और सम्पत्तियों के सहारे जिन्दगी चलाने के आदी हो जाते हैं।

खूब सारे दूसरों के अनुचर बन जाते हैं और काफी संख्या में भीड़ ऎसी जमा हो जाती है जो हमेशा परायों से कुछ न कुछ पाने के लिए ललचायी रहती है। धरा पर जन्म लेने वाला कोई भी इंसान बुरा नहीं होता। उसे बुरा बनाते हैं उससे मिलने और चढ़ाने वाले लोग, जमाने की हवाएं और दिखावों की फैशन।

यह सब कुछ सदियों से चला आ रहा है और यों ही चलता रहेगा।  हमारा प्रयास अच्छी वृत्तियों के संरक्षण, संवर्धन और प्रोत्साहन का होना चाहिए ताकि समाज की नकारात्मकता का अंधकार समाप्त होकर सकारात्मक चिन्तन प्रधान कर्मों का उजियारा पसरता रहे, हर किसी को रौशन करता रहकर वांछित सुकून प्रदान करता रहे।

इन सभी प्रकार के झंझावातों के बीच हर कहीं अच्छे लोेगों में यह चर्चा आम होती है कि बहुत सारे लोग हैं जो अच्छे परिवारों और परंपराओं से ताल्लुक रखते हैं फिर भी नुगरे, नालायक और कमीन क्यों हैं, इन लोगों को जीवन की हकीकत, धर्म और सत्य आदि का भान क्यों नहीं होता, लूट-खसोट, लड़ाई-झगड़ों, छीना-झपटी, शिकायतों और षड़यंत्रों से तनाव और दुःख देने को ही जीवन क्यों समझते हैं, मुफ्तखोरी, हरामखोरी और पैशाचिक धूर्तता भरा स्वभाव क्यों है। बार-बार समझाने पर भी ये क्यों किसी की नहीं मानते।

आखिर क्यों ये लोग समाज के लिए घातक नासूर बने हुए हैं, इनमें सुधार की सारी संभावनाएं समाप्त क्यों होती जा रही हैं, इन नरपिशाचों और असुरों का कोई क्या करे ? आदि-आदि।

ऎसे बहुत सारे लोग सभी स्थानों पर कम-ज्यादा संख्या में विद्यमान हैं जिनकी वजह से सामान्य जनजीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता दिखता है और समाज दुःखी व पीड़ित रहता है। सब तरफ यही  यक्ष प्रश्न उभरता ही है कि आखिर ऎसा क्या है जो इन नुगरों में परिवर्तन की सारी संभावनाएं समाप्त हो गई हैं।

जो लोग समाज और देश के लिए जीते हैं और देश के लिए मर-मिटने का ज़ज़्बा रखते हैं उन सभी लोगों के चिन्तन का यह प्रमुख विषय हमेशा होता है।  इन सभी स्थितियों का मूल कारण यही है कि जिस इंसान की मौलिकता जीवित होती है उसी में इंसानियत के तत्व उपलब्ध रहते हैं।

जिस अनुपात में मौलिकता खत्म होती जाती है उस अनुपात में इंसान में सांसारिक गुणधर्म और स्वार्थ हावी होने लगता है। जैसे-जैसे इंसान अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए  जायज-नाजायज कामों, समझौतों और अपने को ऊपर उठाने के लिए हर हद तक गिरने का अभ्यास बना लेता है, शोर्ट कट तलाश कर औरों के अधिकार छीनने लगता है, अपने आपको शक्तिशाली बनाने के लिए दूसरों के संसाधन, सम्पत्ति और वैभव को हड़पने के लिए प्रयास करता है, उसकी मानवता समाप्त हो जाती है और उसका स्थान ले लेती है व्यवसायिक भावना, जो मर्यादा छोड़ दिए जाने पर लूट-खसोट, ब्लेकमेलिंग और हड़प लेने की आदत में बदल जाती है।

मनुष्य जब तक परिश्रम का खान-पान और रहन-सहन अपनाए रखता है तभी तक उसकी मनुष्यता और मौलिकता भी बरकरार रहा करती है। जैसे ही बिना परिश्रम का खान-पान और पहनावा, दूसरों के भरोसे आजीविका निर्वाह तथा रोजमर्रा की जिन्दगी की सारी व्यवस्थाएं औरों पर आश्रित होने लगती हैं, हम हर काम, उपभोग और संसाधन के लिए परायों से अपेक्षा करने लग जाते हैं, हराम की कमाई खाने लग जाते हैं, हराम की पीने के आदी हो जाते हैं, औरों को भय दिखाकर, दबाव डालकर तथा प्रलोभन दर्शा कर सब कुछ पराया ही पराया पाने और उपभोग लग जाते हैं, उस अवस्था में हमारे शरीर से अपने मौलिक ऊत्तक, कोशिकाएँ, रक्त और शरीर को संचालित करने वाले तमाम तत्व भी अपने न होकर पराये हो जाते हैं।

और यही वजह है कि अपनी जिन्दगी दूसरों के भरोसे चलाने के अभ्यस्त हो जाने के बाद हम किसी अंश में  अपने नहीं रहते। हमारी सोच, कर्म, स्वभाव और व्यवहार सब कुछ में इतना अधिक घालमेल हो जाता है कि यह महा मिश्रण का स्वरूप ले लिया करता है।

यही कारण है कि हम पूरी तरह बदल जाते हैं। इस अवस्था में आने के बाद हमारे भीतर किसी भी प्रकार का परिवर्तन आने की बातें बेमानी हैं क्योंकि जो कुछ पराया अपने जिस्म में जमा हो जाता है उसका पूरा का पूरा अंश शरीर से बाहर होने पर ही शुद्ध हुआ जा सकता है।

इस शुद्धिकरण के उपरान्त ही हमारी नैसर्गिक मनुष्यता और मौलिकता का पुनः जागरण और प्रतिस्थापन हो सकता है। और ऎसा होना संभव है ही नहीं क्योंकि जो इंसान एक बार हरामखोरी और परायी सम्पत्ति को पाने में रम जाता है, वह जीवन में सुधरने के सारे द्वार बंद कर देता है क्योंकि वह शुद्धिकरण के लिए कभी तैयार नहीं होता।

यह तभी संभव है जब कि उसकी देह भस्मीभूत हो जाए। फिर जो लोग हरामखोरी करते हैं उन पर पाप का बोझ इतना अधिक हो जाता है कि पाप की कमाई आने वाले कई जन्मों तक उन्हें मनुष्य नहीं होने देती।

यही ठोस वजह है कि जिसके कारण नुगरे और नालायक लोग जिन्दगी भर ऎसे ही बने रहते हैं। इन्हें सुधारने की कोशिश न करें, इनकी आयु का क्षरण और समापन ही इनका अंतिम और एकमेव ईलाज है। जो-जो लोग इस किस्म के हैं, उनके लिए भगवान से प्रार्थना करते रहिये। एक न एक दिन भगवान हमारी जरूर सुनेगा ही।

 

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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