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रामवृक्ष सिंह का आलेख - हिन्दी : क्या आपको कठिन लगती है?

भाषा-चिन्तन

अपनी-अपनी आसानी

डॉ. रामवृक्ष सिंह

भारत सरकार की राजभाषा नीति सरकार के श्रेणी तीन और उससे ऊपर के कर्मचारियों पर लागू होती है। राजभाषा विषयक सांविधिक प्रावधानों, राजभाषा अधिनियम, संकल्प और नियम तथा तत्पश्चात् राष्ट्रपति महोदय द्वारा जारी आदेशों का उल्लंघन करने पर दंड का विधान नहीं है। अलबत्ता बार-बार यह अवश्य कहा गया है कि राजभाषा नीति का अनुपालन प्रेरणा और प्रोत्साहन से होगा। जब प्रक्रियाएँ जटिल और दुरूह होती हैं तो प्रेरणा और प्रोत्साहन काम नहीं करते। अनुपालनकर्ता आसान रास्ते चुनने लगते हैं। जटिलता और दुरूहता वस्तु और प्रक्रिया-विशेष में भी हो सकती है और प्रयोक्ता के मन में भी। भारत सरकार की राजभाषा यानी हिन्दी के साथ भी यही सच है। विगत पैंसठ वर्षों में राजभाषा हिन्दी का जो रूप उभरकर सामने आया है उसका अपना वैशिष्ट्य है। इस वैशिष्ट्य पर चर्चा करना यहाँ अभीष्ट नहीं। अभीष्ट है सरलता और दुरूहता की मीमांसा।

हमने अभी-अभी कहा कि अनुपालनकर्ता आसान रास्ता चुनने लगते हैं। इसे एक दृष्टान्त से समझा जाए। यदि किसी चौराहे पर कोई गोल चक्कर बना हो और हमें वहाँ से यू-टर्न मारना हो तो हमारे लिए आसान क्या है? गाड़ी में बैठे लोग प्रायः ऐसे मौके पर अपेक्षाकृत अधिक चलते हुए, गोल-चक्कर के साथ-साथ न घूमकर, अपने दाहिने घूमते हुए पीछे गाड़ी घुमा लेते हैं। यही करना उनके लिए आसान पड़ता है। मैंने अच्छे-अच्छे लोगों को पार्कों की रेलिंग फाँदते देखा है, क्योंकि वे पार्क के फाटक तक जाने की जहमत नहीं उठाना चाहते। तो क्या आसानी का अर्थ जायज़ और न्यूनतम प्रयास से भी जी चुराना है? सही रास्ते जाना हो तो कई बार थोड़ा अधिक चलना पड़ता है, अधिक प्रयास करना पड़ता है। ज़रूरी नहीं कि आसान रास्ते चलकर हम सही-सलामत सही जगह पहुँचें। मसलन किसी ऊंचे भवन से नीचे उतरना हो तो बेहतर है कि सीढ़ी या लिफ्ट से उतरा जाए। किन्तु आसानी तो वहाँ से छलांग मारने में ही है। बिलकुल सीधे और जल्दी नीचे उतर आएँगे। लेकिन इस प्रकार उतरने में कितना बड़ा जोखिम है, यह भी तो देखिए। प्रकटतया यह कुतर्क लग सकता है, किन्तु इस बात में दम तो है।

हिन्दी को कितना सरल होना चाहिए? कैसी कर दी जाए तो हिन्दी सरल हो जाएगी? क्या सब लोगों के दूर बैठकर देखते रहने से हिन्दी सरल हो जाएगी? जिन लोगों को हिन्दी में काम करना है, वे कब तक हिन्दी के सरल होने का इन्तज़ार करते हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? यदि हिन्दी उनके हिसाब से सरल नहीं है तो क्या वे खुद इसे सरल बनाने में कोई योगदान करने का कष्ट करेंगे? अपने मन की बात तो वे ही जानते हैं। उन्हें क्या सरल लगता है और क्या कठिन, यह भी वे ही बेहतर जानते होंगे। तो क्या यह उचित नहीं होगा कि हिन्दी की कठिनता, जटिलता, दुरूहता आदि की सहस्रनामी माला जपते रहने के बजाय वे खुद ही अपने लिए सरल भाषा की ईज़ाद कर लें और उसे इस्तेमाल करें? क्या ऐसा करने के लिए उन्हें कोई रोकता है?

क्या आभरणहीन, सौष्ठव-विहीन, सरल, सपाट हिन्दी उन्हें रुचेगी? चलिए यह भी सही। तो क्या ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, भैषिकी, गणित, लेखा, वित्त, बैंकिंग, व्यापार, वाणिज्य, विपणन. शिक्षा, मनोविज्ञान, समाज-कार्य, समाज-शास्त्र, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में जो नित नई अवधारणाएं नित्य-प्रति, क्षण-अनुक्षण जुड़ती जा रही हैं, उनके लिए हमें कोई नए शब्द न तो अपनाने चाहिए, न सीखने चाहिए? बस कुछ गिने-चुने शब्द जो हमने बचपन में सीखे थे, उन्हीं से काम चला लेना चाहिए? यदि आसान शब्द की अवधारणा में नई संकल्पनाओं, नए शब्दों एवं नूतन अवधारणाओं को सीखने व अपनाने का निषेध निहित है, तो भी क्या हमें आसानी के प्रति आग्रहशील रहना चाहिए?

तो क्या हम निरन्तर सीखते रहने की सहज मानवीय प्रवृत्ति को ही सिरे से नकार देना चाहते हैं? राजभाषा हिन्दी के सन्दर्भ में आसान शब्द की मीमांसा करते हुए तो हमें यही प्रतीत होता है।

क्या हम अपने कार्यालयीन जीवन में नया ज्ञान अर्जित नहीं करते? भर्ती के समय हम सबके बौद्धिक स्तर का आकलन किया गया और लाखों अभ्यर्थियों के बीच से केवल उनका चयन किया गया, जिनका सामान्य ज्ञान, संबंधित विषय का ज्ञान और बौद्धिक स्तर ऊँचा था। ऊँची बौद्धिक क्षमता वाले लोगों को ही भर्ती करने की क्या ज़रूरत है? मेरे तईं तो इसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि ऐसे लोग अपने कार्य-काल में संस्था की आवश्यकता और अपेक्षानुसार नयी प्रौद्योगिकी, नयी संकल्पनाओं, नए शब्दों, नई कार्य-शैलियों को सीख पाएँगे, उनके अनुरूप अनुकूलित हो पाएँगे और अपनी मेधा का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए संस्था, विभाग, समाज और देश की उन्नति में अपनी ओर से भरपूर योगदान कर पाएँगे। इसका अभिप्राय यह हुआ कि हमारी भर्ती के समय से ही हमारे बारे में यह धारणा रही है कि हम नई संकल्पनाएं और नए शब्द सीखेंगे और हमारे भीतर सीखने की क्षमता विद्यमान है। तो हम बात-बात पर आसानी की बात क्यों करते हैं? मेरे तईं आसानी की माँग करना, अपनी मेधा को ही सिरे से नकारना है। ऊँची बौद्धिक क्षमता वाला व्यक्ति जटिल से जटिल संकल्पनाओं को तेजी से सीखता है।

खुद को ईडियट कहलाना कौन पसंद करेगा? सभी तो स्वयं को जीनियस समझते हैं। जीनियस व्यक्ति यह नहीं कहता कि मैं नया कुछ भी नहीं सीख सकता। वह तो हर समय नई चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए सन्नद्ध रहता है। यदि ऐसा न होता तो न तो हम बाज़ार में उतर रही नई-नई कारें दौड़ा पाते, न ही स्मार्ट फोन, कंप्यूटर और हर रोज आ रहे नए-नए उपकरण चला पाते। अपनी रुचि के उपकरण इस्तेमाल करना हम तेजी से सीख लेते हैं। उनसे जुड़े शब्द भी ग्रहण कर लेते हैं। फिर हिन्दी ही हमें जटिल क्यों लगती है? क्या हमारी मनोवृत्ति में ही कोई खोट है? डू वी हेट हिन्दी? एंड फॉर दैट मैटर, डू वी लाइक इंग्लिश मोर दैन हिन्दी? इफ दैट इज ट्रू- हाउ अनलकी एंड हाउ अनग्रेटफुल ऑफ अस!!

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