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अपर्णा शर्मा की कहानी - पतिव्रता

अपर्णा शर्मा की कहानी - पतिव्रता

अरूण और मैनी के हिन्दुस्तान आने की खबर से अरूण का पूरा परिवार उनके स्वागत को उत्सुक हो गया। दो साल पहले अरूण ने अमेरिका में अपनी सहकर्मी मैनी से शादी कर ली थी। मैनी का परिवार हिन्दुस्तानी था। वे अभी दो पीढ़ी पहले ही अमेरिका में बस गए थे। अरूण और मैनी की शादी से दोनों के परिवार खुश थे। वे पहली बार हिन्दुस्तान आ रहे थे। इसीलिये मैनी का अरूण के रिश्तेदारों और मित्रों से परिचय कराया जाना जरूरी था और साथ ही विदेशी बहू को कुछ दिन स्वदेशी रीति रिवाजों की जानकारी दिया जाना भी। अरूण के परिवार के सभी लोग अपने-अपने तरीके से योजना बना रहे थे। उसकी बहनें विशेष उत्साहित थीं। वे भैया-भाभी के साथ एक-एक दिन कैसे एन्जाय करना है इसकी तैयारी कर रही थी। माँ भी बहू के आराम, पसंद और जरूरतों का सामान जुटा रही थी। दादी का ध्यान केवल बहू के रंग रूप और संस्कारों पर था। उसे पूरा यकीन था कि उसका लाड़ला पोता कभी गलत चुनाव कर ही नहीं सकता है। उसने निश्चय ही सुन्दर सुघड़ बहू चुनी होगी।

अरूण और मैनी के स्वागत के लिये पूरा परिवार हवाई अड्डे पर पहुँच गया। अरूण ने बड़ों के पैर छुए। उसने मैनी को भी ऐसा करने का इशारा किया। मगर माँ ने आगे बढ़कर उसे रोक दिया और मैनी को गले लगा लिया। वे बोली-”नहीं अभी ऐसे नहीं। नई बहू का स्वागत होने के बाद ही वह किसी के पैर लगती है।”

दादी घर के दरवाजे पर खड़ी बहू का बेताबी से इंतजार कर रही थी। उन्होंने मुख्य द्वार और गलियारे में शुभ चिन्हों वाली सुन्दर रंगोली सुबह ही बनवा दी थी। पूजागृह में कुल देवता की स्थापना कर नवदम्पत्ति से पूजन कराने की व्यवस्था भी कर ली थी।

जैसे ही द्वार पर गाड़ी रूकी। दादी आगे बढ़ी। उन्होंने सम्भाल कर बहू को गाड़ी से उतरवाया। अरूण के साथ बहू की आरती कर दोनों को घर में लाया गया। देवपूजन के बाद जलपान और थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद अरूण और मैनी अपने कमरे में चले गए। चार छः दिन हल्की-फुलकी रस्में चलती रही। माँ जो भी जिस तरह मैनी को समझाती वह बिना संकोच और झुंझलाहट के कर देती। दादी और माँ खुश होती। दादी हर बार कहती. “संस्कारित है।” अरूण की बहनें मैनी से दिन भर बातें करती। वे माँ और दादी की हिन्दी में कही बातें अँग्रेज़ी में मैनी को और मैनी द्वारा अँग्रेज़ी में कही बातें हिन्दी में अनुवाद कर माँ और दादी को समझाती रहती। मैनी से उसके देश और घर के रिवाज व बातें बूझती और उसे अपने घर व देश की बातें बताने की कोशिश करती। मैनी बातों को समझने और सबके साथ घुलमिलकर रहने की कोशिश करती। वह हिन्दू धर्म ग्रंथों व धर्म स्थलों में विशेष रुचि रखती थी। अतः अवसर मिलते ही उनकी विस्तृत जानकारी लेने का प्रयास करती। अरूण के परिवार के सभी लोग अपनी समझ से उसे पूरी तरह संतुष्ट करने की कोशिश करते। वे उसकी जिज्ञासाओं की खूब तारीफ करते। अरूण के पापा तो दिन में कितनी ही बार रिश्तेदारों और मित्रों को मैनी द्वारा पूछे गए प्रश्नों का हल खोजने के लिये फोन करते रहते। अरूण भी मैनी के अपने परिवार में घुलमिल जाने से बेहद खुश था। वह इसके लिये मैनी की तारीफ करता और माँ, बहनों व दादी को भी उत्साहित करता। अरूण की उम्मीद से भी अधिक मैनी उसके परिवार में मिक्सप हो गई थी। उसका हिन्दुस्तान आने का मकसद पूरा हो गया था। अब वह मैनी को रिश्तेदारों और मित्रों से मिलवाने की योजना बनाने लगा। माँ और पापा से हर दिन यह चर्चा होती कि एक दावत का आयोजन कर सब रिश्तेदारों को यहाँ बुला लिया जाय या फिर हम ही लम्बे टूर पर निकल जाँय। लेकिन कुछ निश्चित नहीं हो पा रहा था।

मैनी अब अरूण से अलग भी उसकी बहनों के साथ घूमने, शापिंग करने और मूवी देखने जाने लगी थी। वह उनसे सूट और साड़ी पहनना सीखती, भारतीय व्यंजनों के गुणों और बनाने के तरीकों में रुचि लेती। कभी-कभी रसोई में चली जाती और माँ को खाना बनाते हुए ध्यान से देखती। एक दो बार उसने रोटियाँ बेलने का भी प्रयास किया। अरूण की बहनें उसे अँग्रेज़ी में व इशारों से या कभी रसोई के सामान दिखाकर थोड़ा बहुत समझाती रहती। वह सहमति में ऐसे सिर हिलाती जैसे सब समझ गई हो। दादी उसकी ऐसी बातों पर निहाल हो जाती। वह उसकी बलाएँ लेती और माथा चूम लेती। दादी घर में आने वाले मेहमानों से मैनी की तारीफ करती न अघाती। बाई को मैनी के कमरे की विशेष रूप से सफाई करने और उसकी जरूरतों का खास ध्यान रखने को बराबर कहती रहती। मैनी माँ को दादी और उसकी हम उम्र महिलाओं के पैर छूते देखती तो स्वयं भी ऐसा करती। दादी खुशी से फूली न समाती और इशारे से उसे अपनी सास के भी पैर छूने को समझाती। इसी हँसी खुशी के माहौल में पूरा महीना कब बीत गया किसी को एहसास ही न हुआ। अरूण और मैनी को पन्द्रह दिन इण्डियन टूर पर जाना था। माँ ने उनके लिये आवश्यक सामग्री इकट्ठा कर दी। अरूण और उसके पापा ने मिलकर फ्लाइटें बुक करा लीं। अरूण की बहनों ने मैनी को इण्डियन टूरिस्ट प्लेस पर होने वाली मुश्किलों-चोर, ठगों, जहर खुरानों, खान-पान के प्रदूषण आदि के विषय में समझा दिया। एक छोटा सा ब्रेकफास्ट और एक फस्टएड बाक्स उनके लिये तैयार कर दिया गया। अरूण और मैनी चले गए।

परिवार के लोग अरूण और मैनी के लौटकर आने पर होने वाली दावत की तैयारी में जुट गए। सभी रिश्तेदारों और मित्रों को निमंत्रण भेज दिया गया। पूजा भोज, मेहमानों के रूकने आदि की सभी व्यवस्था कर ली गई। मैनी के लिये दुल्हन वाला जोड़ा और गोल्डन सैट खरीदा गया। सप्ताह भर पहले मेहमान आने शुरू हो गए। ठीक समय पर अरूण और मैनी भी आ गए। दादी की दो छोटी बहनें हरिद्वार यात्रा पर गई हुई थीं। बुलावा पाकर वे अपने कार्यक्रम को बीच में ही छोड़कर आ गई। दादी उनसे हर दिन मैनी की ढेरों तारीफ करती। एक दोपहर दादी ऐसी ही बातें कह रही थी। छोटी दादियाँ ध्यान लगाकर सुन रही थी। एक बोल उठी. “अरी जीजी, सब आपकी प्रभु भक्ति का प्रसाद है। वरना इतना सलीका और संस्कार तो यहाँ की लड़कियों में भी नहीं है।” दूसरी बोली. “हमारा अरूण क्या कम है। जीजी ने उसे श्रवण कुमार के संस्कार जो दिये हैं। अब जैसा बेटा वैसी बहू।” दादी बोली. “सब ऊपर वाले की कृपा है बहन।” तभी बाई ने आकर कहा. “माँजी ने खाना लगा दिया है। आप लोग भोजन कर लें।” छोटी दादी बोली. “अरे मैनी को भी बुला लो। एक दो दिन तो सबके साथ खा पी ले।” दादी बोली. “ना बहन, वो सबके बाद में खाना खाती है। चाहें जितना कहो। जब तक अरूण खाना न खा ले वो एक दाना भी मुँह में नहीं डालेगी। वो भी अरूण की थाली का बचा खाती है बस और कुछ नहीं।” शुरू में तो हम समझते ही नहीं थे। बेचारी भूखी रह जाती होगी। अब अरूण के लिये ही अधिक परस देते हैं। कम से कम दोनों का पेट तो भर जाय। मैनी माँ की मदद करने चौके में आ गई थी। वह परसी थालियों को मेहमानों तक पहुँचाने का काम कर रही थी। अरूण की बहनें दौड़-दौड़ कर चटाईयाँ बिछाने, बरतन लाने और भोजन परसने का काम कर रही थी। दादियाँ भोजन करते हुये आपस में बातें कर रही थी। मैनी थोड़ा रूककर दादियों की बात ध्यान से सुनने लगी। छोटी दादी बोली. “ऐसे सुसंस्कार बहू ने कहाँ पाये होंगे जीजी?”

दादी ने समझाया. “उसकी दादी इण्डियन है उसी से सीखा है और कहाँ से?” मझली दादी बोली. “ऐसी पति भक्ति तो पहले जमाने में ही थी। अब तो बस सती सावित्री की कहानियों में समझो। हमारे धन्य भाग हैं। जो मैनी जैसी बहू मिली है। मन खुश हो गया जीजी।”

मैनी अब तक दादी की बातों को काफी हद तक समझने लगी थी। उन्होंने उसकी तारीफ के बहुत से वाक्यों को आने वालों के सामने इतनी बार दोहराया था कि उसे लगभग कंठस्थ हो गए थे। पतिव्रता, सती सावित्री संस्कारों जैसे शब्द भी अब उसके परिचित हो गए थे। वह अचानक बोल उठी. “नहीं.नहीं दादी, ऐसा नहीं है। मैं अरूण का बचा अपनी दादी के निर्देशानुसार खाती हूँ। उन्होंने इण्डिया आते समय मुझे चेताया था कि इण्डियन सास बहू को जहर दे देती है। यह कोई संस्कार नहीं है बल्कि सावधानी है।” बात अँग्रेज़ी में कही गई थी। दादियों की समझ में कुछ नहीं आया।

दादी बोली. “बहू कहती है। सब खूब अच्छे से खाओ।”

अरूण की बहन दोनों की बात का अंतर समझ कर ठहाका मार कर हँस पड़ी। मैनी तेज आवाज में बोली थी। माँ ने भी उसे रसोई में स्पष्ट सुना। वह बाहर देखने लगी। माँ को झटका सा लगा. संस्कारों की उदाहरण भारतीय नारी का बाहर ऐसा प्रचार। अरूण की बहन दादी को सही बात बताने को बोलने ही वाली थी कि माँ ने उसे तेज आवाज लगाई। साथ ही चुप रहने का इशारा कर बोली. “हँसी मजाक का समय नहीं है। खाना ठण्डा हो रहा है जल्दी से रोटियाँ लेकर जाओ।” बेटी जैसे ही रसोई में आई माँ ने उसे धीमी आवाज में कहा. “दादी जो समझ रही है उसे वैसा ही समझने दो। कोई तो सुख से जिये। नासमझी में ही सही।”

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लेखिका.

डॉ0 (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी.एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डाॅ0 शर्मा की एक शोध पुस्तक . भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र.पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा. एम0 ए0 (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी0 एड0, एम0 फिल0 (इतिहास), पी.एच0 डी0 (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं. भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस0 एस0 पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गांव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो.बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाॅ (कहानी संग्रह), 2014

मैं किशोर हूॅ (बाल कविता संग्रह), 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कहानियां, कविताएं प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

 

सम्पर्क -

डा0 (श्रीमती) अपर्णा शर्मा,

“विश्रुत”, 5, एम.आई.जी., गोविंदपुर,

निकट अपट्रान चैराहा,

इलाहाबाद (उ0प्र0), पिनः 211004,

दूरभाषः ़91.0532.2542514,

 

ई.मेलः <draparna85@gmail.com>

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