शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

गोवर्धन यादव का आलेख - अंधेरे में मुक्ति के रास्ते खोजता मुक्तिबोध

अंधेरे में मुक्ति के रास्ते खोजता मुक्तिबोध
     गजानन माधव मुक्तिबोध     ( १३ नवम्बर १९१७ * ११ सितम्बर १९६४ )

मैंने न तो गजानन मुक्तिबोध को देखा है और न ही कथासम्राट मुंशी प्रेमचन्दजी को. हाँ इनको पढने का सुअवसर मुझे लगातार प्राप्त होता रहा है.  इसे संयोग ही कहें कि मुझे प्रमोशन मिला और मैं छत्तीसगढ स्थित कवर्धा में पोस्टमास्टर होकर २००२ में पदस्त हुआ. कवर्धा का रास्ता राजनांदगांव होकर ही जाता है. यह वह समय था जब मैं मुक्तिबोध की स्मृतियों को संजोते हुए दिग्विजय कालेज पहुंचा था, राजा दिग्विजय दास ने किला कालेज को दान कर दिया था. सन १९५८ में मुक्तिबोध यहाँ अध्यापक होकर आए थे. शहर में कुछ दिन किराये के मकान में गुजारा करने के बाद उन्हें किले के पिछले हिस्से में स्थित सिंहद्वार के बगल में रहने को जगह दी गई थी. इसी तरह सन २०१५ में मुझे मुंशी प्रेमचन्दजी के गांव लमही जाने का सुअवसर मिला. संयोग से यह यात्रा लमही से काठमांडु तक थी.  साहित्य के दो दिग्गज हस्तियों को श्रद्धासुमन चढाने का अनायस ही अवसर मुझे मिला
दिग्विजय कालेज के पिछले हिस्से में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, बलदेवप्रसाद मिश्र के साथ मुक्तिबोध की प्रतिमा स्थापित कर इस स्थान को “त्रिवेणी” नाम दिया गया है. मुक्तिबोध के घर की पहचान उसका चक्करदार जीना है जो उनके काव्य-संसार में एक “मोटिफ़” की तरह प्रकट हुआ है. यह चक्करदार जीना ही तो है जो अब मुक्तिबोध के घर होने की याद दिलाता है, लेकिन रंग-रोशन होने व मरम्मत के बाद यह स्थान अब पूर्व की तरह जगमगाने लगा है. वह भुतहा कमरा लगभग गायब हो गया है, जहाँ आज से चार दशक पहले एक कवि रहा करता था, .मरम्मत से पहले इस कमरे में मकडी के जाले लगे रहे होगे, जहाँ धूल भरी रही होगी और बरसात के बाद सीलन भरी घुटन भी समायी रही होगी.. यदि यहाँ चक्करदार जीना न होता तो शायद ही कोई जान पाता कि यह कवि का घर रहा होगा. कमरे में बडी-बडी खिडकियां जरुर अपनी जगह स्थित हैं लेकिन वह दृष्य धुंधला सा गया है, जो मेरी स्मृति में बरसों-बरस छाया रहा था.. इन खिडकियों से झांकते हुए  मुझे अपनी स्मृतियों में वह दृष्य जरुर दिखाई दिया था, जो कभी सचमुच में रानीसागर के पास मौजुद था. पास ही में वह श्मशान भुमि भी थी, जहां कभी बच्चों की मौत होने के बाद दफ़ना दिया जाता था.. बारिश में रानीसागर समुद्र की तरह लहराता रहा होगा, सूख चुका था. दूसरी खिडकी से झांकने पर बस्ती का फ़ैलाव साफ़ नजर आता है. चक्करदार जीने से चढकर उस कमरे तक मैं सांस रोके पहुंचा था. मन में अब भी कई तरह के विचार  आकार ले रहे थे. उनकी कविता के धुंधले बिंब बन-बिगड रहे थे. किले में छाया घुप्प-घना अन्धकार ,सामंती प्रतीकों, और डरावाने रूपाकारॊं के बीच कवि ने इसी रास्ते पर अपने समूचे अन्धकार, तमाम तरह के प्रतीकों और रूपाकारों को साथ लिए आता है और अपनी कविता में जस का तस उतार देता है.

मुक्तिबोध का आवास एक किला है. किला तो फ़िर किला ही होता है, चाहे वह किसी भी भू-भाग में स्थित क्यों न हो. किले की भव्यता और साज-सज्जा को देखकर दर्शक खुश होकर अपने को धन्यभाग महसूसता होगा. लेकिन मुझे यह सब देखते हुए उसका  अत्तीत आंखों के सामने घूमने लगता है. घूमने लगते हैं उन तमाम सैनिकों के चेहरे जिसने अपनी राजा की इच्छा को पूरा करने के लिए अपने प्राणॊं की बाजी लगा दी थी.. मुझे घोडॊं के हिनहिनाने की आवाज, हाथियों के चिंघाड्ने की आवाज सुनाई देने लगती है. जिसे आमतौर पर सेना कहा जाता है. फ़िर हर किले का अपना इतिहास होता है और वह इतिहास रक्त-रंजित घटनाओं से भरा पडा है. किला है तो फ़िर एक राजा जरुर ही होगा, उसमे दिग्विजय की कामना भी होगी. समय-समय पर युद्ध भी लडॆ गए होगे. केवल एक कामना को पूरा करने के लिए न जाने कितने निरपराधियों को अपनी जाने गवांनी पडी होगी. किले के सुरक्षा के लिए न जाने कितने जतन भी किए जाते रहे होगे .किले के अन्दर अनगिनत ‍षडयंत्र भी रचे जाते रहे होगे. जरा-जरा सी बात पर न जाने कितने नागरिकों को राजा की सनक पर मौत के घाट उतार दिया जाता रहा होगा. युद्ध/ संघर्ष के दिनों में किसानों के घर-खेत जला दिए जाते थे, मजदूरों का शोषण किया जाता था,  राजा अपने बचाव के लिए न जाने कितने ही गुप्त रास्ते,बनवाकर रखता था ताकि, उनका उपयोग आसन्न संकट को देखकर पलायन कर सके.

मुक्तिबोध किले में रहते हुए महल के वैभव को नहीं देखते, उन्हें तो बस दिखाई देता रहा होगा, उस किले का रक्त-रंजित इतिहास. बेमौत मारे गए और ब्रह्मराक्षस बन चुके लोग, वे अन्धेरी सुरंगे, जिनमें से दिल दहला देने वाली आवाज रह-रह कर गूंजती है. रंग-रोशन के बाद सारा परिदृष्य तो बदल दिया गया,लेकिन जो अतीत में घट चुका, उसे कैसे बदला जा सकता था? इन अन्धेरों ( पाखण्ड)  को उजागर करने के लिए मुक्तिबोधजी ने अन्धेरों को आधार बनाया और कविता उतरती चली गयी..
मुक्तिबोध द्वारा रचित “अंधेरे में” जिन्हें-आठ भागों में कलमबद्ध किया गया है.इसमें शायद ही कोई कविता ऎसी होगी,जिसमें “अन्धकार” का प्रयोग न हुआ हो.यानी हर कविता अन्धेरे में गुंथी गई है. यथा=
जिन्दगी के...कमरों के अंधेरे...लगाता है चक्कर...कोई लगातार.
बाहर शहर के, पहाडी के उस पार...अंधेरा सब ओर.
अरे,अरे तालाब के आसपास अंधेरे में वन वृक्ष.
किसी काले डैश की  घनी पट्टी ही आंखों में बंध गई
सूनापन सिहरा...अंधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे....शून्य के मुख पर सलवटें स्वर की...मेरे ही डर पर धंसती हुई सिर...छटपटा रही है शब्दों की लहर.
प्रोशेसन ?..नरतब्द्ध नगर के मध्य रात्रि अंधेरे में सुनसान...किसी दूर बैण्ड की दबी हुई क्रमागत ताल-धुन
किंतु वे उद्यान कहां है...अंधेरे में पता नहीं चलता...मात्र सुगन्ध है सब ओर... पर, उस महक-लहर में...कोई छिपी वेदना, कोई गुप्त चिन्ता...छटपटा रही है.
भूमि की सतहों के बहुत-बहुत नीचे...अंधियारी एकान्त...प्राकृत गुहा एक...विस्तृत खोह के सांचले तल में
भयानक सिपाही जाने किस थकी हुई झोंक में...अंधेरे में सुलगाता सिगरेट अचानक...तांबे से चेहरे की ऎंठ झलकती...पथरीली सलवट.

हिन्दी साहित्य में सवाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार,समीक्षक,स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे. उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का सेतु भी माना जाता है. तारसप्तक के वे पहले कवि थे, जिसे अज्ञेय एक विशिष्ठ स्थान देते हैं. मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार “ तार सप्तक” के माध्यम से ही आयी थी, लेकिन कोई स्वंतत्र काव्य-संग्रह उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हुआ. मृत्यु से पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी “ एक साहित्यिक की डायरी” प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण “भारतीय ज्ञानपीठ” से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ..सन चौसठ में नागपुर के “विश्वभारती” प्रकाशन ने नयी कविता तथा अन्य निबन्ध प्रकाशित किए. भारतीय ज्ञानपीठ से “काठ का घोडा”, लघु उपन्यास “विपात्र” प्रकाशित हुए. सन अस्सी में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन “भूरी भूर खाक घूल” तथा राजकमल ने छः खण्डॊं में “मुक्तिबोध रचनावली” पेपरबैक में प्रकाशित की.

इसके बाद तो जैसे मुक्तिबोध की किताबें धडाधड प्रकाशित की जाने लगीं. “ मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया” अशोक चक्रधर द्वारा १९७५ में प्रकाशित,, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्दति को विकसित और समृद्ध करने, साहित्यिक की डायरी, कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्य शास्त्र, भारत का इतिहास और संस्कृति इतिहास, काठ का सपना तथा सतह से उठता आदमी कहानी संग्रह.

बार-बार नौकरियां छोडने वाले इस शख्स ने पत्रकारिता के अलावा शिक्षिकी भी की थी. उनके सहपाठियों में वीरेन्द्रकुमार जैन, प्रभाग शर्मा ,रमाशंकर शुक्ल आदि थे जिन्होंने उन्हें निरन्तर प्रोत्साहित करने का काम किया.

श्री नेमीचंद जैन, प्रभाकर माचवे ने शुजालपुर में बैठकर “तार-सप्तक” की परिकल्पना की थी, जो सन १९४३ में अज्ञेय के सम्पादन में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह में मुक्तिबोध प्रथम स्थान पाते हैं, माने तारसाप्तक की शुरुआत इन्ही से होती है. १९४५ के लगभग मुक्तिबोध बनारस गए और त्रिलोचन शास्त्रीजी के साथ “हंस” के सम्पादन में शामिल हुए.. उन्हें काशी रास नहीं आयी. भारतभूषण अग्रवाल और नेमिचन्द्र जैन ने उन्हें कलकत्ता बुलाया,लेकिन कोई बात नहीं बनी. हारकर वे जबलपुर चले आए और हितकारिणी हाई स्कूल में अध्यापक हो गए.  मुझे उस समय बडा आत्मगौरव सा महसूस हुआ था, जब मुझे यहाँ नौकरी करते हुए कई बार आने के सुअवसर प्राप्त हुए थे.

१९५८ में वे राजनांदगांव के दिग्विजय कालेज में प्राध्यापक होकर आए और मृत्यु पर्यन्त तक यहीं रहे. मुक्तिबोध की स्मृतियों को अक्षुण्य बनाने के लिए छत्तीसगढ राज्य सरकार ने इसे “स्मारक” घोषित कर दिया. आश्चर्य इस बात पर कि तत्कालीन सरकार दक्षिणपंथी विचारधारा की थी, जबकि मुक्तिबोध वामपंथी विचारक थे.

डा. नामवरसिंह मुक्तिबोध के बारे में लिखते हैं=” नई कविता में मुक्तिबोध की जगह वही है जो छायावाद में निराला की थी. निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपनी युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के साथ ही उनकी सीमा को चुनौती देकर उस सर्जानात्मक विशिष्ठता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन हो सका है.

शमशेर बहादुर सिंह लिखते हैं” मुक्तिबोध हिन्दी संसार की एक घटना बन गए. कुछ ऎसी घटना जिसकी ओर आँख मूंद लेना असम्भव था. उनका एकनिष्ठ संघर्ष, उनकी अटूट सच्चाई, उनका पूरा जीवन सभी एक साथ हमारी भावनाओं के केन्दीय मंच पर सामने आए और सभी ने उनके कवि होने को नई दृष्टि से देखा. कैसा जीवन था वह और ऎसे उसका अंत क्यों हुआ. और वह समुचित ख्याति से अब तक वंचित क्यों रहा?.”

मुक्तिबोध पर मित्र जयप्रकाश लिखते हैं-“ महलनुमा घर और किले के वातावरण में रहने के बोझ ने मुक्तिबोध की निम्नवर्गीय आत्मचेतना को दबा नहीं डाला बल्कि किले के इतिहास और उसकी स्मृतियों को अपने वर्गीय आत्मबोध के प्रतिमानों पर परखने को विकलता से भर दिया था. इस इतिहास और स्मृति के भीतर किसानों का संघर्षऔर जुझारू योद्धाओं का बलिदाब था. उनके प्रहारों से अंततः किले के ढह जाने की नियति थी सच पूछा जाए तो सामंती अंहकार और मिथ्यागर्व के ढह जाने का विश्वास एक सुसंगत इतिहास-बोध से उपजा था. मुक्तिबोध यदि लिख सके कि “ अपनी मुक्ति के रास्ते/अकेले में नहीं मिलते” तो इसलिए के वे गौरव-प्रतीकों के जर्जर होकर गिर पडने की अनिवार्यता को और उसके पीछॆ सक्रिय कारणॊं को- जनता के सामूहिक संघर्ष की शक्ति को- पहचान रहे थे. वे पूरे मन से उसके साथ थे.”

“अंधेरे में” तथा “ब्रह्मराक्षस” मुक्तिबोध की ऎसी गूढ कविताएं हैं, जिन्हें पढकर मुझे लगता है कि मुक्तिबोध का कवि इस गहरे तनाव के दवाब से मुक्त होने के लिए नहीं,बल्कि उन बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से, उन अनसुलझे प्रश्नों को सामने लाना चाहते थे, जो उन्हें अन्दर से बैचैन और व्यथिथ करते रहे हैं. ब्रह्मराक्षस द्वारा अपनी देह को बार-बार मलते हुए मैल छूडाने की बात से इसे समझा जा सकता है. देह का मैल तो एक बारगी छूट भी जाएगा,लेकिन आत्मा पर पडॆ मैल को किस तरह धो पाएंगे?

ब्रह्मराक्षस
बावड़ी की उन गहराइयों में शून्य 
ब्रह्मराक्षस एक पैठा है, 
व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज, 
हड़बड़ाहट शब्द पागल से। 
गहन अनुमानिता 
तन की मलिनता 
दूर करने के लिए प्रतिपल 
पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात 
स्वच्छ करने-- 
ब्रह्मराक्षस 
घिस रहा है देह 
हाथ के पंजे बराबर, 
बाँह-छाती-मुँह छपाछप 
खूब करते साफ़, 
फिर भी मैल 
फिर भी मैल!! (ब्रह्मराक्षस)
मुक्तिबोध नागपुर से राजनांदगांव हडबडी में आए थे, मानों अपना बचा हुआ जीवन,जितनी जल्दी हो सके,जी लेना चाहते थे. उनकी मनोदश पर शरद कोठारी ने विस्तार से लिखा है. अपनी मनोदशा को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था” पार्टनर मेरे पास समय बहुत कम है और मैं अपना सारा काम पूरा कर लेना चाहता हूँ”
शायद उन्होंने अपना होम-वर्क पूरा कर लिया था. लेकिन उनकी निगाहों में सामंती सत्ता के भग्न प्रतीकों और स्वतंत्र भारत के औदयोगिक विकास के केंद्रों के बीच उभरते जन-संघर्षो- हडताल, जुलूस, नारेबाजी-घेराबंदी और फ़िर दनादन गोलियां उगलती बंदूकों की ओर थी. भारत का वर्तमान आज भी उन यक्ष प्रश्नों से बाहर कहां निकल पाया है? आने वाले समय में जो सपना मुक्तिबोध की आँखों ने संजोया/देखा था, क्या वह निकट भविष्य में साकार हो पाएगा?.

छिन्दवाडा- २४-११-२०१५गोवर्धन यादव.१०३, कावेरी नगर, छिन्दवाडा(म.प्र.) 

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------