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दीपक आचार्य का आलेख - दर्शनीय ही हैं ये मूर्तियाँ

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

मूर्तियाँ दर्शनीय हैं और रहेंगी। इनमें ईश्वर तत्व किस मात्रा में है या नहीं, यह उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की सफलता पर निर्भर करता है। इनमें मूर्ति होने के गुणधर्म हों या न हों, ये दर्शनीय तो हैं ही। लोग श्रद्धा और आस्था के साथ इनके पास आते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं, आरती उतारते हैं, परिक्रमा करते हैं और इन्हें खुश करने के लिए छप्पन भोग, समस्त विलास और जात-जात के नैवेद्य चढ़ाते हैं, प्रसाद बाँटते हैं और आत्म मुग्ध होते हैं, जैसे कि उन्होंने सब कुछ पा लिया।

यह तो देवी-देवता हैं जो कि किसी का कुछ भी ऋण अपने पास नहीं रखते। भक्तों और दर्शनार्थियों की ही बात नहीं, उन सभी की सुनते हैं जो उनके करीब होते हैं। जो उनके पास नहीं आकर भी उनके प्रति दूरवर्ती श्रद्धा रखते हैं और उन्हें मानते हैं।

यह तो बात हुई देवी-देवताओं की। इन्हीं की तरह सिद्ध, यक्ष, गंधर्व, भूत-प्रेत, पितर और दूसरी दिव्य योनियों वाले भी सबकी सुनते हैं। लेकिन इन सभी से इतर हजारों-लाखों मूर्तियाँ ऎसी भी हैं जो भगवान की तरह पूजने-पूजवाने, भोग-विलास पाने, जमाने भर का सुख लूटने और अपने आपको महा प्रतिष्ठ मानकर जिन्दगी जीने के आदी होते हैं।  अपनी छद्म महानता भरी छवि को हर क्षण बनाए रखने के लिए ये हमेशा सारी ताकत झोंकते रहते हैं। 

हर समाज, क्षेत्र और देश में इन मूर्तियों की अपार भरमार है जिन्हें लोग बड़ी ही श्रद्धा और आदर देते हैं, सम्मान, अभिनंदन, पुरस्कार, शाल, साफों से नवाजते हैं, उनके आगे-पीछे घूमते हैं और जयगान करते हैं, मंचों पर अतिथियों के रूप में सुशोभित करते हैं और वह सब कुछ करते हैं जो इन्हें पसंद आता है।

और यह सब कुछ लोग इस उम्मीद से करते हैं कि कभी ये हमारे किसी काम आएंगे अथवा हमारे किसी काम में कभी बाधक नहीं बनेंगे। कुछ लोग इनके श्वेत-श्याम व्यक्तित्व से अनभिज्ञ होते हैं इस कारण इनके प्रति भ्रमित रहकर बहुत बड़े-बड़े भ्रम पाल लिया करते हैं।

इनके अलावा बहुत सारे लोग भोले और सरलमना होते हैं इस कारण इनके कृत्रिमता से भरे मोहक आभा मण्डल के मोह पाश में बंधे रहते हैं।

कुल मिलाकर हम बात कर रहे हैं उन इंसानों की जो अपने आपको भगवान से कम नहीं समझते और खुद किसी कल्पवृक्ष की तरह सब कुछ दे डालने का भ्रम पैदा किए रखते हैंं। दूसरे क्षेत्रों को छोड़ भी दिया जाए, तो आजकल सामाजिक क्षेत्रों में ऎसे लोगों की भरमार है जो स्वयंभू हैं और चाहते हैं कि जब तक जीयें तब तक उन्हीं की तूती बोलती रहे।

विभिन्न समाजों में ऎसी मूर्तियाँ असंख्य हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक मंचों से लेकर रचनात्मक समाज सेवा का कोई सा क्षेत्र ऎसा नहीं बचा है जहाँ इन मूर्तियों का जबर्दस्त प्रभुत्व नहीं हो। इन लोगों के सामाजिक सरोकार सिर्फ प्रतिष्ठा पाने, समाजजनों को भ्रमित करने, मंचों पर अतिथियों के रूप में फबे रहने और अपनी छवि की सर्वश्रेष्ठता बरकरार रखने तक ही सीमित रहते हैं।

इनकी सामाजिक सेवाओं और समाज निर्माण में भागीदारी का निरपेक्ष मूल्यांकन किया जाए तो यही बात सामने आएगी कि ये केवल मूर्तियां हैं जिन्हें अच्छे मंच, आदर-सम्मान और अभिनंदन की दरकार है, इसके सिवा समाज के लिए योगदान के नाम पर ये न कुछ करते हैं, न कुछ कर पाने का माद्दा या उदारता ही इनमें होती है।

ये मूर्तियाँ केवल दर्शनीय हैं और रहेंगी। किसी के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। बावजूद इसके भोले-भाले या भ्रमित लोग इन्हें नियंता, भाग्यविधाता, मार्गदर्शक और सहयोगी मानकर पूजते रहते हैं।

हमारी बहुत सारी पीढ़ियाँ ऎसी मूर्तियों के कारण भ्रमित होती रहकर बिना किन्हीं उपलब्धियों के काल-कवलित हो गई, बहुत सारी प्रतिभाएं इनसे प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सहयोग की आशा-आकांक्षाएं लिए अपने अरमानों को दफन होते देखती रहकर अन्ततोगत्वा समाप्त हो गई।

समाज के नवनिर्माण, विकास और कुरीतियों के उन्मूलन के स्वप्नों को लेकर इनसे आशान्वित खूब सारे लोग इनसे निराश होकर चुपचाप बैठ गए और असंख्य लोग ऎसे हैं जो इन मूर्तियों की उदासीनता, नालायकी और निकम्मेपन को कोसते हुए जीने को विवश हैं।

ढेरों ऎसे भी हैं जो दूसरों की देखादेखी इन मूर्तियों के पीछे पागल हुए जा रहे हैं। मतलब यही कि ये मूर्तियाँ न किसी काम की हैं, न पूजने लायक। बावजूद इसके हम इनके पीछे दीवाने होकर पड़े हुए हैं। और वह भी केवल इसलिए कि इनसे किसी न किसी प्रकार का स्वार्थ या भय का संबंध होता है।

इन निकम्मी मूर्तियों की वजह से समाज की असली प्रतिभाएँ, श्रेष्ठ व्यक्तित्व और दिव्य विचारधाराओं वाले रचनात्मक लोग हाशिये पर हैं क्योंकि जब तक ये नाकारा मूर्तियाँ भस्मीभूत नहीं हो जाएंगी तब तक पूरे समाज को इन्हें झेलना ही पड़ेगा। समाज के लिए कुछ कर सकने का माद्दा रखने वाले नए और बहुआयामी प्रतिभाशाली लोग कभी भी आगे नहीं आ पाएंगे। और जब तक ये ढपोड़शंखी मूर्तियाँ मर नहीं जाती, तब तक कुछ बदलाव आ नहीं आ सकता।

फिर कुर्सियों, मंचों और अभिनंदन के इन भूखे भेड़िया छाप और सियार ब्राण्ड लोगों का क्या भरोसा, मरने के बाद भी कहीं ये प्रेत योनि पाकर हमारे बीच न आ धमकें, यह आशंका भी अब बलवती होती जा रही है क्योंकि नाम, तस्वीरों और मंच पिपासुओं का मोक्ष सौ जन्मों में भी नहीं हो सकता, इस बात की पक्की गारंटी है।

इन सभी बातों पर यकीन न हों तो अपने समाज के उन लोगों के सामाजिक योगदान को देख लें जो स्वयंभू मूर्तियां हैं और हर मंच पर सुशोभित हो जाती हैं। ये मूर्तियाँ केवल भाषण देना और समाजजनों को भ्रमित करना जानती हैं और इनके जीवन का एकसूत्री एजेण्डा यही है कि ये किसी न किसी तरह लच्छेदार बातें कर  मनमोही सब्जबाग दिखा कर अपने आपको शिखर पर प्रतिष्ठित किए रहें।

समाज के प्रति इनके योगदान को देखें तो ये लोग अपनी ओर से न पर्याप्त समय दे पाते हैं न वित्तीय मदद। ये लोग समाज के समृद्धजनों में गिने जाते हैं लेकिन समाज के लिए धेला भर सहयोग नहीं करते। जो समय नहीं दे सकते हैं उन सभी धन कुबेरों को चाहिए कि वे समाज के लिए अपेक्षित धनराशि का सहयोग दें, लेकिन वे ऎसा कभी नहीं कर पाते। इन लोगों को केवल पद-प्रतिष्ठा, मंच और अभिनंदन से ही मोह होता है, समाज के लिए कुछ भी देने की उदारता के बीज इनके डीएनए में नहीं होते।

जिन लोगों के पास समय है उन्हें समाज के लिए पर्याप्त समयदान करना चाहिए लेकिन इन आलसी और दरिद्री लोगों को फालतू की चर्चाओं, सोने-सुस्ताने और आलस्य में ही समय गँवाने से फुर्सत नहीं है।

बहुत से स्वयंभू लोग अपने आप में कुछ नहीं होते मगर किसी न किसी का पिछलग्गू हो जाते हैं, बड़े लोगों की चरण वन्दना और जयगान में रम जाते हैं और उन्हीं के आगे-पीछे रहते हैं। पर ये वहां भी किसी के काम नहीं आ सकते। ये अपने ही स्वार्थ पूरे करने में लगे रहते हैं।

ये तमाम दर्शनीय मूर्तियाँ दिखती बड़ी सुन्दर, भव्य और आकर्षक हैं लेकिन इन सभी के भीतर चतुराई, स्वार्थ, शातिरी, आडम्बर, पाखण्ड, स्वाँग और उच्चाकांक्षाओं के जाने कितने ऎसे शैतान छिपे हुए रहते हैं जिनकी थाह पाना हर किसी के बस में नहीं होता।

यों देखा जाए तो ये सारी मूर्तियाँ पुरातत्व संग्रहालय के शो केस में नज़रबंद कर दिये जाने लायक हैं। पता नहीं हम इन्हें ढोये रहकर क्यों अपने समाज, क्षेत्र और देश का बंटाढार करने में तुले हुए हैं। समस्त स्वयंभू और नाकारा मूर्तियों के प्रति कृत्रिम श्रद्धा और आस्था भाव से नमन।

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