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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - खुद आगे आएँ अपनी पहचान बनाएँ

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वो जमाना चला गया जब इंसान की खूबियों और उपयोगिता का आकलन-मूल्यांकन और उपयोग करने के लिए समाज आगे आता था और सदाचारी, सत्यवादी, सज्जनों, सेवाभावियों तथा सिद्धान्तवादी लोगों को सामाजिक संरक्षण, प्रोत्साहन और हरसंभव मदद प्राप्त होती थी और वह भी पूरी उदारतापूर्वक।

जो जिस योग्य होता था उसे उसी के अनुरूप काम मिलता और उसकी प्रतिभाओं के हिसाब से समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती थी। वो जमाना सिद्धान्तों, संस्कारों और आदर्शों का हुआ करता था।

आज पूंजीवाद और प्रोपेगण्डा का जमाना है, भौतिकता की चकाचौंध है इसलिए उन लोगों को आदर-सम्मान, मान-प्रतिष्ठा और यश प्राप्त है जिनके पास पैसा है अथवा पॉवर। दोनों के ही रास्ते परिग्रह और भोग-विलासिता के उन्मुक्त लक्ष्यों की ओर हैं जिनका न कोई ओर-छोर है, न मर्यादाएं। सब कुछ मनमर्जी और स्वेच्छाचारों पर निर्भर है और कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।

समाज-जीवन का क्षेत्र कोई सा हो, कोई सा अँचल हो, वहाँ समाज की नज़र अच्छे, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्तित्वों पर बनी रहती थी और उन्हें उनके योग्य कर्म, आदर और सम्मान दिलाने का काम समाज पूरा करता था।

आज वे सारे मूल्य समाप्त होते जा रहे हैं इसलिए श्रेष्ठताओं के सारे मानदण्डों पर दूसरी अत्याधुनिक और भौतिकतावादी कसौटियां हावी होती जा रही हैं। अब प्रतिभा, हुनर या सिद्धान्तों की बजाय जिन तत्वों के आधार पर इंसान का कद तय होने लगा है उसके बारे में सर्वविदित है।

बात सामाजिक प्रतिष्ठा से लेकर अपने आपको स्थापित करने की हो या अपने हुनर विशेष के सार्वजनीन प्रकटीकरण की, हर जगह दूसरों के मुकाबले स्वयं को स्थापित करने के लिए इंसान हर संभव उपायों का सहारा ले रहा है।

इसके लिए अब न कोई वर्जनाएं रह गई हैं, न मानवोचित मर्यादाएं। एक तरह से यह सीधा और खुला संघर्ष है जिसमें हर कोई पाने और कब्जा जमाने के लिए प्रयत्नशील है चाहे वह किसी भी तरह से हथिया क्यों न लिया जाए। छीना-झपटी और लूट-खसौट का यह दौर हाल के वर्षो में पूरी दुनिया में चल निकला है।

शोर्ट कट अपनाने वाले, अपने को ऊँचा बनाने के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर जाने वाले और किसी के भी आगे नाक रगड़ कर आगे बढ़ जाने वालों की भरमार है, पाँव पखारने वाले भी खूब हैं और पाँव दबाने लेकर चरणस्पर्श करने वाले भी कम नहीं। बहुत सारे लोग जिधर देखो उधर किसी न किसी पाँव धोक लगाते हुए दिखने लगे हैं। कई तो पूरे पसर ही जाते रहे हैं।

अक्सर ऎसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनमें कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दुनिया में ऎसे अधिकांश लोग जिनके सामने झुक-झुक कर सलाम करते हैं, हाथ जोड़कर आदर भाव दर्शाते हैं, वे ही लोग बाद में अपने काम निकल जाने पर अंगुली दिखाते हैं। इसी प्रकार पाँवों में गिरकर चरणस्पर्श करने वाले लोगों में से ही खूब सारे टाँग खिंचने लगते हैं।

आदमी का अब कोई भरोसा ही नहीं रहा। वह किस समय क्या कर गुजरे। किसे अच्छा और बुरा बता दे, यह सब उसके स्वार्थ पूरे होने पर निर्भर करता है।

दुनिया में जो भी अच्छे लोग हैं उनकी सबसे बड़ी कमजोरी या कमी यही होती है कि वे अपनी प्रतिभाओं के सार्वजनिक तौर पर प्रकटीकरण से हिचक रखते हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि प्रतिभाएं अपना काम करने में विश्वास रखती हैं आडम्बरों में नहीं।

दूसरी ओर प्रतिभाशून्य लोगों के लिए आडम्बरों और पाखण्डाेंं के सिवा और कुछ भी होता नहीं, इसलिए उन्हें आए दिन किसी न किसी से समझौते करने की विवशता होती ही है। ये लोग खुद नहीं जीते बल्कि दूसरों के सहारे जिन्दा रहने को मजबूर होते हैं।

आज का जमाना कुछ विचित्र है। दुनिया में जहां जो लोग अच्छे काम कर रहे हैं, सेवा और परोपकार में रमे हुए हैं, रचनात्मक कर्म अंगीकार किए हुए हैं अथवा उनके पास किसी भी प्रकार का हुनर है, इन सभी को चाहिए कि वे औरों के भरोसे न रहें, न चुपचाप और स्वान्तः सुखाय बने रहें, बल्कि अपने आपको स्थापित करने और अपनी अच्छाइयों से जमाने भर को अवगत कराने के लिए प्रयास करें।

इन प्रयासों में यह जरूरी नहीं कि किन्हीं प्रकार के गोरखधंधों, षड़यंत्रों अथवा बुरे लोगों का साथ लिया जाए। अपने दायरों और मर्यादाओं में रहकर अपनी बात जमाने तक पहुंचाएं। यह किए जाने पर ही अच्छाइयों का वजूद और अधिक मजबूत होकर प्रसार पाएगा अन्यथा बुरे और स्टंटबाज लोग संगठित होकर अपने हीन और क्षुद्र, कुटिल और कपटी धंधों से अच्छे लोगों को हाशिये पर लाने के लिए दिन-रात लगे हुए हैं।

अपने आपको स्थापित करने के लिए खुद आगे आएं। यह हमारे अपने लिए नहीं बल्कि समाज और देश के लिए जरूरी है। हम जो कुछ कर रहे हैं उसका लाभ समाज को प्राप्त होना चाहिए। हमारे कर्म का अनुकरण करने का संदेश सभी तक पहुंचना चाहिए।

आज समय की मांग यही है कि हम कंदराओं में बैठकर काम करने वाली कार्यशैली छोड़ें, अपने व्यक्तित्व में थोड़ा सुधार लाएं और अपने आपको प्रतिष्ठित करें। समाज सेवा का यह भी एक बहुत बड़ा आयाम है जिसके माध्यम से अच्छाइयों की बेहतर ढंग से मार्केटिंग कर समाज और देश के लिए हम अपने आपको उपयोगी बना सकते हैं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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