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हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन का व्यंग्य - लक्ष्मी - स्त्री या पुरूष ?

उद्यान में टहलते वक्त , पागलनुमा व्यक्ति से सुबह सुबह सामना होने से बचने के लिए , किनारे बने कुर्सी पर बैठ गया। मैला – कुचैला कपड़े पहने , बेतरतीब बाल और बढ़ी दाढ़ी , शरीर से आती दुर्गंध - उसे पागल साबित करने के लिए पर्याप्त ही थे। न जाने मुझे क्यों ऐसा लग रहा था कि , वह सुबह से मेरे पीछे पड़ा है। उसे पुनः अपनी ओर बढ़ते देखा , फिर जगह छोंड़ उठने लगा मैं। वह तेजी से मेरी ओर आया और कहने लगा – आपको मुझसे डरने की जरूरत नहीं है सर। मैं आपको नुकसान पहुंचाने नहीं , केवल एक जिज्ञासा का समाधान करने आया हूं। केवल मेरे एक अनुत्तरित प्रश्न का जवाब दे दीजिएगा , मैं यहां से चला जाऊंगा।

उठते से ...... बैठ गया सीट पर वापस और टालने के उद्देश्य से कहा – जो पूछना है जल्दी पूछो , सुबह सुबह मूड खराब मत करना। हूं .....जाने कहां कहां से चले आते हैं , मैं मन ही मन झुंझलाने लगा। वह हंसा ........... और बोला – सर पढ़े लिखे समझकर ही , सवाल कर रहा हूं , बताइए – लक्ष्मी कौन है – स्त्री या पुरूष ?

हंसने की बारी मेरी थी , किस लक्ष्मी की बात कर रहे हो तुम ? उसने कहा - वही लक्ष्मी जिसके पीछे पूरी दुनिया भाग रही है , उसी की बात कर रहा हूं सर। तू वाकई पागल है रे ...... लक्ष्मी स्त्री है और क्या ? इतना कहकर उठने लगा। तभी वह फिर हंसा और बोला - उच्च शिक्षित मनुष्य जानकर आपके पास आ गया था सर , लगता है गलती हो गई मुझसे। यह जवाब तो चाय दुकान में प्लेट धोते धोते वह पंद्रह बरस का छोकरा भी दे रहा था। कोई फर्क नहीं आपमें और उसमें ...... अट्टहास करने लगा।

कितने लोग जमा हो गए थे। मुझे अपनी हंसी उड़ती दिखाई देने लगी। कुछ बोलना उचित नहीं समझते हुए भी मजबूरी थी , कुछ ठीक और सटीक बोलकर निकल लेना। मेरी गंभीरता को भांप गया वह और कहने लगा – आप साबित कर सकते हैं कि लक्ष्मी स्त्री है ? मैंने तपाक से जवाब दिया – फोटो देखा है कभी - मां लक्ष्मी का। साड़ी पहन कर बैठे रहती है अपने वाहन उल्लू पर , उसके एक हाथ में कमल का फूल , तो दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा लिये रहता है। साड़ी पहनने वाले को स्त्री ही कहेंगे और क्या। जैसे तैसे टालने की कोशिश में लगा था मैं। तभी ...... वाह , क्या स्वांग रच लेने से या कपड़े पहनने के विभिन्न तरीके अपनाने से किसी का वास्तविक गुण बदल जाता है। गर आपको यहां आकर कोई साड़ी पहना दे तो क्या आप मर्द से औरत हो जायेंगे ? मैं कहता हूं , कि लक्ष्मी स्त्री नहीं पुरूष है सर। और मैं इसे साबित भी कर सकता हूं।

वह बताने लगा - आपने नाटकों में , फिल्मों में पुरूषों को स्त्री के वेष में और स्त्रियों को पुरूषों के वेष में अभिनय करते देखा है। पर इसका अर्थ ये नहीं कि असल जिन्दगी में स्त्री का पात्र निभाता अभिनेता स्त्री है , या पुरूष का पात्र निभाती महिला , कोई पुरूष ही है। लक्ष्मी जी , केवल वेष बदलकर नाटक कर रही है , केवल अभिनय दिखा रही है , परंतु असल जिंदगी में वह पुरूष ही है। यह कोई प्रमाण थोड़ी है मिस्टर ..... न कोई दमदार तर्क ...... मैंने कहा। सर मेरी बात पूरी होने तो दीजिए – पुरूष , ताकत का पर्याय होता है। जो ताकत पुरूष के पास है , वही ताकत लक्ष्मी के पास भी है। उसके प्रभाव से उन प्रत्येक वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है , जो मुश्किल ही नहीं असम्भव भी है। किसी को भी उसके प्रभाव से जीता जा सकता है या खरीदा जा सकता है। ताकत यदि महिलाओं के पास होती तो महारानी लक्ष्मी बाई को , लड़ने वाले अकेले पुरूष नहीं कहते अंग्रेज। और महिलाएं , बल विहीन होती है , तभी तो बल विहीन लोगों को , स्त्री मानकर चूड़ियां भेंट करते हैं लोग। अब आप ही बताइए – लक्ष्मी पुरूष नहीं हुई क्या ? जोर से हंसा फिर .......।

झकझोर दिया था उसने मुझे। वार्तालाप सुनने इकट्ठे हुए भीड़ से भी उसकी तरफ होने का संकेत मिल रहा था। मैं अनुत्तरित हो , कंफ्यूज होने लगा था - कि वास्तव में लक्ष्मी कौन है ? पर यह अवश्य समझ गया था कि , निश्चित ही वह युवक , कहीं न कहीं , कभी न कभी जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर , लक्ष्मीजी के पुरूषत्व का शिकार हुआ है , जिसकी वजह से पागलों की तरह भटक रहा है। परंतु मेरे लिए यह आज भी अनिर्णीत है कि लक्ष्मी स्त्री है या पुरूष .............?

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

जि. गरियाबंद ( छ. ग.) , 9752877925

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