विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

दीपक आचार्य का आलेख - नहीं सहेगा हिन्दुस्थान, असहिष्णुता का यह बवाल

image

सब तरह भारी हो हल्ला है

असहिष्णुता का बोलबाला है

जिस भारत ने दुनिया को संस्कार सिखाए, सभ्यता दी और इंसानियत का पैगाम दिया।

उस भारत में असहिष्णुता की बात कहना भी बेमानी है।

कोई इसे हल्के में ले या भारीपन से, यह सरासर भारतमाता का अपमान ही है।

और हममें से ही कई लोग इस  अपमान के सहभागी होकर जाने क्या संदेश देना चाह रहे हैं।

कहाँ है असहिष्णुता, कोई तो बताए।

बार-बार चिल्लपों मचा रहे लोग और उनकी हाँ में हाँ करते हुए टर्र-टर्र करने वाले मेंढकों, रुदाली में रमे हुए रंगे सियारों को और इस नाउम्मीद भीड़ में अपना खान-पान व नाम तलाशने वाले लोमड़ों को देखिये।

क्या से क्या करने लगे हैं, कुछ न कुछ बकवास करने लगे हैं।

और जता यों रहे हैं जैसे कि भारत में असहिष्णुता का कोई बीज अचानक अंकुरित हो गया हो।

पिछले काफी दिनों से असहिष्णुता का बवाल हर तरफ फन उठा रहा है।

पढ़े-लिखे भी चिल्लाने लगे है और अनपढ़ भी। वज्रमूर्ख, आधे मूर्ख और जड़मूर्खों से लेकर होशियार और  डेढ़ होशियार सारे के सारे इन दिनों व्यस्त हो गए हैं। सभी को असहिष्णुता के नारे लगाने का  धंधा जो मिल गया है। नाम का नाम और बवाल का बवाल।

सभी को लगता है कि जैसे भारत में अचानक कोई भूकंप आ गया है।

सारी समस्याएं नदारद, पुरस्कार लौटाने की नौटंकियां बंद, समाज और देश के लिए कुछ करने की बात नहीं,  आतंकियों के खात्मे की चर्चा नहीं, और लो ये आ गया भूत असहिष्णुता का।

पता नहीं हम लोगों को क्या से क्या हो गया है। हम कहाँ जा रहे हैं, कहां ले जाए जा रहे हैं।

कुछ अरसे से असहिष्णुता उन लोगों का ब्रह्मास्त्र ही हो गया है जिन्हें पब्लिसिटी चाहिए, अपने डूबते हुए सितारों को आसमान चाहिए और गर्दिश में जा रही जिन्दगी को ताजगी।

भारतीय संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से अनभिज्ञ, नासमझ और नुगरे लोगों का बना-बनाया सब कुछ चल पड़ा है।

हर बाजार में चर्चे आम हैं असहिष्णुता के।

सब तरफ असहिष्णुता पर चर्चाओं का बवण्डर जोरों पर है।

गांव की चौपाल से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक इसी की चर्चा है।

हमने अपनी सारी समस्याओं, अभावों, आवश्यकताओं और बुनियादी जरूरतों को ताक में रख दिया है और पिल पड़े हैं इस शब्द पर जैसे कि पूरी दुनिया की डिक्शनरी में अब यह एक ही शब्द बचा है - असहिष्णुता।

सारे के सारे इसी के सहारे वैतरणी पार करने चले हैं।

जिधर देखो उधर असहिष्णुता शब्द को धारदार हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा है।

पता नहीं ं आजकल यह सब क्यों हो रहा है।

जानकार लोग समझते हैं इसके पीछे आखिर माजरा क्या है।

बाकी सारे लोग भ्रमित होकर इस शब्द का खोल ओढ़े हुए इधर से उधर भाग रहे हैं। भीड़ का अपना चरित्र नहीं होता और रेवड़ों में शामिल भेड़ों के विचरण पर लगाम होती है उनकी जो उन्हें ले जाते हैं।

इन दिनों यही सब तो हो रहा है हमारे आस-पास, सर्वत्र।

भारत को जानें, इसकी संस्कृति और परंपराओं का अध्ययन करें, पाश्चात्यों के पिछलग्गू न बनें।

फिर देखें, अपने आप आत्मा से स्वीकारने लगेंगे कि ब्रह्माण्ड भर में भारत जैसा सहिष्णु और कोई नहीं।

 

---000---

दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget