शनिवार, 21 नवंबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - नाम न लें उनका जो हाशिये लायक हों

नाम न लें उनका

जो हाशिये लायक हों

डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जिन्हें इंसान होने के लायक तक नहीं माना जा सकता।  इन लोगों का स्वभाव, व्यवहार और चरित्र ही ऎसा है कि इनके कारण से जमाने भर में इंसानियत का खात्मा हो रहा है। इनसे लोग भी परेशान रहते हैं और जमाना भी।

दुनिया भर में पक्ष-विपक्ष, वाद-विवाद-प्रतिवाद आदि सब कुछ विद्यमान है। सकारात्मकता और नकारात्मकता का प्रभाव सभी स्थानों और व्यक्तियों के लिए सर्वत्र व्याप्त है। इसी प्रकार हर इंसान और क्षेत्र में समर्थक और विरोधी भी होते हैं।

आज की दुनिया में कोई सा इंसान ऎसा नहीं हो सकता जिसे अजातशत्रु कहा जा सके। कारण यह है कि इंसान के रिश्ते अब स्वाभाविक नहीं बल्कि पारस्परिक स्वार्थ पर आधारित हो गए हैं इसलिए इनमें इंसानियत के सारे पैमाने खत्म हो गए हैं।

कुछ लोग हो सकते हैं जिनके लिए मानवीय मूल्य सर्वोपरि और अनुकरणीय हों, अन्यथा बहुसंख्य लोग आज भी उन्हीं से मतलब रखते हैं जिनसे कोई काम हो अथवा काम हो पाने की कोई सी संभावनाएं बनी हुई हों। इस मामले में सत और असत, अच्छों और बुरों, काबिलों और नाकाबिलों, लायकों और नालायकों के बीच संघर्ष का दौर हर युग में विद्यमान रहता है और अपना-अपना परिणाम देता है।

चूंकि कलियुग है इसलिए असत का प्रभाव ज्यादा है और इस कारण से दुष्टों और नकारात्मकताओं का प्रभाव कुछ ज्यादा ही है। यही कारण है कि अच्छे लोग सभी स्थानों पर यह महसूस करते हैं कि वाकई कलियुग अपना प्रभाव दिखा रहा है।

इन सभी प्रकार की द्वन्द्व भरी स्थितियों में सर्वत्र बेहतर माहौल स्थापित करने और सकारात्मक प्रभावों का विस्तार करने के लिए जरूरी है कि अच्छों और सज्जनों की चर्चा की जाए, अच्छे कामों को सराहा जाए, अच्छाइयों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए और  वैचारिक भावभूमि से लेकर कर्मयोग तक सभी में शुभ-मंगल सोच को ही आत्मसात किया जाए।

हम जिस वस्तु या व्यक्ति का चिन्तन करते हैं उसके गुणधर्मों के प्रति किसी न किसी प्रकार से हमारे मन और दिमाग में सूक्ष्म तंतु जन्म लेते हैं जो उन लोगों से जुड़कर बेतार तरंगों के माध्यम से ऊर्जाओं और शक्तियों का परिवहन करते रहते हैं। यह स्थिति बुरे लोगों के लिए तो अच्छी कही जा सकती है क्योंकि उन्हें फायदा ही होता है। पर अच्छे लोगों के लिए यह स्थिति आत्मघाती होती है क्योंकि उनकी संचित ऊर्जा, समय और चिन्तन क्षमता का क्षय होता है।

आम तौर पर हर बुरा इंसान प्रतिक्रिया पाकर प्रसन्न होने को अपने जीवन का सर्वाधिक और अनिर्वचनीय आनंद मानता है और इस लिहाज से वह अपने द्वारा किए गए प्रत्येक बुरे कर्म की प्रतिक्रिया को जानने के लिए उतावला रहता है। यदि उसकी बात पर कोई गौर कर लेता है तो उनकी ऊर्जा बहुगुणित हो जाती है और वह दुगूने उत्साह से अपने नकारात्मक और अंधेरों भरे कार्य करने लग जाते हैं। और कोई इनकी हरकतों की उपेक्षा कर दिया करता है तब वह चुप हो जाते हैं।

बुरे लोगों पर अंकुश और उन्हें नकारने के लिए यह जरूरी है कि उनकी हर तरह से उपेक्षा की जाए। यह उपेक्षा तभी संभव है जबकि हम बुरे और नालायक लोगों को हतोत्साहित करें। और यह भी नहीं कर सकें तो नालायकों, हरामखोरों और कमीनों के बारे में कभी भी कहीं भी चर्चा न करें। इनका नाम तक न लें। और जीवन भर के लिए यह मान लें कि बुरे लोगों का नाम तक लेना पाप है और जो यह पाप करता है उसका कोई प्रायश्चित कभी नहीं होता।

मित्रों में चर्चा हो या कोई सा मंच हो, दुष्टों का कभी नाम न लें, उनकी चर्चा भी कभी न करें। इससे बड़ा और कोई सूत्र इनसे मुक्ति पाने का और कुछ नहीं है।

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