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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - देशद्रोह से कम नहीं यह चुप्पी और तटस्थता

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जो सच है वह हमेशा सच रहेगा चाहे कोई सा युग हो, कैसी भी परिस्थितियाँ हों। इसलिए सत्य पर चलने और सत्य का प्रकटीकरण करने में जो विश्वास रखता है वस्तुतः वही सच्चा और अच्छा इंसान हो सकता है।

झूठ बोलने, मिथ्या संभाषण और बकवास करने वाले, अनर्गल चर्चाओं में लिप्त रहने वाले और झूठ के सहारे जिन्दगी को सफल बनाने का भ्रम पाले और फैलाने वाले, लफ्फाज और धूर्त लोग इंसान की श्रेणी में नहीं गिने जा सकते।

इंसान वही जिसमें इंसानियत हो। मात्र इंसानी जिस्म का होना काफी नहीं। जो लोग रंगे सियारों और लल्लो-चप्पो करने वाले लोमड़ों की तरह रहते हैं, उनकी कलई एक न एक दिन खुलने वाली है।  भगवान के घर तो इनका सारा हिसाब-किताब दर्ज हो ही रहा है।

जिन लोगों के पास दूसरों की अपेक्षा अधिक बुद्धि है वे बुद्धिजीवी कहे जाते हैं। इन पर समाज और देश को सत्य का ज्ञान कराने की अहम जिम्मेदारी है लेकिन आजकल कुछेक अपवादों को छोड़कर बुद्धिजीवियों की ढेरों किस्में ऎसी हो गई हैं जो अपनी छवि को साफ-सुथरी रखने की आदत पाले हुए होने के कारण गोलमाल भाषा शैली में रमी रहती है अथवा नीम बेहोशी में गए आदमी की तरह घनी चुप्पी साध लिया करती है ताकि अपना नाम न आए और मामला समय पाकर अपने आप सुलट जाए।

इसी वजह से अब बुद्धिजीवियों की जमात के बारे में साफ-साफ कहा जाने लगा है कि जो लोग अपनी बुद्धि को जीवन का आधार बनाकर इसका जायज-नाजायज इस्तेमाल करने में माहिर हो जाते हैं, अपनी कुटिल चालों और गोरखधंधों के माध्यम से बौद्धिक युद्धवीर हो जाते हैं वे लोग बुद्धि के सहारे छल-कपट और षड़यंत्रों का सहारा लेकर अपने आपको प्रतिष्ठित भी कर लिया करते हैं और समृद्धि के तमाम द्वारों को खोलने के लिए जिन्दगी भर जी तोड़ कोशिश करते रहते हैं।

इस मामले में अब लक्ष्मी और सरस्वती के बीच परंपरागत वैर की बात बेमानी साबित होती जा रही है। अब तो जिसके पास सब कुछ करने-कराने की बुद्धि है, जो बुद्धि का भरपूर इस्तेमाल अपने लिए कर लेता है, वह लक्ष्मी का दास होकर लक्ष्मी पाने के लिए मचलता रहकर समृद्धि पाता रहता है।

यों बुद्धिजीवियों को संवेदनशील, मानवीय और परोपकारी कहा जाता है लेकिन हम सारे बुद्धिजीवी मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों भरे अपने दायित्वों को निभाने की कसौटी पर कितने खरे उतर रहे हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

समाज और देश नित नए बदलाव और सम सामयिक परिमार्जन के दौर से गुजरता रहता है। कई विषम परिस्थितियां, विवाद और भ्रमों का माहौल सामने आता रहता है। कई मर्तबा यह बहसें स्थानीय से लेकर प्रादेशिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक भी पहुँच जाती हैं।

इन हालातों में बुद्धिजीवियों की सर्वाधिक जिम्मेदारी है कि समाज को सत्य का अहसास कराए, सत्य और धर्म का पक्ष लेकर वास्तविकता का भान कराए। लेकिन देखा यह गया है कि अपने आपको महान बुद्धिजीवी, विद्वान, विदुषी, समाजसेवी, साहित्यकार, चिंतक, मनीषी, शिक्षाविद्, समाजसुधारक और दूसरी सभी प्रकार की महानता को संकेतित करने वाली उपाधियों और उपनामों वाले लोग जानबूझकर चुप्पी साध लेते हैं।

इन लोगों के जीवन का एक ही मकसद रह गया है कि जहाँ कोई लाभ या पद का अवसर हो, सारे समझौतों और समीकरणों का इस्तेमाल कर हथिया लो, भोगों और मस्त रहो।  सामाजिक और देशीय मामलों में ये अक्सर मूक पशुओं की तरह बैठे रहते हैं जैसे कि इन्हें कुछ भी मालूम न हो।

जहाँ कहीं इनकी अस्मिता पर कोई आँच आए, सुविधाएँ छीनने की बात हो या लाभ में कटौती जैसा कोई सा अवसर आ जाए, ये हिंसक जानवरों की तरह इकट्ठे होकर विरोध जताने लग जाएंगे, जैसे कि कोई सा वैश्विक संकट अचानक आ धमका हो।

हो हल्ला मचाते हुए आसमान को ऊँचा उठा लेंगे और दूसरों का जीना हराम कर देंगे। लेकिन देश और समाज के विषयों में कोई सा विवाद हो तटस्थता के ढेरों कंबल ओढ़े हुए शीत निष्कि्रयता में ऎसे घुस जाएंगे कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

बुद्धि हर मामले में सत्यासत्य को पहचानने और दूसरों को इसका भान कराने के लिए है न कि तटस्थता ओढ़कर नपुंसकता अपना लेने में। इस हिसाब से इन तटस्थ बुद्धिजीवियों को चतुरबुद्धि प्राणी कहा जाना ज्यादा प्रासंगिक होगा।

देश का कोई सा क्षेत्र हो, जब-जब भी किसी न्याय और सत्य बात का पक्ष लेने और अन्याय एवं असत्य का प्रतिकार करने की बात सामने आए, बहुत सारे स्वयंभू, आत्मप्रतिष्ठ और छद्म बुद्धिजीवी चुप्पी साधे बैठे रहते हैं।

इन सभी को यह खतरा रहता है कि इससे ध्रुवीकरण हो जाएगा और उनकी अजातशत्रु वाली छवि पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इससे हो सकता है कि समय बदल जाने पर उनकी पूछ करना लोग बंद कर दें।  अपने स्वार्थ, पद-प्रतिष्ठा, सम्मान, अभिनंदन और मंचीय-लंचीय मोह एवं भाषणानंद की प्राप्ति ही इनके जीवन का लक्ष्य बन गया है, समाज और देश की कोई चिन्ता इन्हें नहीं है।

अपने-अपने क्षेत्रों में ऎसे तमाम छद्म-तटस्थ बुद्धिजीवियों की ओर एक बार निगाह डाल लें, अपने आप सत्य का भान हो जाएगा कि कौन कितने पानी में है, कौन किस कंदरा में घुसा चुपचाप और किसके पल्लू में छिपा बैठा है।

वरना समाज और देश का कोई सा मुद्दा हो, बुद्धिजीवियों का धर्म है कि तटस्थता की बजाय मुखर होकर सामने आएं और अपने कर्तव्य कर्म का पालन करते हुए लोगों को सत्य एवं धर्मसंगत बातें बताएं, लोेक जागरण करें। 

आजकल तटस्थता ओढ़े दुबके रहना हमारा स्वभाव हो गया है और इसी कारण से देश में असामाजिक, अनैतिक और दुराचारी तत्वों का बोलबाला है। भारतमाता के बारे में वे कुछ भी अनाप-शनाप बोल जाते हैं और हम महा-बेशर्म लोग तटस्थ होकर सब कुछ देखते-सुनते रहते हैं।

यह तटस्थता अपने आप में देशद्रोह से कम नहीं है जहाँ देश की परंपरागत प्रतिष्ठा, गर्व और गौरव की बात हो, वहाँ हमारा प्राथमिक फर्ज बनता है कि जो लोग झूठ बोलकर, बवेला खड़ा कर दुनिया में भारत का दुष्प्रचार कर रहे हैं उन्हें मुँहतोड़ जवाब दें और सभी मिलकर ऎसा कुछ करें कि अगली बार कोई भारतमाता के प्रति ऎसी बात कहने का दुस्साहस तक न कर पाए। आज तटस्थ बने रहे तो हमारा भी इतिहास लिखा जाएगा और इस  कलंक को सदियों तक धोया नहीं जा सकेगा।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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