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दीपक आचार्य का आलेख - वनवासियों का कला पर्व ः दीवाली

- डॉ. दीपक आचार्य

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        वनवासी संस्कृति वैविध्यपूर्ण रंगों और रसों का निरन्तर लहराता समन्दर है। इसका हर पहलू चरम आनंदायक होने के साथ ही कलात्मकता से परिपूर्ण भी है। वनवासी संस्कृति में नृत्यों, लोकवाद्यों, उत्सवों, मेलों, पर्व त्योहारों, सामाजिक रीति-रिवाजों, रहन-सहन, मेहमानवाज़ी, और सभी प्रकार के आयोजनों में विलक्षणताएँ विद्यमान हैं।  आज भी अपनी इन विशिष्ट परम्पराओं को वनवासी पूरी मौलिकता के साथ बरकरार रखे हुए अभावों के बावजूद मस्ती के साथ जीवनयापन कर रहे हैं।

        दीपावली इनका प्रमुख त्योहार है जो सामाजिक, धार्मिक एवं आह्लादकारी आयोजनों के अलावा कला की दृृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। दीवाली की तैयारियां इनके टापरों-घरों में काफी दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं।  इस पर्व पर गृहसज्जा पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सदियों से चली आ रही गृहसज्जा की मौलिक कला आज भी दर्शकों को दीवाना बना देने के लिए काफी है।

        शादी ब्याह, होली-दीवाली आदि पर घर-आँगन को लीप पोतकर दीवारों, घरों में भांति-भांति के आकर्षक चित्र बनाये जाते हैं। दीवाली पर कला की अभिव्यक्ति का चरमोत्कर्ष पूरे वागड़ में दिखाई देता है इनकी कला प्रियता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

        दीपावली की खुशी में घर की साफ-सफाई की जाती है और काली मिट्टी से घर-आँगन  लीपा जाता है। कपूआ, खड़ी, चूना, रंगों आदि से पुताई की जाती है। इसके बाद घर की दीवारों व  आँगन को सजाने का काम शुरू होता है।  प्रकृति के बीच रहने वाले वनवासियों के लिए घर की दीवारें और आँगन ही कैनवास हैं और पेड़-पौधों की टहनियों से बनाई गई डण्डी ही कूची का काम करती है।

        चित्रकला महाविद्यालय और प्रशिक्षण शालाओं से दूर जंगलों में जीवन बिताने वाले वनवासी के लिए तो प्रकृति के विभिन्न कारक और उसका मौलिक चिन्तन ही चित्र बनाने का प्लेटफार्म होता है।

भांति-भांति के हर्बल रंगों को मिलाकर तैयार होता है इनका रंगकर्म। इनके लिए आधुनिक संसार की बजाय प्रकृति का मौलिक स्वरूप एवं आस-पास का जीवन अभिव्यक्त होता है इन चित्रों के माध्यम से।

        कला के शाश्वत दर्शन वनवासियों के टापरों में ही होते हैं। कई वनवासियों के हाथ तो हर त्योहार पर लगातार चित्रकारिता करते हुए अनुभवी होकर इतने सधे हुए होते हैं कि इनके बनाये चित्रों पर मंत्रमुग्ध हुए बगैर नहीं रहा जा सकता।

        इनके विषयों में जंगल, देवी-देवता, ऋषि-मुनि, स्वस्तिक, सूर्य-चन्द्र विभिन्न यंत्रों की तरह आकृतियां, पशु-पक्षी जिनमें ज्यादातर मोर, गाय, बैल बनाये जाते हैं। इसके अलावा टापरा-मकान, खेत, नाव, पेड़-पौधे, और वह सब कुछ होता है जो प्रकृति से सीधा जुड़ा हुआ है।

        दीवाली पर खासकर दीप श्रृंखलाओं, फुलझड़ियों, वेवण-वेवाई आदि के प्रतीकात्मक चित्र बनाते हैं। जिस घर में शादी के बाद पहली दीवाली मन रही होती है वहां बनने वाले इस प्रकार के चित्रों का अन्दाज की कुछ निराला होता है। सिरा बावज़ियों के स्थानकों एवं भगतों के घरों पर दीवाली पर धार्मिक चित्र बने होते हैं व वहां सफेद रंग के बड़े-बड़े झण्डे लगाये जाते हैं। कई बार तो इस तरह की आकृतियों का निर्माण होता है मानों प्राचीन काल के किन्हीं यंत्रों का निर्माण किया गया हो।

        आधुनिक पर्यावरण चेतना का संदेश देने वाले इन चित्रों में जिस तरह से मकान की आकृतियां बनाई जाती हैं उसके पास फुलवारी, बंग-बगीचा, पेड़-पौधे, कुआ, नहर आदि सब कुछ होता है जो पर्यावरण की रक्षा के लिए जरूरी है।

        सौहार्द और प्रेम का संदेश भी इन चित्रों में कूट-कूट कर भरा होता है, अधिकांश चित्रों में दो या दो से अधिक व्यक्तियों को एक दूसरे का हाथ थामे दिखाया जाता है वहीं स्वस्तिक और ‘‘ॐ’’ तथा श्रीराम, गुरुजी आदि के माध्यम से धार्मिक प्रतीकों के प्रति अगाध श्रद्धा अभिव्यक्त की जाती है।

        आज भी गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश के इन सरहदी वनवासी बहुत क्षेत्रों में यह कला जीवन्त बनी हुई मनुष्य जाति को प्रकृति के चित्रांकन की मौलिकता का शाश्वत संदेश सुना रही है।

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अनूठी लोक परंपराओं का आकर्षण बिखेरती है वनाँचल की दीवाली

       - डॉ. दीपक आचार्य

भारतीय संस्कृति का प्रमुख पर्व दीपावली देश के विभिन्न हिस्सों में चिरकाल से अपनी विभिन्न परम्पराओं और विशिष्टताओं के साथ मनाया जाता रहा है और हर इलाके में इसके मनाने का ढंग अपने किस्म का अनूठा ही है।

अंधकार से प्रकाश की ओर गतिमान होने का संदेश देने वाला यह तिमिरहर पर्व युगों-युगों से मानव सभ्यता  को प्रकाशित व उल्लसित करता आया है। कथाओं के अनुसार अंधियारे के प्रतीक आततायी रावण के समूल संहार के पश्चात भगवान राम के अयोध्या आगमन की खुशी में घर-आँगन दीप प्रज्वलित कर इस उल्लास पर्व की शुरूआत की गई।

बेमिसाल है पहाड़ी क्षेत्रों की दीवाली

राजस्थान में भी यह प्रकाश पर्व पारम्परिक ढंग से हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। प्रदेश के आदिवासी अंचल वागड़ क्षेत्र में दीपावली को जिस ढंग से मनाया जाता है वह अपने आप में बेमिसाल होने के साथ ही आंचलिक संस्कृति के वैशिष्ट्य को भी प्रतिबिम्बित करता है।

आम तौर पर वाणिज्य-व्यापार से जुड़ा होने से यह पर्व लक्ष्मी पूजा प्रधान है लेकिन खेती-बाड़ी प्रधान आदिवासी इलाकों में पशुधन को भी लक्ष्मी की ही तरह मानकर इस पर्व को ‘पशु पूजा उल्लास पर्व ’ रूप में मान्यता प्राप्त है।

परंपराओं की धूम

आदिवासी क्षेत्रों में दीपावली एक-दो दिन तक नहीं बल्कि पखवाड़े भर तक किसी न किसी रूप में धूम मचाती है। घर की साफ-सफाई से लेकर लिपाई-पुताई तथा रंग-रोगन के साथ ही नवीन परिधानों की खरीद, दीवाली आणा की मस्ती, लोक सांस्कृतिक विधाओं और मनोहारी सामाजिक रस्मों का प्रदर्शन होता है जिसमें सभी की भागीदारी होती है। यहाँ दीवाली के दिनों में घर के पशु भी आनंद भाव का अनुभव करते हैं।

पशु भी मनाते हैं उत्सव

ग्राम्यजन दीपावली के दिन बडे़ सवेरे उठकर अपने अपने पशुओं को गांव के पास के नदी-नालों या तालाब कुओं पर ले जाकर पानी से अच्छी तरह नहलाते हैं व साफ कपड़े से शरीर पोंछ कर अपने पशुओं को रमजी या भांति-भांति के रंगों की वार्निश से रंग-बिरंगे कर देते हैं। पशुओं के सिंग, खुर पर रंग के अलावा सारे ही बदन पर छापे लगाकर आकर्षक बना देते हैं।

गाय की पूजा से आती है लक्ष्मी

इस दिन पशुओं की खास तरीके से पूजा होती है। आरोग्य तथा रक्षा के लिए अपने पितरों और भगवान का नाम लेकर पशुओं के गले में घुंघरू और कड़वा (ऊन/बालों की बनी रस्सी, फूंदी ) बांधते हैं, पक्वान्न खिलाते हैं। मान्यता है कि दीवाली पर गाय की पूजा से घर में सम्पन्नता आती है।

मिठास भरता है मेरीया

दीवाली पर गन्ने के टुकड़े काटकर इस पर रूई या कपड़ों की बत्तियाँ बना कर एक मशाल का निर्माण किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में ‘‘मेरिया’’ कहते हैं। इस पर तेल डालकर प्रज्वलित करने के बाद सबसे पहले ये लोग समूहों में पास के मंदिर में जाकर देवता को दिखाते हैं तथा जोर-जोर से ‘मेरिया’ शब्द उच्चारित कर देवदर्शन करते हैं। इन मेरियों को पशुपालक अपने पशुओं को भी यह बोलते हुए दर्शाते हैं -

‘‘आळ दिवारी काळ दिवारी, पमने दाड़े मेरीयू,

कारी गाय धोरी गाय, राजा रामचन्द्रजी नु मेरीयू

पशु क्रीड़ा का आनंद

ग्रामीण स्त्री-पुरुष भी इस दिन बड़े सवेरे नहा-धोकर अपने पारम्परिक परिधानों में सुसज्जित होकर घर के बाहर निकल जाते हैं और अपने-अपने पशुओं को लेकर हाँकते हुए गाँव के बाहर मैदान पर एकत्रित होते हैं, अपने पशुओं को उन्मुक्त भ्रमण के लिए छोड़ देते हैं व पूँछ पकड ़ कर दौड़ाते हुए पशु क्रीड़ा का जी भर कर मजा लेते हैं। इस दिन ग्वालों को अन्न-वस्त्र देकर सम्मानित किये जाने की भी परंपरा है।

ली जाती है भविष्य की टोह

ग्राम्य युवतियां भी आभूषण धारण कर अपने परिजनों के घर जाकर दीपावली की शुभकामनाएं व्यक्त करती हैं। बांसवाड़ा जिले के आबापुरा, डूंगरा, सज्जनगढ़ व बड़ली पाड़ा इलाकों में दीपावली पर अच्छे ख़ासे मेले भरते हैं। इनमें गायों को दौड़ा कर उनके माध्यम से भविष्य का अनुमान पाया जाता है।

गांवों में पशुओं के आने-जाने के रास्ते में अभिमंत्रित रस्सी बांधी जाती है  जिसके नीचे से होकर रोजाना पशु गुजरते हों। ऎसी मान्यता है कि इससे गांव के पशुओं को रोग व महामारी की सम्भावना नहीं रहती है।

दीपावली पर ऎसी ढेरों परंपराओं का दिग्दर्शन राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात के इस सरहदी जनजाति अंचल में होता है। तभी कहा जाता है कि वागड़ की दीवाली दुनिया भर में न्यारी है।

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(डॉ. दीपक आचार्य)

महालक्ष्मी चौक, बांसवाड़ा(राजस्थान)

सम्पर्क ः 9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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