रविवार, 15 नवंबर 2015

संतोष मौर्य की कविता - मंथन

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"मंथन"
मेरा मन; अकथयत्
अगाध बाधा,
अदम्य पीड़ा,
से परिपूर्ण!

हृदय शून्य में,
वाचाल स्पंदन
निर्भय निर्बल
स्वप्न अपूर्ण!
अप्रकाशित मार्ग
अदृश्यत्!!
एवं मेरा मन
अकथयत्!!!

अबूझ्य ,गूढ़
जीवन चरित्
रक्त ,विरक्त
झंझावात!
एवं
नैतिक कर्तव्य
विस्तृत!!

संतोष मौर्य

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