रविवार, 15 नवंबर 2015

उमेश मौर्य का व्यंग्य - खर्राटे

उमेश मौर्य का व्यंग्य खर्राटे

खर्राटा न ही बीमारी की श्रेणी में आता है और न ही किसी आदत की श्रेणी में। मेरे ख्याल से तो जिस प्रकार समाधि, ध्यान की उच्चतम अवस्था है। आत्मा से परमात्मा के एकाकार की अवस्था है। खुद के लिए भी और आसपास के वातावरण, जीव-जन्तुओं के लिए भी आनन्द स्वरूप है। उसी प्रकार खर्राटा भी नींद की चरम अवस्था है। और तरह तरह के नये नये अनुभवों का साधन भी। इसमें भी साधक चरम सुख का अनुभव करता है। लेकिन अन्तर इतना है कि ये दूसरों के लिए चरम दुख की अवस्था है। पूर्णतया स्वार्थवादी आनन्द पर आधारित है।

मुझे भी खर्राटे बहुत आते थे। जिसके कारण मुझे इससे पहले दो पत्नियॉ छोड़ चुकी। लेकिन अब बिना शादी के जीवन कैसे चलता। शादी तो जरूरी थी। विवाह मोक्ष का मार्ग है। बिना उसके तो गृहस्थ आश्रम का निर्वाह भी सम्भव नहीं। इसके बिना तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और अगले जनम के सारे रास्ते पूर्णतया बन्द दिख रहे थे। उमर भी अभी अच्छी खासी थी। जवान था। पूरा जीवन बाकी था। दूसरे आजकल का दूषित वातावरण। ब्रह्मचर्य पालन तो बहुत कठिन काम था। लेकिन आजकल के कोलाहल पूर्ण जीवन में कोई भी स्त्री कम से कम रात के समय तो शान्ति से सोना चाहेगी।

मेरे जीवन में जितनी भी आई उन्हें मेरे खर्राटों के कारण चैन की नींद नसीब न हुई। बाकी जीवनोपयोगी सुख सुविधा की सारी चीजें मॅुह खोलते ही आसानी से उपलब्ध थी। मेरे खर्राटे भी ऐसे वैसे नहीं कि समझौता किया जा सके। तरह तरह की आश्चर्य जनक आवाजें जिसकी कल्पना भी सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकते। वो भी पूरे आत्मविश्वास के जोर से।

रोड छाप आवाजें निकलती थी। कभी मोटर साईकिल की, कभी मारूती की, कभी कभी तो बहुत मॅहगी-मॅहगी गाड़ियों वाले खर्राटे भरता था। मर्सडीज, फेरारी, बी.एम.डब्लू., पराडो, लाखों और करोड़ों वाले खर्राटे थे। ट्र्क और ट्रैक्टर की आवाज के खर्राटो पे तो हमेशा नये नये शोघ चलते रहते थे। पुराने ट्रैक्टर के, नये ट्रैक्टर के, खेत में, बारिश में, या सड़क पे, हर समय और स्थान के आधार पर। बुलट की आवाज तो फेवरेट थी। वो बिना गेयर वाली गाड़ी विक्की। तेल मॅहगा हो जाने से रोज उसी से दौड़ता था। ऐवरेज अच्छा देती थी। पूरी रात चलती थी। एक दिन तो राकेट जैसी आवाज निकाल रहा था सॅू-सॅू। जहाज पे भी बहुत बार सफर करते रहते थे । मेरे लिए कोई भी फ्लाइट बाकी न थी। किंगफिशर मेरी पसंदीदा फ्लाइट थी। लेकिन उसमें हड़ताल चल रही थी तो अभी कोई भी चलती थी।

जैसा भी था। खर्राटों की आवाज का सफर तो मेरा बहुत सुखमय रहा। मुझे कभी भी परेशानी नहीं हुई। मैं अभ्यस्त हो गया था। किसी भी सफर का। लेकिन अब अकेले मेरी इस प्रतिभा को समझने वाला कोई तो होना चाहिए था। मुझे खुद कैसे मालूम चलता। चिराग तले अंधेरा तो रहता ही है।

मेरे ये सारे गुण मेरी भूतपूर्व पत्नियों के द्वारा प्रकाशित हुआ। और बधाई देकर बड़े गर्व के साथ छोड़कर चली गई। ये कहते हुए कि- चलाओ ये अपनी नई-नई मॉडल की गाड़ियॉ और उड़ाओ जहाज। लेकिन मेरी सहानुभूति उनके साथ आज भी है और अभी भी है। भगवान से मनाता हॅू कि उन्हें अब जहाँ भी रहें चैन की नींद दे। और क्या कह सकता हॅू। ये आपने हाथ में थोड़ी था। हो सकता है भगवान की इसी में कुछ लीला हो।

अब शादी के लिए लड़की खोजने लगा। क्या बताऊं हर जगह यही बात कि इतना अच्छा खासा नौजवान आदमी दो बार शादी हुई दोनों लड़कियॉ छोड़ कर चली गई क्या बात है। तरह तरह की बातें लोग सोचने लगे। मैंने सोचा अब रिश्तेदारी में खोज छोड़ो समाचार पत्र में निकलवा देते है।

सब कुछ ईमानदारी से साफ-लिखवा दिया कि -एक सुन्दर, सुशील, रंग गोरा, काली भी चलेगी। थोड़ा कम लम्बी हो और थोड़ी कम मोटी भी हो। उम्र 25 से 30 के बीच में होनी चाहिए। अनिवार्य शर्त के रूप में एक मोटी लाईन लिखवा दी। उपरोक्त सारे गुण न भी हो तो कोई बात नहीं। लेकिन खर्राटे वाली लड़की ही चाहिए। जिससे हम एक दूसरे की प्रतिभा को समझ सकें। मेरी उम्र 26 साल है। जिला अस्पताल में नाक, कान, गला रोग विशेषज्ञ हॅू। सारी सुख सुविधा की गारन्टी मैं लेता हॅू। लड़की जिसको ये शर्त मंजूर हो निम्न पते पर सम्पर्क करे

- उमेश मौर्य

सराय, भाई, सुलतानपुर,

उत्तर प्रदेश, भारत।

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(ऊपर का चित्र - चारू कुमार की कलाकृति)

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