शनिवार, 28 नवंबर 2015

सुशील यादव का व्यंग्य - बातों का आतंकवाद

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बातों का आतंकवाद .....

हमारे देश में टी वी युग के आरंभ से एक नए आतंकवाद का जन्म हो गया है, वो है ‘बातों का आतंकवाद’ ....।

चैनल वाले बड़-बोलों का, पेनल बना के रोज-रोज नया तमाशा परोसने में लगे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ में भड़काऊ वाद-विवाद आये दिन जनतांत्रिक देश में, तांत्रिक रूपी एंकर द्वारा चीख-चीख कर कहा जाता है कि ‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’......?ये कैसी जागृति का ढिंढोरा है ....?जो जनता के कान खाए जा रही है। शायद ही इतना विस्फोटक और विनाशकारी ‘वार्ता-बम’ किसी भी देश के, मीडिया-वालों के हाथ अब तक लग पाया हो जो अपने यहाँ रोज विस्फोटित होते रहता है।

दुश्मनी भांजने में इन चेंल्बाजों का कोई सानी नहीं। सब एकतरफा एक सुर में हमला बोलते हैं। जिस किसी का ये गुणगान कर दें उन्हें देश की गद्दी पकड़ा के दम लेते हैं। एक बार हादी चढाने का तजुर्बा हो गया तो प्रयोग दुहराया जाने लगा।

पर दिल्ली बिहार राज्य के मामले में,उनकी हांडी दुबारा चढाने की बस हसरत ही रह गई। उन्होंने अपनी तरफ से , भरपूर कोशिश की मगर जनता को बना-मना नहीं पाये।

पुराने जमाने में , इस ‘बातूनी आतंकवाद’ का अंडर करंट, सामन्ती-राजसी व्यवस्था में देखने को मिलता था। किसी जगह राजा ,कहीं मालगुजार कहीं का सूबेदार तो कहीं सूदखोर बनिया जमात की बातें ‘दबंगई’ लिए होती थी। उनका कहा एक मायने में, कानून या फतवा से कम नहीं आंका जाता था।

जनता को इनका सामना करने के बाद मुक्ति मिल जाती रही हो, ऐसा भी नहीं था। वे इनके अलावा , दीगर आतताइयों से भी निपटते थे ,निपटते क्या थे अपने आप को पिटवाने के लिए परस देते थे। वे जाति के नाम, मजहब के नाम खुद को नोचवाने -खसोटवाने के लिए बाध्य होने की श्रेणी में गिने जाते थे।

उनकी डिक्शनरी में,या उनकी सोच में ,इन आकाओं के प्रति कभी कोई असहिष्णुता का भाव दूर दूर तक पैदा नहीं हुआ। ‘माई-बाप’ के लिए ,विद्रोह या बगावत की कभी सपने में भी सोचा जाना पाप की केटेगरी का हुआ करता था। वे दयनीय से दयनीय किसी हालात में भी गुजरे उनकी पत्नियों का मनोबल कभी टूटता सा नहीं दिखा करता। अपने पतियों के सामने कभी मुंह नहीं खोलने वाली स्त्रियाँ, घर या गाँव छोड़ के जाने की बात कभी कर या कह भी नहीं पाती थी ....?

अब हालात बदले हैं। अच्छी बात है कि आज आप, जी-भर के किसी को भी कोस सकते हैं। किसी को इस मुल्क में रहने या उसका तंबू उखाड़ने की बात कर सकते हैं। किसी को तमाचा जड़ने के लिए खुलेआम इनाम इकराम की व्यवस्था किया जा सकता है। किसी टार्गेट को उसके बयान और गतिविधियों के इतिहास का बखान करके, कालिख पोतने और पोंछने की राजनैतिक कवायद की जा सकती है। एक से एक बोल-बचन,चेनल के माध्यम से हाईलाईट हुआ करते हैं। सुबह अखबार की सुर्ख़ियों में कमजोर दिल वाले पढ़ कर दुआ मनाते हैं कि फिलहाल आंच उन तक नहीं पहुंच पाई है।

मान हानि के दावे , यदि फिफ्टी परसेंट केस में ‘बुक’ होने लगे तो फरियाद में लगने वाले कागज़ की पूर्ती हेतु एक इंडस्ट्री लग सकती है। टाइपिस्ट की इफरात मांग बढ़ सकती है ,नौकरी के नये सेक्टर बन सकते हैं। लेपटाप की बिक्री जोर पकड़ सकती है। तरफदारी करने वाले हिमायती, या विरोध पक्ष के वकीलों का अकाल पड सकता है।

दरअसल ,इस देश में “लघु शंकाओं का निवारण” ठीक से नहीं हो पा रहा है। सरकार सोचती है की एयर- कंडीशन-शौचालय बना देने से बात बन जाएगी। वे गलत हैं। ये लघुशंका, किडनी उत्सर्जित ताज्य अवशेषों का नहीं है,वरन , जनता की दिमाग उत्सर्जित विष्ठा है। इसे हटाने के लिए,फकत चार पेनलिस्ट के बीच अपना एक प्रवक्ता मात्र , टी वी में बिठा देने से मामला बनने की जगह बिगड़ता दिखता है। ये लोग ताबड़तोड़ बातों की गोलियां, स्टेनगन माफिक चलाने लग जाते हैं। इन्हें कोई भी टापिक दे दो, ये सभी इस मुस्तैदी से डट जाते हैं कि सालुशन केवल उनकी बात में है। ये कभी किसी बलात्कारी संत का बचाव करते दीखते हैं तो कभी मांस के नाम पर मारे गए व्यक्ति के, हत्यारों की पैरवी कर डालते हैं। ये लोग अपने फैब्रिकेटेड-आंकड़ों पर महीनों बहस बेवजह करवा लेते हैं कि, अमुक पार्टी क्लीन स्वीप कर रही है, जबकि परिणाम एकदम विपरीत आता है। यानी जिसका ये दम भरे होते हैं, वही धाराशायी हुआ दिखता है। टी आर पी का खेल गजब का है .....?

जनता बेचारी इडियट बाक्स के एक और आतंक से रूबरू हो रही है ,वो है इनका बाजार भाव में अपनी टाग घुसेड़ना।

होता ये है कि जो अनाज- सब्जी आपके स्थानीय बाजार में कम कीमतों में मिल रही होती है, एक बार दिल्ली की कीमत सुनते ही अपने-आप उछल जाती है। आप बाजार में टमाटर बीस रुपये किलो में तुलवा रहे हैं, तभी दूकानदार की टी व्ही में, अस्सी रूपये किलो का एलान होता है ,दूकानदार वापस अपनी तौल खीच लेता है। कभी दालें सत्तर-अस्सी रूपये किलो की हुआ करती थी ,इनकी बातों ने कीमतों में जहर घोल दिया। ये लोग ,बकायदा रिपोर्ट दिखा देते हैं, फलाने स्टेट में इस साल कम बारिश के चलते दलहन तिलहन फसल चौपट होने के आसार हैं,लो बढ़ गए दाम।

कभी-कभी तो यूँ भी लगता है,कि किसी सटोरिये-लाबी वालों की चल रही है वे इधर स्टाक जमा किये, उधर दाम बढ़ने की बात कह दी।

सरकार कहाँ होती है या कहाँ सोती है......पता नहीं चलता ?

किसी को सुध लेने की जरूरत नहीं महसूस होती।

जनता बेचारी तंग आ के मन बहलाव् की दीगर खबरों में, अपनी (अल्प) बुद्धि खर्च करने में लग जाती हैं।

पसंद न हो तो, चैनल बदलने का अधिकार अभी सब के पास बरकरार है,यही काफी है .....। ........ .?

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com ०९४०८८०७४२० //२७.११.१५

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