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दीपक आचार्य का आलेख - समाज के लिए है धन-वैभव सब कुछ

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

हर इंसान धन के लिए यत्न करता है। कोई जायज रास्तों से धन पाने के लिए निरन्तर संघर्ष करता है और कोई नाजायज रास्तों और शोर्ट कट से धन प्राप्ति के उपायों को अपनाता रहता है।

कुल मिलाकर हम सभी लोग किसी न किसी तरीके से कम से कम समय और न्यूनतम मेहनत या बिना मेहनत के धन-वैभव प्राप्त करने के लिए हर पल प्रयत्नशील रहते हैं।

इस मामले में कोई समझौता नहीं करते। जहां जैसा मौका मिलता है हम उसे अपने हक में भुनाने लगते हैं। नगद प्राप्ति और संग्रहण हमारी पहली प्राथमिकता है। सोना-चाँदी, जमीन-जायदाद और व्यवसाय इसके बाद आते हैं।

लेकिन हैं हम सभी निन्यानवें के फेर में और प्राप्ति ही प्राप्ति की अनथक और निस्सीम दौड़ में। इस मामले में संतोषी लोगों की संख्या बहुत कम है जबकि असंतोषियों की पूरी दुनिया में भरमार है।

जिसके पास जितना है, जितना उसके उपयोग के लिए काफी है, उससे अधिक, और अधिक पाने की तृष्णा हम सभी को महामारी की तरह लगी हुई है।

इस चक्कर में हमने अपने मन-शरीर और मस्तिष्क के धर्म, अपनी दैनन्दिन जीवनचर्या, लोक व्यवहार, सामाजिक दायित्वों, देश भक्ति के संस्कारों और राष्ट्रीय सरोकारों, मनुष्य जीवन के लक्ष्य आदि सभी कुछ को ऎसे भुला दिया है जैसे कि इससे हमारा कोई लेना-देना हो ही नहीं।

सभी लोग पैसों के पीछे पागल हुए जा रहे हैं। हर आदमी अपने आपको दूसरे से अधिक सम्पत्तिशाली और वैभव से परिपूर्ण देखना चाहता है। यह महत्त्वाकांक्षा अच्छी बात है लेकिन दूसरों को वैभव, सम्पत्ति पाने से वंचित करना, उन्हें वंचित रखने के लिए गोरखधंधे अपनाना, नुकसान पहुंचाना और ईष्र्या भाव रखना अपने आप में मानवीय सभ्यता और संस्कृति के साथ कुठाराघात है और यही कारण है कि समाज में नकारात्मकता, अस्वस्थ और विकारी प्रतिस्पर्धा तथा औरों के प्रति द्वेष जैसे कारणों से सभी की तरक्की बाधित है।

जो दौड़कर आगे बढ़ गया है वह इस बात से दुःखी है कि दूसरे उसकी ही तरह ऊँचाइयां पाने के लिए बेताब होकर उसकी तरफ खींचते चले आ रहे हैं। आगे बढ़ने वाले बराबर गति प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पीछे वाले किसी न किसी बहाने उनकी टाँग पीछे खींचते ही रहे हैं।

खुद भी पीछे जा रहे हैं और आगे वालों को भी बढ़ने नहीं दे रहे हैं। हर बाड़े में ऎसे लोगों की भरमार है जो छीना-झपटी करने के आदी हैं, पराये संसाधनों पर ललचाये हुए जाने कैसे-कैसे हथकण्डे अपना रहे हैं। खुद में न अक्ल है, न कुछ करना चाहते हैं।

हराम का खाना-पीना, मुफत का माल उड़ाना, अनधिकृत चेष्टा करना और अपने आपको दूसरों के मुकाबले श्रेष्ठ एवं अधिकार सम्पन्न समझ कर अधिकारों का दुरुपयोग करना, कर्तव्यहीनता का खुला खेल खेलना तथा शोषण के तमाम रास्ते इस्तेमाल करने का शगल आजकल आम से लेकर खास इंसानों की पहली पहचान बन गई है जिससे कि आभास होता है कि घोर कलियुग आ ही गया है।

आदमी आदमी से खाना-पीना और पार्टी चाहता है, रुपया-पैसा, उपहार और भोग-विलास चाहता है। आदमी अपनी नाजायज आमदनी के लिए आदमी को खाने दौड़ रहा है। हर आदमी दूसरे से कुछ न कुछ उम्मीदें संजोये रखता है और कुछ न कुछ मिलने की आस में ही काम करने की मानसिकता पाले बैठा है।

खाने और जमा करने के मामले में कोई छोटा-बड़ा नहीं है। सारे के सारे किसम-किसम के भिखारियों के रूप में दिखते हैं। इनका बस चले तो अपने-अपने बाड़ों के बाहर दानपात्र रखवा दें। शनि महाराज के नाम पर जितने मांगने वाले हैं उनसे कई गुना बड़े और महान कहे जाने वालों के नाम कुछ न कुछ मांगने वाले पसरे हुए हैं। लगता है कि जैसे भिखारियों की अभिजात्य प्रजाति का उदय हो गया है जहां भीख मांगना, भीख के नाम पर सब कुछ मांग लेना वर्जित नहीं बल्कि सुविधा का हिस्सा है।

फिर बहुत सारे तमाशबीन हर रास्ते, चौराहे और सर्कलों से लेकर तमाम महा-पथों पर जमा हैं। यही एकमात्र वजह है जिसके कारण हम विकसित देश नहीं हो पाए हैं अन्यथा हमारे भीतर समाहित प्रतिभाओं, ऊर्जाओं और सामर्थ्य के आगे कोई टिक ही नहीं सकता चाहे दुनिया का कोई सा देश और उसका कोई सा बन्दा हमारे सामने हो।

हमारी तरक्की में सबसे बड़ी कोई बाधा है तो वह हम लोग ही हैं जो सामूहिक उन्नति, सद्भाव और राष्ट्रीयता को भुलाकर वैयक्तिक स्पर्धा में श्वान दौड़, कैंकड़ा संस्कृति, बंदरिया उछलकूद तथा मदारी-जमूरा तमाशों में रमे हुए खुद भी वहीं के वहीं ठहरे हुए हैं और दूसरों को भी आगे बढ़ने नहीं दे रहे हैं।

आर्थिक और सामाजिक विकास की धुरी सामूहिक धनोपार्जन ही है और जो लोग समाज को केन्द्र में रखकर काम करते हैं वे न शोषक हो सकते हैं, न शोषित। क्योंकि इसमें सार्वजनिक कल्याण की सोच होती है और ऎसी सोच रखने वाला हर इंसान उदारता का प्रतीक होता है।

उदारता अपने आप में ईश्वरीय गुण है। जिसमें उदारता नहीं है वह न ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, न ही उसे सौ जन्मों में ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। यही कारण है कि कंजूस और मक्खीचूस लोगों के बारे में हर कोई यही कहता है कि ये ही वे लोग हैं जो मरने के बाद साँप बनते हैं और अपने धन पर कुण्डली जमाकर हजारों वर्ष तक सर्पयोनि में ही बने रहते हैं। धन के प्रति यही मोह इंसान की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण है। बहुत सारे लोग हमारे आस-पास हैं जो साँप बनने की दौड़ में बने हुए हैं।

धन प्राप्ति के लिए सब कुछ करें मगर इसमें शुचिता, पुरुषार्थ और सामाजिक सरोकारों का पूरा-पूरा ध्यान रखें। जो कुछ है वह इस देश का है, समाज का है इसलिए समाज के प्रति दायित्वों को अच्छी तरह निभाएं और यथाशक्ति धन इस पर खर्च भी करें, तभी हमारा मानव जीवन सार्थक है। जो लोग ऎसा कर पाते हैं उन्हीं का जीवन धन्य है। बाकी तो मेले की भीड़ की तरह आते-जाते रहते हैं या अगले जनम में भुजंग होने की तैयारी में हैं। इन लोगों की शक्लें भी अभी से भुजंग की तरह दिखती भी हैं।

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