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दोहे रमेश के दिवाली पर

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सर पर  है दीपावली, सजे हुवे बाज़ार !
मांगे बच्चो की कई ,मगर जेब लाचार!!

बच्चों की फरमाइशें, लगे टूटने ख्वाब !
फुलझडियों के दाम भी,वाजिब नहीं जनाब!!

दिल जल रहा गरीब का, काँप रहे हैं हाथ !
कैसे दीपक अब जले , बिना तेल के साथ !!

बढ़ती नहीं पगार है, बढ़ जाते है भाव !
दिल के दिल में रह गये , बच्चों के सब चाव!!

कैसे अब अपने जलें, दीवाली के दीप !
काहे की दीपावली , तुम जो नहीं समीप !!

दुनिया में सब से बड़ा, मै ही लगूँ गरीब !
दीवाली पे इस दफा, तुम जो नहीं करीब !!

दीवाली में कौन अब , बाँटेगा उपहार !
तुम जब नहीं समीप तो, काहे का त्यौहार !!

 

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रमेश शर्मा (मुंबई )
९८२०५२५९४० 

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