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अभिमन्यु सिंह चारण की कविता - अंतहीन सीरिया

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बस अब कुछ नहीं बचा है
बची हैं तो यह अँधेरी ख़ामोशी
घरों के मलबे ,
हवा में घुली बारूद की सुगंध ,
और लाल रंग से रंगी टूटी दीवारें ।

टैंकों की आवाज ने दबा दिया है ,
छोटे बच्चों के पैरों की थाप को ।
गिद्धों की क्रूर निगाह ,
ढूंढतीं हैं मरे हुए इंसानी जिस्म को ।
और
हर रोज दावत मनाते हैं ,
काला रंग ओढे इंसानी भेड़िये ।

बाकी रह गया हैं वो पुरानी
यादों का बादल ,
वो पलाश के लाल फूल ,
अमरुद के पेड़ के मीठे फल
जो उसने बड़ी मिन्नतों से
उगाए थे, घर के दालान में ।

सुनहरा " सीरिया " बन गया है
काले धुंए से घिरी एक फैक्ट्री
जहां होता है हर दिन ,
हजारों इंसानों का कत्ल ।

सीरिया अब तो हो जाओ
शांत...शांत ...शांत
गहरी शांति के साथ

(सीरिया के लोगों को समर्पित )

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कविता :- वो छोटी लड़की

वो छोटी सी लड़की
जिसे मैं हर रोज
देखता हूँ ,
सामने वाली गली में
उन प्लास्टिक की थैलियों
के बीच ,
घर से फेंकी हुई
बेकार चीजों के बीच
कुछ ना कुछ खोजते हुए
उन्ही मैले - कुचले अध् फटे
कपड़ों में ।

एक बार जब मैंने झाँका
उसकी आँखों में
मुझे दिखे ,
हजारों रंग बिरंगे सपने
तितली से प्यारे
हाथ में बस्ता लिए
पढ़ने के सपने
डॉक्टर बनने के सपने
आधे - अधूरे हजारों सपने

स्मार्ट शहर की कल्पना के बीच

शायद कभी भारत स्मार्ट-देश बने
उस छोटी सी लड़की के लिए ।

अभिमन्यु सिंह चारण
जालोर , राजस्थान 

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