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अमित शाह की कहानी - कर्ज


राजस्थान के एक छोटे से गांव का पप्पू पांचवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा है। पप्पू के पिता इस दुनिया को कुछ ही वर्षों पहले अलविदा कर चुके है। पप्पू कि अनपढ़ मां गांव में ही एक बनिये कि दुकान पर काम कर अपना घर चलाती है । पप्पू छोटा था परन्तु वह अपनी परिस्थितियों को समझता था । उसी गांव में रामुकाका नाम का एक व्यक्ति भी रहता है, जो पड़ोसी राज्य गुजरात में काम कर अपना घर-परिवार चलाता है। वह कुछ दिनों के लिए गांव आया है, और उधर पप्पू कि वार्षिक परीक्षा पूरी हो चुकी है और स्कूल में अवकाश चल रहे हैं। जब रामुकाका को यह बात पता चली तो वह पप्पू के घर पहुंच गए ।

उन्होंने पप्पू कि मां से अवकाश के दौरान उसे नौकरी के लिए गुजरात ले जाने कि बात कहीं । पप्पू की मां ने जब यह बात पप्पू से कहीं तो पप्पू भी बाहर जाने के लिये तैयार हो गया । पप्पू को दो दिन बाद शहर के लिए जाना तय हो गया । पप्पू ने सपने देखने शुरू कर दिए, वह मन ही मन सोच रहा था जब वह गांव वापिस आएगा तो वह अपनी मां के लिये नई साडी खरीद कर लाएगा और पढ़ने के लिये कॉपियां, अपने कपड़े इत्यादि लाएगा । उसने यह ठान ली थी कि वह अपनी मां से इस बार स्कूल जाने के लिए कुछ भी नहीं मांगेगा। इन सभी सपनों के साथ पप्पू रामुकाका के साथ गुजरात के शहर अहमदाबाद में चला जाता है।

रामुकाका पप्पू को पहले दिन शहर घुमाते हैं उसके बाद उसे एक ठेकेदार के पास नौकरी के लिए रख देते हैं जो बड़े -बडे़ होटलों कि सफाई करवाने का काम करता है । पप्पू से वह होटलों के शौचालयों कि सफाई इत्यादि का काम करवाता है । पप्पू ने अपने सपने पूरे करने के लिए यह काम करना भी उचित समझा । कुछ दिन बीत गए। उसे अपनी मां की बहुत याद आ रही थी और रामुकाका की भी, पर रामुकाका काम में लगवाने के बाद अब तक उसे मिलने ही नहीं गए ।

वह अपने ठेकेदार से बार-बार रामुकाका से मिलने की गुहार करता परन्तु ठेकेदार हमेशा कुछ न कुछ बहाने बनाकर बात को टाल देता। ज्यादा आग्रह करने पर उसे मार खानी पड़ती। उसे कई बार खाना भी नहीं दिया जाता । पप्पू को अब कुछ दाल में काला नजर आने लगा । वह मन ही मन भाग जाने की सोचता, परन्तु उसके पास पैसे भी नहीं थे और उसे अकेला कभी छोड़ा भी नहीं जाता। उसके पास अनेक समस्या थी । स्कूल पुनः खुलने का समय नजदीक आ गया था।

उधर, पप्पू की मां को भी बेटे कि याद में तड़प रही है । उसके कोई समाचार नहीं मिलने पर वह काफी चिंता में है। वह रामुकाका के घर जाती थी तो कहां जाता कि उसे शहर अच्छा लगने लग गया हैं वह गांव आने के लिए मना बोल रहा है। परन्तु सच तो पप्पू ही जानता था । गांव में यह बात आग की तरह फैल जाती हैं तब एक स्वयंसेवी संस्थान के कर्मचारी को पता चलती हैं। संस्था के प्रबंधक महोदय रामुकाका के शहर में रहने कि जगह का पता लगाते हैं और वह शहर में पहुंच कर रामुकाका के माध्यम से पप्पू तक पहुंचते है। नादान पप्पू को जब पता चलता हैं कि उसे कोई लेने के लिए आया हैं तो वह खुशी से झूम जाता है, मगर वह अपने अधूरे सपनों को लेकर निराशा भी महसूस करता है।

स्वयंसेवी संस्था के द्वारा जब पड़ताल की जाती है तो पता चलता हैं कि रामुकाका ने ठेकेदार से कुछ पैसे लिए थे, उसे चुकाने के लिए पप्पू को ठेकेदार के पास नौकरी पर रखा । इस घटना के बाद पप्पू की सारी पढ़ाई का खर्चा संस्था द्वारा वहन किया जाता है। और पप्पू की खुशियां लौटने लगती है। और वहीं रामुकाका को गांव की पंचायत द्वारा कड़ी सजा का सामना करना पड़ता है।

(यह काल्पनिक कहानी जनजाति क्षेत्रों में बढ़ते बालश्रम के संदर्भ में है)

मो. 8875251008

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