शनिवार, 7 नवंबर 2015

मो. मेराज रजा की ग़ज़लें

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ग़ज़ल
1
माँ   मुझे   यह   शदा    देना
नेकी करू हरवक्त, दुआ देना

सीखूं तुमसे हर अच्छी आदतें
गलती   करूं   तो   सजा देना

हंसके सहूं हर जुल्मो-सितम
सब्र  करने  का  हौसला देना

मर मिटूं वतन पे हंसते-हंसते
खून    में    ऐसी    रवा   देना

करूं  जब  वतन  से  बगावत
खाक    में    मुझे   मिला देना

 

   
2
भूखे को खाना खिलाया जाए
चलो कुछ नेकी कमाया जाए

दूर करनी  हो जहां  से नफरत
भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाए

हिन्दू -मुस्लिम साथ करें इबादत
ऐसा   ही   एक  घर बनाया जाए

बेवजह आंख दिखाये जो बार-बार
वैसे   दुश्मनों  को मिटाया जाए

वतन पे  मर  मिटेंगे   हम  भी
एक बार तो रजा को बुलाया जाए

 

3
मेरे   गम  को  भूला गया  कोई
सालो   बाद   हंसा  गया  कोई

बनायी थी हमने रेत  पर महल
साथ पानी के  बहा  गया कोई

थी यह बस्ती लोगों से आबाद
दंगे   में  इसे  जला  गया  कोई

करता खुदा की इबादत मैं भी रजा
मयखाने  में  हमें  बैठा  गया  कोई

--

 

4

 

हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल

 

बीफ पे सियासत करनी चाहिए

नेतागिरि अपनी चलनी चाहिए

 

अखलाक कोई मरता है तो मरे

जेब वोटों से भरनी चाहिए

 

बंद न हो सियासत की दुकानें

आग नफरत की जलनी चाहिए

 

अंदर हों भले हम कुछ भी

बाहर देशभक्ति दिखनी चाहिए

 

लहूलुहान होता है देश हुए

सत्ता किसी तरह मिलनी चाहिए


@ मो0 मेराज रजा
mdmeraj42@gmail.com

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