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रवि भुजंग की ग्यारह प्रेम कविताएँ

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मैं राधा, मुझमें ना अम्बर नीला,
ना मुझमें चित्र चांद का.,
मैं एक से दस तक सी कहां भोली,
ना मैं ज़मी-झरने का टकराव.....,
ना मैं खनक चूड़ियों की,
ना मैं छनछन पायल की..,
श्रंगार कहां मुझमें,
मुझमें तुम हो,
तुम कृष्णा.......,

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1) तुम हवा को पकड़कर
निचोड़ती हो..
और उसमें से बह
चलता है, गिरता है,
यौवन-रस,

और तुम उस रस से
एक तस्वीर बनाती हो,
तस्वीर उस लड़की की
जो काबू कर लेती है
बाबा के घोड़ों को,

उन पर बैठकर
दौड़ाती है उन्हें और
खुले बाल तक
आ जाते है जोश में,

बाबा के घोड़े भी
उसका साथ देते हैं,
घोड़े....सूरज बाबा के,
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2) भीगे बालों से
गिरी बूंद के आखरी
हिस्से में एक अदृश्य
सिलब्बट्टे में चांद
पीसकर,चुपके से
गुलाब पर सो जाता है,
दबे कदम आकर सूरज
उसी गुलाब पर लाली
घोलकर दूर खड़ा हो जाता है,
फिर वही भीगे बालों वाली
उस गुलाब पर हाथ फेर कर
गुज़रती है, और उसके हाथों
पर इक मेहंदी बेताब हो जाती है,
दूर तक महक जाने के लिए,
किसी को करीब खींच लाने को....,
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3) गीत भले बीन सावन के गाऊं मैं
संग तेरे पहली प्रीत गुनगुनाऊं मैं
पृथ्वी चक्र सा प्रेम कहां से लाऊं मैं

नौलखा तुझपर हो जाऊं मैं,
संजीवनी रस सा तेरे बालो पर
हो जाऊं घागर कमर पर,
भाग्य रंग, सा लगूं तेरे गालों पर

बिन इच्छा की देह कहां से लाऊं मैं
पृथ्वी चक्र सा प्रेम कहां से लाऊं मैं

मैं हथेली समझ के दरिया में
यौवन कंठ पे तू बुंदों की माला,
बावली, दीवानी, तू इक मीरा
मन नगर की तू बनी बृजबाला,

छोड़ हठ, वृंदावन कहां से लाऊं मैं
पृथ्वी चक्र सा प्रेम कहां से लाऊं मैं
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4) बसंत सी चंचल, मादक खुशबू,
मदमस्त हवा सी

अमृत कुंड सी, शीतल, सुरभित
इंद्रधनुषी आभा सी,
नीलाम्बर, नवयौवन वो,
कण-कण में झर-झर बहती,

किसलय पर बूंदों के जैसी,
मुक्ता सी रौनक उसकी
सुधा-चंद्रिका, झरनों का अंत
लहलहाते वृक्षों सी,

शाखाओं पर मैना सी जैसी
फूलों पर तितली, भँवरे की गुन-गुन,
संध्या सुंदरी, तन सुगन्धित,
लीलाएँ कान्हा जैसी,

देवलोक की नर्तकी वो
मानव सा न सौंदर्य,
पग-पग जब चलती वो जाती
बरसे बून्द-बून्द चांदनी,

गगन मण्डल, स्वर्णिम दृश्य,
गंगा का जल उसमें दिखता,
सीता की मोहकता
स्वर्ण मृग पर उसमें दिखती,

रूप की रानी, मृगनयनी सा तन,
मस्तक बिंदी चन्द्रमा
झूम-झूम गाए गीत,
ऋत छेड़े रह-रह कर

आखिर यह है कौन इतनी
सीधी-साधी सी लड़की
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5) सुर्ख आसमां
ये आँसुओं की धारा,
तुम नहीं हो..फिर भी तुम हो....,

तुम्हें क्या सुनाऊं हर बार,
चेतना की दस्तक कही से लौट आती है,

मत सुनो......सुनना चाहो तो भी,
मेरी प्रिय तुम....तुम्हें मेरी कविता,
सिर्फ मेरी कविता.......,

मैं कहां पुष्प की अभिलाषा
की तुम्हें प्रिय रहूं......,

मैं दोहा रहीम,कबीर का
सत्य, पर अन चाहा, भटकता हुआ
फुटपाथ पर कहीं बैठा हुआ
तेज बरसात में...........
- - -
6) तुम चांद और आफ़ताब की
बातें करते हो,
धरती पर ख़ुद का घर है कि नहीं,
यूं तो तुमने कल्पनाओं में खूब
चावल के दानों से मृगनयनी
की मूरतें बनाई होगी,
क्या तुम मृगनयनी की आँखों
में कभी गुम हुए हो,
तुमने कभी परियों को
आंगन लीपते लिखा है,
तुमने कभी किसी लड़की को
दो के पहाड़े की तरह भोली-भाली
लिखा है, या एक से पांच तक की तरह
सरल लिख पाएं.......,
क्या चांद को कभी घर के अंदर
किचन के कटोरे में लिखा है,
क्या सीपियों में कभी महल को
लिखकर देखा है,
क्या सूरज से चूल्हा जलवाया है,
कल्पना से परे भी कल्पनाएं है
कविराज............,
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7) उस दिशा में ना
लेके उड़ मन
ओ पवन तू ठहर...,

उस दिशा में
बालम राह
मोरी रोके....,
ओ पवन तू ठहर...,

चंचल बसंत है
शाम परियों की रानी
ठहरे ना नैन, हो ना
हमारी प्रेम कहानी

रह ना जाऊं उस
दिशा की होके
ओ पवन तू ठहर...,
- - -
8) अब सब्र कर लेखनी,
इन धूलों को,
आधे आसमां तक जाने दे,

कल्प-किवाड़ पर
शब्द उतावले,
ठहर यहीं पल को,
रात को, दिन को,

रथ देखे उनका
कहां तक उड़ता है,
आधे तक, आधे से
कम तक,

तब तब कुछ
लकीरें खींच लेता हूं
हाथों पर नहीं
लिपे हुए, गीले आंगन पर,
बांस के टूटे हुए
धनुष की छड़ी से,
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9) मुझे याद है आज भी,
जब मैं गुलाब को
पास लाकर तुम्हारे
होंठों पर लगा देता था,

और तुम यूं ही
कमर पर हाथ रखकर
आँखें थोड़ी छोटी
कर के झुठा गुस्सा दिखाती थी,
मुझे याद है आज भी,

मुझे याद है जब
तुम्हारे पांव में कोई
कांटा चुभता था फिर
में उसे निकालता था
और तुम्हारी आँखों में
आंसू होते हुएं भी
तुम मुस्कुराती थी,
मुझे याद है आज भी,

मुझे याद है एक दिन
तुम चली गई दूर कही
याद है उस रेल की आवाज़,
मुझे याद है में प्लेटफॉर्म पर
खड़ा था और रेल आगे बढ़
रही थी, एक खिड़की से
तुम देख रही थी मुझे,
तुम्हें नहीं जाना था
फिर भी तुम चली गई थी
मुझे याद है आज भी,
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10) वो बातें करती है चांद से
पुछती है मेरे हाथों पर ये
मेहंदी कैसी लग रही है!
चांद कहां होश में रहता है,
वो सिर्फ खुलती बंद होती
पलकों में खो जाता है,
उसे स्वर सुनाई नहीं पड़ते,
वो तकता रहता है उस चेहरे को!
उस आईने को...,
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© रवि भुजंग

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