शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

दीपक आचार्य का आलेख - कोई न कोई चाहिए लड़ाई-झगड़े के लिए

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आदमी कभी भी हमेशा खुश नहीं रह सकता। उसे कुछ न कुछ करने को चाहिए ही होता है। और कुछ नहीं तो उसे संघर्ष या वाग विलास के लिए भी कुछ चाहिए ही चाहिए। अन्यथा इंसान को अपना कोई सा क्षण अनुकूल महसूस नहीं होता।

बहुत सारे लोग हैं जिन्हें रोजाना कोई न कोई संघर्ष आनंद देता है। खूब सारे लोग हैं जो हमेशा हर दिन किसी न किसी बात को लेकर कोई सा झगड़ा करने के आदी हैं और इन लोगों को तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक कि जोरों से चिल्ला न दें अथवा किसी न किसी से कोई झगड़ा न कर लें।

आमतौर पर अधिकांश घरों में सास-बहू, भाई-भाई, भाई-बहनों, पिता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्र और तमाम प्रकार के रिश्तेदारों में वजह-बेवजह कोई न कोई झगड़ा होता ही रहता है। निन्यानवें फीसदी मामलों में संघर्ष का कोई ठोस वजूद नहीं होता बल्कि केवल अपने अहंकारों को परिपुष्ट करने के लिए होता है अथवा केवल दूसरों को अपने अस्तित्व को दिखाने के लिए।

बहुधा हममें से हर कोई इंसान जीवन में रोजाना किसी न किसी वजह से वाद-विवाद, तर्क-कुतर्क और फालतू के कामों या धंधों में रमा रहता है और इस वजह से कोई न कोई संघर्ष अपने आप पैदा हो जाता है।

जो आदमी जितना अधिक क्रोधी, उद्विग्न, अशांत, असंतोषी और अपेक्षावादी होता है वह उतना अधिक संघर्षवादी होता है जबकि जो लोग जितने अधिक शांत, मस्त और धीर-गंभीर होते हैं वे आनंद में रहा करते हैं।

खूब सारे लोग हैं जो अपने किसी न किसी मकसद या आदत से उलझे रहते हैं। इन लोगों को दिन में कोई न कोई ऎसा चाहिए होता है जिससे वे जी भर कर बतिया सकें, तर्क कर सकें और लड़ाई-झगड़ा करने की कोई न कोई भूमिका अदा कर सकें।

ऎस लोग हमेशा उन लोगों की तलाश में रहा करते हैं जिनसे संघर्ष कर वे सुकून पा सकें।  और कोई नहीं मिलेगा तो वह अपने घर वालों और मित्रों से ही झगड़ लेंगे। लोग यह मानते हैं कि इनसे झगड़ा करने वाला कोई नहीं होगा तो ये शांत हो जाएंगे और धीर-गंभीर हो जाएंगे। पर ऎसा होता नहीं है।

इन लोगों की आदत ही ऎसी होती है कि वे जहाँ रहेंगे व जाएंगे वहाँ झगड़ा होगा ही होगा। इसके बगैर वे नहीं रह सकेंगे। इनके सामने से एक जाएगा तो वे दूसरे को पकड़ लेंगे। बहुत सारे परिवारों और समाजों की बरबादी का एकमात्र कारण यही है।

वे लोग समाज के परम शत्रु हैं जो हमेशा लड़ाई-झगड़े के आदी होते हैं और आए दिन संघर्ष की कोई न कोई भूमिका बना ही लेते हैं। जरूरत है संघर्ष के बीजों को समाप्त करने की। आईये इसके लिए कुछ करें और घर-परिवार, समाज एवं क्षेत्र से कलह समाप्त करें, शांति, सद्भाव और प्रेम की भावनाओं का सागर बहाएं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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