सोमवार, 16 नवंबर 2015

रचना-पीयू 'प्रीत' की कविता - ए खुदा क्यूं अपने बन्दों को भूलाने लगा?

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ए खुदा क्यूं अपने बन्दों को भूलाने लगा?
उम्मीद का इंतकाल कर अपने पास बुलाने लगा


सत्ता के नुमाइंदें चूसते रहे हैं हमेशा लहू
अब तो तू भी खून के आंसू रुलाने लगा ।


महरूम न कर मुझे इन दानों से मौला
अपने वारिस को क्यूं भूखा सुलाने लगा?


मेरी नजर के सामने खाक हो रही मेरी मेहनत
इस आग में क्यूं मेरे अरमानों को कुमलाने लगा?


इंतजार की भी इंतहा हो गई मेरे मालिक
इस कदर क्यूं मुझसे मुँह फुलाने लगा?


रचना-पीयू 'प्रीत'
अलवर (राज. )

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(ऊपर का चित्र - नीता सोनी, भोपाल की कलाकृति)

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