सोमवार, 16 नवंबर 2015

रचना-पीयू 'प्रीत' की कविता - ए खुदा क्यूं अपने बन्दों को भूलाने लगा?

image

ए खुदा क्यूं अपने बन्दों को भूलाने लगा?
उम्मीद का इंतकाल कर अपने पास बुलाने लगा


सत्ता के नुमाइंदें चूसते रहे हैं हमेशा लहू
अब तो तू भी खून के आंसू रुलाने लगा ।


महरूम न कर मुझे इन दानों से मौला
अपने वारिस को क्यूं भूखा सुलाने लगा?


मेरी नजर के सामने खाक हो रही मेरी मेहनत
इस आग में क्यूं मेरे अरमानों को कुमलाने लगा?


इंतजार की भी इंतहा हो गई मेरे मालिक
इस कदर क्यूं मुझसे मुँह फुलाने लगा?


रचना-पीयू 'प्रीत'
अलवर (राज. )

--

(ऊपर का चित्र - नीता सोनी, भोपाल की कलाकृति)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------