शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - पगला

जेल प्रशासन के कायदेनुसार बंदी को मुलाकातियों से मिलवाने का समय हो रहा था. मुलाकाती कतार में खड़े बेसब्री से अपेक्षित बंदी से मिलवाने की प्रतीक्षा कर रहे थे. कतार लंबी थी. भोला उसी कतार में खड़ा रवि का इंतजार कर रहा था. रवि उसके बचपन का दोस्त था. किंतु भोला और रवि में लंबे अरसे से संबंध नहीं रहे थे. वह रवि से मिलने अंततः तब तैयार हुआ, जब रवि की पत्नी कई बार आकर उसके रवि से एक बार मिल आने की आरजू -मिन्नत की. भोला की वह हैसियत न थी कि वह रवि के कोई काम आ पाता. किंतु पता नहीं अब रवि उससे मिलने इतना लालायित क्यों था. उसे मिलने आने के संदेशे पे संदेशा दिया.

भोला जब पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था तब से रवि को जानता है. रवि तब बुरा नहीं था. यद्यपि कभी बुरे संगत में पड़कर कुछ गलतियाँ करता तो समझाने पर अपेक्षित सुधार कर लेता था. पर कालांतर में बुरे संगत से उसमें लोभ की भावना प्रबल हो गयी. उसके किसी गलती पर एक बार भोला उसे समझाने की कोशिश की तो वह कहने लगा कि कोड़े आदर्श की थोथी बातों में उलझने से अच्छा मौके का फायदा लेना ही उचित है. कहते हैं कि बहती गंगा में हाथ धो लेना ही बुद्धिमानी है. फिर चरित्र बिगड़ने वाली कोई चीज थोड़े न है. यदि वैसा है भी तो उसका निर्माण स्वयं कर सकते हो. लेकिन धन सबसे बड़ी चीज है,उससे सब कुछ पाना संभव है. यदि वह हाथ आने से रह गया तो जीवन भर सिवाय पछतावे के कुछ नहीं मिलता.

उसके कुतर्क के समर्थन में उसके साथी सामने आए. उन्होंने भोला से कहा था कि वह वास्तविकता से दूर आस्तिकता की दुनिया और कोड़ी कल्पनाओं से भरे आदर्श की बातों में जीनेवाला पगला(पागल) है. इस तरह रवि उससे दूर होता गया और उससे मिलना-जुलना भी धीरे-धीरे कम कर दिया. बुरी संगति में पड़कर रवि अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था.

तभी रवि से मिलने का पुकार हुआ और भोला बीती-बातों की दुनिया से बाहर आया. वह आगे बढ़कर रवि से मिलने गया. सामने रवि सलाखों के पीछे खड़ा था. भोला को देखकर रवि सहसा रो पड़ा. उसने रोते हुए पूर्वोक्त बातों के लिये भोला से माफी मांगी और बताया कि उसे लुट और हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा हुई है. सारे सबूत के सामने वकील के उसके पक्ष में दिये दलीलें काम न आया. बुरे वक्त में सारे सहयोगी उसके पहचान से इंकार कर गए. पत्नी का भगवान से मिन्नत रखना भी प्रतिफलित न हुआ. अब उसका एकमात्र आशा भोला से है.

भोला ने प्रश्न किया कि वह वास्तविकता से अबतक दूर रहा है, फिर वह आस्तिक और ईश्वर पर विश्वास करनेवाला है. वह सांसारिक जीवन में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी बेहद कमजोर है. वह रवि की मदद किस तरह कर सकता है.

इसपर रवि प्रतिप्रश्न किया कि उसे सजा से बचने हेतु क्या करना चाहिये? भोला जवाब दिया कि वह आस्तिक है. ईश्वर संसार में कर्म की प्रधानता दिये हैं,और कर्म के अनुरुप प्रतिफल अकाट्य होता है. इसलिये शास्त्र विवेक पूर्वक कर्म करने की सलाह देता है. फिर महापाप से निवृत्ति का एकमात्र उपाय अपनी गलती मानते हुए पश्चाताप हेतु निर्धारित दंड प्राप्त करना और दंड को स्वीकार करना बताया गया है. किंतु वह तो व्याहवारिक व्यक्ति है. अपने बचाव का यथासंभव सारी कोशिश कर लिये हों तब एक भोगवादी व्यक्ति की नाई अपने कर्म का प्रतिफल समझ कर सजा को स्वीकार करे. अथवा उसके विचारानुसार सजा की उस अवधि को पश्चाताप स्वरुप महापाप से मुक्ति हेतु सुअवसर समझ कर सहर्ष स्वीकार करे.

"तुमसे सलाह लेना ही मूर्खता है. पगला कहीं के...."कहते हुए रवि पुन: रोने लगा. मिलने का समय समाप्त हो गया था. प्रहरी उसे अंदर ले गया. भोला लौट गया,उसे अपने मित्र की सहायता न कर पाने का थोड़ा गम था और थोड़ी खुशी इस बात की थी कि उसके मित्र को सुधरने और पश्चाताप करने का अवसर मिला.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

आने की आरजू -मिन्नत की. भोला की वह हैसियत न थी कि वह रवि के कोई काम आ पाता. किंतु पता नहीं अब रवि उससे मिलने इतना ललायित क्यों था. उसे मिलने आने के संदेशे पे संदेशा दिया.

भोला जब पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था तब से रवि को जानता है. रवि तब बुरा नहीं था. यद्यपि कभी बुरे संगत में पड़कर कुछ गलतियाँ करता तो समझाने पर अपेक्षित सुधार कर लेता था. पर कालांतर में बुरे संगत से उसमें लोभ की भावना प्रबल हो गयी. उसके किसी गलती पर एकबार भोला उसे समझाने की कोशिश की तो वह कहने लगा कि कोड़े आदर्श की थोथी बातों में उलझने से अच्छा मौके का फायदा लेना ही उचित है. कहते हैं कि बहती गंगा में हाथ धो लेना ही बुद्धिमानी है.फिर चरित्र बिगड़ने वाली कोई चीज थोड़े न है. यदि वैसा है भी तो उसका निर्माण स्वयं कर सकते हो. लेकिन धन सबसे बड़ी चीज है,उससे सब कुछ पाना संभव है. यदि वह हाथ आने से रह गया तो जीवन भर सिवाय पछतावे के कुछ नहीं मिलता.

उसके कुतर्क के समर्थन में उसके साथी सामने आए. उन्होंने भोला से कहा था कि वह वास्तविकता से दूर आस्तिकता की दुनियाँ और कोड़ी कल्पनाओं से भरे आदर्श की बातों में जीनेवाला पगला(पागल) है. इस तरह रवि उससे दूर होता गया और उससे मिलना-जुलना भी धीरे-धीरे कम कर दिया.बुरे संगति में पड़कर रवि अपराध की दुनियाँ में कदम रख दिया था.

तभी रवि से मिलने का पुकार हुआ और भोला बीती-बातों की दुनियाँ से बाहर आया. वह आगे बढ़कर रवि से मिलने गया. सामने रवि सलाखों के पीछे खड़ा था. भोला को देखकर रवि साहसा रो पड़ा. उसने रोते हुए पुर्वोक्त बातों के लिये भोला से मांफी मांगी और बताया कि उसे लुट और हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा हुई है. सारे सबुत के सामने वकील के उसके पक्ष में दिये दलीलें काम न आया.बुरे वक्त में सारे सहयोगी उसके पहचान से इंकार कर गए. पत्नी का भगवान से मिन्नत रखना भी प्रतिफलित न हुआ. अब उसका एकमात्र आशा भोला से है.

भोला ने प्रश्न किया कि वह वास्तविकता से अबतक दूर रहा है, फिर वह आस्तिक और ईश्वर पर विश्वास करनेवाला है. वह संसारिक जीवन में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी बेहद कमजोर है. वह रवि की मदद किस तरह कर सकता है.

इसपर रवि प्रतिप्रश्न किया कि उसे सजा से बचने हेतु क्या करना चाहिये? भोला जवाव दिया कि वह आस्तिक है.ईश्वर संसार में कर्म की प्रधानता दिये हैं,और कर्म के अनुरुप प्रतिफल अकाट्य होता है. इसलिये शास्त्र विवेक पुर्वक कर्म करने की सलाह देता है.फिर महापाप से निविर्ति का एकमात्र उपाय अपनी गलती मानते हुए पश्चाताप हेतु निर्धारित दंड प्राप्त करना और दंड को स्वीकार करना बताया गया है. किंतु वह तो व्यहवारिक व्यक्ति है. अपने बचाव का यथासंभव सारी कोशिश कर लिये हों तब एक भोगवादी व्यक्ति की नाई अपने कर्म का प्रतिफल समझ कर सजा को स्वीकार करे. अथवा उसके विचारानुसार सजा की उस अवधि को पश्चाताप स्वरुप महापाप से मुक्ति हेतु सुअवसर समझ कर सहर्ष स्वीकार करे.

"तुमसे सलाह लेना ही मुर्खता है. पगला कहीं के...."कहते हुए रवि पुन: रोने लगा. मिलने का समय समाप्त हो गया था. प्रहरी उसे अंदर ले गया. भोला लौट गया,उसे अपने मित्र की सहायता न कर पाने का थोड़ा गम था और थोड़ी खुशी इस बात की थी कि उसके मित्र को सुधरने और पश्चाताप करने का अवसर मिला.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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