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वीणाश्री हेम्ब्रम की कविता - उलझे धागे

रचनाकार को कविताकार से बचाने के लिए कवि/ग़ज़लकार की न्यूनतम 10 कविता / ग़ज़ल प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया है. उम्मीद है रचनाकारों का पूर्ववत् सहयोग बना रहेगा.
अपवाद स्वरूप, वीणाश्री की एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं - क्योंकि यह उनकी पहली-पहल कविता है, जिसे भेजा है कहानीकार सूरज प्रकाश ने.
पटना में रहने वाली वीणाश्री की ये पहली कविता है। वे कहती हैं कि दिमाग में विचारों की धकापेल चलती रहती है हर वक्‍त। समझ में नहीं आता कि पहले क्‍या लिखना है। पहली कविता के रूप में जो सामने आया, वह ये है।

उलझे धागे


वीणाश्री हेम्ब्रम

सोने दो न ... अभी सुबह कहाँ हुई है
उठो भी, सूरज चढ़ आया है
कुनमुनाती, बुदबुदाती, कुढ़ती, आँखें मलती मैं

ये क्या ... नीले निशान...!
हाँ याद आया...
रात सपने में, बेख़याली में
उंगलियों पर ग़ुलाबी धागा लपेटती रही थी
धंस गया है गहरे
नील पड़ गई है उंगली
ख़्वाबों की मीठी चाशनी में उंगली के पोर डुबो-डुबो कर चखती रही थी
पोरों से ढुलकते हुए पूरे बदन में फैलती चाशनी का बहाव थम गया था शायद
सुबह ग़ुलाबी, नीले, पीले, हरे, लाल, सारे धागे उलझे पड़े थे
कैसे सुलझाऊँ!
किस धागे का कौन सा सिरा पकड़ूँ!

भोर का सुनहला पीला वो 26 बरस लंबा धागा
जिसका सिरा हॉस्टल की छुट्टियों से शुरू होता हुआ जा रुकता है घर के नर्म बिछौने पर
जहाँ माँ के बार-बार उठाने के बाद भी
उकड़ूँ बैठ कर सोती रहती थी मैं
प्रेयर करने का नाटक करती हुई

या फिर वो 28 बरस पुराना नीला धागा
जो उस टूथब्रश से बंधा है
जो दीदी लेकर आती थी बेड पर
वो भी दोपहर के साढ़े बारह बजे
और मैं अलसाई सी कहती
"यहीं ब्रश करवा दो न"

या फिर उतारे हुए हरे स्कूल यूनिफ़ॉर्म का वो धागा पकड़ूँ
जिसे उतार छोड़ देती थी मैं बाथरूम में
एक निश्चिन्तता से
बताने की ज़रूरत भी नहीं समझी और ना ही दीदी ने पूछा कभी
धो देती थी वो हर रोज़ हॉस्टल में, और माँ घर पर

या फिर चाय का वो भूरा धागा सुलझाऊँ जिसकी जुगत लगाते थे पापा
मुझे सुबह उठाने को
पापा के दुलार में पगी चाय और चुस्कियां लेते हम बाप-बेटी
अंग्रेज़ी न्यूज़पेपर ज़ोर से बोलकर पढ़वाना और उस पर पॉलिटिकल डिस्कशन्स
माँ चिढ़कर कहती
घर आई है, कुछ काम तो सीखने दीजिये
क्या करेगी अपने घर जाकर
और पापा का कहना
शेर का बच्चा है, शेर की तरह ही रहेगा

अच्छा, हौले से खींचूँ वो धागा जो साइकिल की चेन से उलझ
ग्रीस लगकर काला हो गया था
हाफ़ पैडल मारते-मारते उचक कर सीट पर चढ़ी थी और बैलेंस खोकर गिरी थी गड्ढे में धड़ाम से
थरथराते पैरों की चोट पर बोरोलीन लगा कर फ़्रॉक से छुपाया था मैंने
पर बात छुपी कहाँ रह गई थी
और फिर पापा ने "राजदूत" चलाना सिखाया
वो भी ट्रिपल लोडिंग में

या पकड़ूँ उस सफ़ेद धागे का सिरा जो लटक रहा है किचन के ऊपरी शेल्फ़ में छुपाए मेरे मलाई के कटोरे से
माँ हैरान होती
और मैं कहती, बिल्ली आई होगी
भाई छेड़ता, हाँ ... दो पैरों वाली बिल्ली
और फिर दादी सबकी नज़रें बचा कर
थमा देती थी मुझे वो मलाई का कटोरा

दादी के डंडे से उलझा वो धागा सुलझाऊँ
जिस पर रानी कलर के संझा फूल के काले बीजों को पिरो कर एक माला बनाती मेरे लिए और कहती थी
नज़र ना लगे मेरी गोरकी को
हॉस्टल जाते वक़्त नम आँखों से पूछती
वहाँ मलाई कैसे खाएगी?
फ़िर कब आएगी?
और चुपके से कुछ सिक्के मुट्ठी में पकड़ा देती

और एक बैंगनी धागा भैया के गिटार और माउथऑर्गन से भी तो उलझा है
तुम धुन बजाओ भईया, मैं गाना बताऊँगी
म्यूज़िक सिस्टम ऑन करके बंद कमरे में
मैं और दीदी ख़ूब नाचते
भईया माँ को बुलाकर चुपके से खिड़की की ओट से दिखाता
और जैसे ही पापा के आने की आहट होती
हम जल्दी से किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाते
एक ही पन्ना घंटों निहारते

कितने ही तो धागे हैं मिले-जुले रंगों के

पलंग से उतर कर, दीवार से टिककर, आँखें मूंदे ज़मीन पर बैठ जाना और दादी का धीरे-धीरे मेरे हाथ-पैर दबाना कि मेरी नींद खुले...

रात में जानबूझ कर कहीं भी सो जाना कि माँ मुझे गोद में उठा कर बिस्तर पर सुलाए...
आठवीं-नौवीं क्लास में थी
माँ से उठती भी नहीं थी तब मैं
इतनी मलाई जो खायी थी
काकू ही गोदी उठाकर बिस्तर पर पहुंचाते थे

कभी भईया की गर्लफ़्रेंड को बहाने से घर बुलाना या उसे चिट्टी पहुँचाना
बदले में दोनों से टॉफ़ी पाना
या भईया से घुमाने ले जाने की शर्त रखना

सारे ही धागे तो उलझ कर रह गए हैं...

सबसे ज़्यादा तो प्यार का ये लाल धागा...

यूँ तो लाल धागे मन्नत मांग कर बांधे जाते हैं कलाई में
पर मैंने तो सबसे लड़कर
उंगली में पहना था तुम्हें
ग़ुलाबी सपने बुनने लगी थी मैं
और बुनने लगी थी नन्हीं जुराबें...
ग़ुलाबी धागों को उंगलियों में लपेटते हुए
कसाव से बेख़बर...

जब धंस गया गहरे कहीं
और रुक गया चाशनी का बहाव
तब जाकर नींद खुली
सारे रंग उलझ कर एकसार, सफ़ेद, हो गए हैं अब
पोरों पर चाशनी का स्वाद भी फीका पड़ गया है अब

फीकी-सादी ज़िन्दगी
उलझे सारे धागे

सुलझते भी हैं क्या कभी....???

binashree.h@gmail.com

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