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ब्रजमोहन शर्मा की 10 ग़ज़लें

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1

रंगों के उत्सव में सब एक रंग हो जाओ
भेदभाव भूलकर सारे सबको गले लगाओ ।


चौपालों पर जमी हुई हुल्लड़बाजी में
शामिल हो होली को सबके साथ मनाओ ।


जो जीवन से लड़ते लड़ते ऊब चुके हैं
उन सबको आज फाग का राग सुनाओ ।


हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई उठो और
सब मिलकर होली का उत्सव आज मनाओ ।


नए अन्न की खुशबू से आन्दोलित हो
दसों दिशा में गूँज उठाता ढोल बजाओ ।


प्रह्‌लाद जीवन सच है और झूठ होलिका
जीवन-सच सच बने होलिका आज जलाओ ।

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2

 

कुछ कहो पर सोच लो वह काम का है
जब मिलो उससे मिलो जो काम का है ।


जिन्दगी के अनुभवों से खुद कहोगे
आँख का तारा वही जो काम का है ।


देखकर उसको कभी मैं सोचता हूँ
काश मैं भी जानता वह काम का है ।


गर बदलकर खुद उसे तुम देख पाते
तो हमेशा सोचते वह काम का है ।

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3

अपनी जरूरत कम करो तो देखिए
जो है उसे सब कुछ कहो तो देखिए ।


तुम चाहो हर समय हो पास में
मन में उसे सोचा करो तो देखिए ।


गर चाहो तुम कमल-सा खिलकर रहो
तो हर सवेरे भास्कर को देखिए ।


सोचिए तो दिल सभी का एक मंदिर है
जिसमें सदा भगवान को तो देखिए ।

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4

फुटपाथ पर जब कभी भी मौत होती है
मनुजता लाचार हो तब बोझ ढोती है ।


मरते दम तक वह अकेला ही दिखा था
आज सबको देखकर एक सोच होती है ।


देखकर उसको सभी चुपचुप गुजरते थे
इस दर्द को पी रात हर रोज रोती है ।


चाँद को वह मीठी सी रोटी समझता था
भूख में कब सोचने की होश होती है ।

उम्र भर दुख भोग पहुँचा चाँद-तारों में
सोचता होगा यही तो मोक्ष होती है ।

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5

सोचकर ही दोस्तों हर बात कहूँगा
कर सको जो फैसला हर बात कहूँगा ।


आप अपने ख्यालों में खोए हुए हैं.
जब सुनो तुम गैर से हर बात कहूँगा ।


बेवजह कब कौन यहाँ सुनता किसी को
जब करो महसूस तो हर बात कहूँगा ।


अभी तो वक्त है कुछ सज सँवर लो
जब ढलेगा रूप तो हर बात कहूँगा ।

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6

मैं जिन्दगी को ऐसे जिए जाता हूँ
कि हर कदम पर ठोकरें खाए जाता हूँ ।


दुश्मनों से भी मिलाया हाथ मैंने
तभी तो सबसे मात खाए जाता हूँ ।


जिन्दगी को धरम सा समझा हमेशा
पर सियासत में उलझ ठगा जाता हूँ ।


जितना अधिक धोता स्वयं को कीच से
कीचड़ में उतना ही धँसा जाता हूँ ।

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7

मत कभी सोचो गर तुम अकेले आज हो,
बस यह क्या कम कि तुम तो अपने साथ हो ।


गगन के लाख तारे कब मिटा पाए अँधेरा,
जो हरे तम को तुम वह अकेले चाँद हो ।


आधियों के सामने तो कौन कब टिकता
पर जो बढे हर पल, वह अकेली घास हो ।


तुम कभी जग से नहीं, तुमसे जमाना है,
जिससे चले यह जग, वह अकेले आप हो ।

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8

बात करते हो गगन को गिराने की
ताकत नहीं है खुद को उठाने की ।


कहते हो जमीं पर स्वर्ग लाने को
समझ नहीं है खुद को इन्सां बनाने की ।

 

कहते हो सबके बराबर हक होंगे
यह एक चाल है खुद को छिपाने की ।

 

बात करते हो जगत को जीतने की
जरूरत है तुझे खुद को जगाने की ।

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9

सरहदों को पाकर कोई बढ़ा है
मुल्क को ललकार कर कोई बढ़ा है ।


स्वर्ग सी सुंदर जमीं पर पैर रख कर
कारगिल को छीनने कोई बढ़ा है ।


पोखरन तो आत्मरक्षा का कवच है
किस वहम को पाल फिर कोई बढ़ा है ।


जब बढ़ा तब हारकर पीछे मुड़ा है
पर भुलाकर सब विगत कोई बढ़ा है ।


मर मिटेंगे हम वतन की आबरू पर
जब कभी हमको लगे कोई बढ़ा है ।

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10

जो हिमालय चीरकर गंगा बहाते हैं,
वे पुरुष इस लोक में सत्पुत्र कहाते हैं ।


मात-पिता का रंजोगम दर्द है उनका,
जिस जगह पर वे सदा सपने खिलाते हैं ।


कपिल ने किया था भस्म जिनको शाप से,
उनकी मुक्ति से वे भगीरथ कहाते हैं ।


समय की शिला पर उनका नाम खुदता है,
जो नया इतिहास रच सबको दिखाते हैं ।


सगर बोले, गर पुत्र हो तो भगीरथ हो,
जो पिता के दर्द को झटपट मिटाते हैं ।

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डॉ. ब्रजमोहन शर्मा के ग़ज़ल संग्रह 'ग़ज़ल' से साभार.

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