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‘‘2015 में पढ़ी मेरी पंसदीदा रचना’’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन

‘‘समय के साथ परिमार्जित हो साहित्यिक सोच’’

 

चित्तौड़गढ़ । साहित्य की बहती धारा में समय के साथ हमें अपने विचारों के प्रवाह को नियमित एवं गतिशील करने की महत्ती आवश्यकता है। इसी से हम अपने समाज एवं राष्ट्र को सतत् चेतनाशील बनाए रख सकेंगे। साहित्य संस्था संभावना के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में समग्र रूप से ये विचार उभर कर आए। 

‘‘2015 में पढ़ी मेरी पंसदीदा रचना’’ विषय पर केन्द्रित संगोष्ठी में आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने कथाकार संजीव के उपन्यास ‘‘जंगल जहां से शुरू होता है’’ का रेखाचित्र खींचते हुए बताया कि समाज को अपने कब्जे में करने के लिए सत्ता हर संभव मार्ग अपनाने के लिए तैयार रहती है।  कथाकार ने सुक्ष्मता से सत्ता व दस्यु साम्राज्य के गठजोड़ की आंतरिक परतों  को उघाड़ा है। हाल यह है कि हर नेता और जाति के अपने दस्यु गिरोह हो जाते हैं। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डा. के.सी. शर्मा ने उपन्यासकार अखिलेश की कृति ''निर्वासन'' पर चर्चा करते हूए संस्कृति के निर्वासन के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वर्तमान मनुष्य को वैश्वीकरण एवं बाजारीकरण ने इस कदर जकडा है कि वह अपनी मूल प्रवृतियों से विचलित हो अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को लेकर भ्रमित है, उसे समाज सापेक्ष अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। 

डाॅ. कनक जैन ने विष्णुप्रभाकर की प्रसिद्ध कृति ‘‘आवारा मसीहा’’ को दृश्यांकित करते हुए शरतचन्द्र की जीवनी की बारीकी से विवेचना  की । डा. जैन ने विष्णुप्रभाकर के लेखन की सूक्ष्मता को बताते हुए कहा कि एक दशक तक अध्ययन के बाद शरत की जीवनी का आना सही मायने में एक साहित्यकार की निष्ठा व समर्पण को दर्शाता  है । उन्होंने बताया कि जीवनी के माध्यम से बंगला जनजीवन, संस्कृति का विशद् परिचय हिन्दी के पाठकों को उपलब्ध हुआ, यह प्रयास इतना गंभीर था कि इस रचना ने बंगला के पाठकों का मन भी सहजता से छुआ।

महाविद्यालय के प्राध्यापक डा. पीयूष शर्मा ने कहानी ‘‘ताम्रपत्र’’ के जरिये किसी की प्रसिद्धि के पीछे नारी समाज के आंतरिक एवं सहज समर्पण को उद्घाटित किया । चर्चा में भागीदारी करते हुए शोधार्थी गोपाल जाट ने रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘‘पहलवान की ढोलक’’ के बहाने समाज निर्माण के लिए सतत् समर्पण एवं जिजीविषा को अनिवार्य बताया। जाट का कहना था कि  कहानी में मुख्य पात्र के हार ना मानने के स्वभाव को सकारात्मकता के साथ समाज को अंगीकार करना चाहिए। संतोष शर्मा ने जीवन के अनछूए संस्मरणो के जरिये महादेवी वर्मा की रचना ‘‘भक्तिन’’ पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि भक्तिन का चरित्र स्वामीभक्ति का अद्भुत उदाहरण है । चर्चा के दौरान विकास अग्रवाल ने रांगेय राघव के प्रसिद्ध रिपोर्ताज तुफानों के बीच में लेखक की अद्भुत वर्णात्मक शैली को पठनीय बताया । संगोष्ठी में नीतेश जैन, उमेश भारद्वाज, कविता शर्मा, के.के. दशोरा सहित अन्य साहित्य प्रेमी उपस्थित थे । संभावना का अगली संगोष्ठी 20 दिसम्बर को आयोजित करने का निर्णय लिया गया ।    

डा. के.सी. शर्मा 

अध्यक्ष - संभावना

म-16,हाउसिंग बोर्ड,

कुम्भा नगर,
चित्तौड़गढ़-312001,
मो-09413641775,
ईमेल-sambhawnachittorgarh@gmail.com

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