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पुनूराम साहू “ राज “ का आलेख - व्यक्ति नहीं संस्था थे गजानंद प्रसाद देवांगन

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इस धरा पर जन्म लेना , जीना खाना और एक दिन यहां से चले जाना , इस तरह के जीवन तो सभी जीते हैं । लेकिन बहुत कम लोग होते हैं , जो दूसरों के लिए जीते हैं और अपने जीवन के एक एक क्षण को परमार्थ के लिए , समाज और राष्ट्र हित के लिए अर्पित कर परम सुख एवं संतोष का अनुभव करते हैं ।

समाज संस्कृति एवं साहित्य को समर्पित ऐसे व्यक्ति की एक दिन स्वतः ही परख पहचान होती है और वे पूजे और सम्माने जाते हैं । लाखों में एक ऐसे ही व्यक्ति जिनका सरोकार सामाजिक क्षेत्र , साहित्यिक क्षेत्र और सांस्कृतिक व धार्मिक क्षेत्र में एक साथ हो तो वह व्यक्ति केवल एक व्यक्ति न होकर संस्था बन जाता है । ऐसे ही एक विभूति रहे हैं स्वर्गीय श्री गजानंद प्रसाद देवांगन “ दिशाबोध “। जिन्हे हजारों लोगों ने कभी रामायण का प्रवचन करते , कभी साहित्यिक गतिविधियों का संचालन करते तो कभी गीत संगीत व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन करते देखा व सुना है , आज भी आकाशवाणी रायपुर से यदा कदा उनकी लोककथाओं एवं छत्तीसगढ़ी कविताओं का प्रसारण होता रहता है ।

सन 1940 में गणेश चतुर्थी के दिन माता पार्वती देवी की कोख से रायपुर ब्राम्हण पारा में जन्मे श्री गजानंद प्रसाद देवांगन जी का बाल्य काल उनके गृह ग्राम धौराभाठा विकासखंड मगरलोड में बीता । पिता श्री रामाधीन देवांगन और माता पार्वती की छत्रछाया में प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई । बाद में स्वाध्यायी मेट्रिक , एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण किया । 1958 से नार्मल स्कूल से प्रशिक्षण प्राप्त कर शिक्षा विभाग में गुरूजी बन गए । 1971 में जम्मू कश्मीर के विश्वायतन योगाश्रम से तीन महीने का योग प्रशिक्षण प्राप्त कर छत्तीसगढ़ के प्रथम योग गुरू बन गए , जिन्होने सर्वप्रथम छत्तीसगढ़ के स्कूल में योग की विधिवत शिक्षा प्रारम्भ की । इस बीच श्री देवांगन जी शिक्षा के नए नए आयाम गढ़ते गये , वहीं दूसरी ओर उनमें अंकुरित काव्य साहित्य और सांस्कृतिक प्रतिभा भी पुष्पित पल्लवित होने लगी । जिसकी सुगंध न केवल गरियाबंद जिला बल्कि धमतरी – महासमुंद से निकल पूरे छत्तीसगढ़ में फैल गयी । धार्मिक अध्यात्मिक श्रद्धालु जन प्रवचन के माध्यम से , काव्य साहित्य अनुरागी साहित्य के माध्यम से , गीत संगीत प्रेमी - सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इनसे जुड़ते गए । इस प्रकार उनका परिचय का व्यापक विस्तार होता गया । प्रसन्नचित मुख , वाणी मधुरता , व्यवहार कुशलता , नम्र स्वभाव , मिलन सारिता जैसे विशिष्ट गुणों के कारण इनके सम्पर्क में जो भी एक बार आता , वह हमेशा के लिए इनके आकर्षण में बंधकर रह जाता ।

सन 2000 में शासकीय सेवा से निवृत्ति तक गरियाबंद धमतरी एवं महासमुंद जिले में अपने साहित्यिक प्रतिभा के बल पर जाने पहचाने नाम बन चुके थे । 1997 में महामहिम राष्ट्रपति से सम्मानित होने वाले श्री देवांगन जी को राज्य शासन का प्रथम पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार प्राप्त करने का भी सौभाग्य प्राप्त है । उनके खाते में अनेक छोटे बड़े अन्य उपलब्धियां आज नही होने पर भी जमा होते जा रही है । अब तक उनकी पांच किताबें प्रकाशित हो चुकी है एवं तीन किताबें प्रकाशनाधीन है । विभिन्न विधा के लगभग 1500 रचनाओं के सृजनकार श्री देवांगन जी ने 9 दिसम्बर 2011 को परमधाम की यात्रा कर ली । अशिक्षा के अंधकार को अपने ज्ञान के आलोक से विभिन्न विधा के माध्यम से दूर करने का बीड़ा उठाने वाले साहित्यकार को , शासन ने शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला छुरा जिला गरियाबंद का नामकरण देकर सराहनीय कार्य किया है । जन जन को आनंद बांटने वाले गजानंद प्रसाद देवांगन जी को , साहित्य जगत आज 9 दिसम्बर को उनकी चतुर्थ पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करती है ।

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पुनूराम साहू “ राज “

मगरलोड (धमतरी ) मो. 9752617534

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