शनिवार, 5 दिसंबर 2015

सुधा शर्मा की कविता - भाषा

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बहुत प्यारी होती है भाषा,
मत बाँटो देश इसके नाम पर.
भाव अभिव्यक्ति का साधन,
दिल से दिल मिलने का वाहन.


     पुण्यात आपले स्वागत आहे,
     पूणे में आपका स्वागत है.
     बात तो दोनों एक ही है,
     मॉं दोनों की एक है.


दिल से प्यार झलक रहा
व्यर्थ छिपा रहे इसको.
राजनीति के कुचक्र में,
क्यों फँसा रहे इसको.


     गर सीमा बाँध दी,
     घर छोटे हो जाएँगे
     गर्व से सीना तान चलते है,
      सिर भी फिर झुक जाएँगे.


एकता,अखंडता की अमर,
ज्योति फिर बझ जाएगी.
विश्व में शर्मिन्दा होंगे,
अमर्त्य लाल न रह पाएँगे.


     अखंड शक्ति है हमारी.
     विश्व में सिद्ध कैसे कर पाएँगे.
     विजय पताका का परचम,
     फिर कैसे लहरा पाएँगे.


कुछ तुम चलो,कुछ हम चलें,
अवश्य गले मिल जाएँगे.
द्वेष राजनीति छोड,एकता
के समन्दर में गोते लगाएँगे.


     सभ्यता के गाल पर तमाचा न मारो,
    आने वाली पीढी का भविष्य न उजाडो
    एक थे,एक है,एक रहेंगे आओ,
     गलबहैया डाल सभी यही उचारो.

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