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शिव कुमार यादव की कवितायें

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पराजित आस्थाएं

सजा न सके हम

अपनी

गोरी उजली हथेलियों को ,

मेहंदी की लाली से .

विवशता के आँगन में

गिर पड़े हम

अधखिली कलियों सी

अपनी डाली से..

वहशी निगाहों ने

पी लिया

हमारा खून .

असहाय को लूटना

बन गया है कानून..

हम भी

अपनी चारदीवारी की

सीता थीं ,

लेकिन इस युग का

राम ही बदचलन है

यही

हमारे ह्रदय की जलन है..

सजती है हर रात

सेज - अस्मत की .

साँसों की पराजित

दहलीज पर

होली है - किस्मत की...

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साम्य

केक्टस

जब कभी

तुम्हें देखता हूँ

ऐसा लगता है

जैसे-

तुम मुझे-

जी रहे हो,

तुम्हारे तन में

कांटे ही कांटे है

और मुझे भी सुख

कब किसने बांटे हैं ?

सूखी तपती –

मरुभूमि में

तरस रहे हो

एक –एक बूंद

पानी को .

सपनों के रेगिस्तान में

तरस रहा हूँ मैं भी

एक –एक बूंद

जिंदगानी को

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जिंदगी ; एक शब्द चित्र

गम के साये में गुमसुम चलती जिंदगी

देखा है मैंने आंसुओं में पलती जिंदगी

खोकर अँधेरे में उम्मीद की रोशनी

अपने आप मोम सी पिघलती जिंदगी

ये कैसी जिंदगी,और जिंदगी का मेला है

जिंदगी के हाथों से फिसलती जिंदगी

टूट रहे निरंतर हौसले के पंख

उड़ने को आसमान में-तरसती जिंदगी

बांधकर अपने साँसों की गठरी

उम्र की चिता में नित जलती जिंदगी

xxxxxxxxxxxxxx

 

शिव कुमार यादव

डी. 170 – आर.एम.एस.कालोनी

टैगोर नगर / रायपुर / छत्तीसगढ़

मोबाईल- 09407625051

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