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दीपक आचार्य का आलेख - सर्दी के फर्ज निभाएं

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लो हर बार की तरह इस बार भी आ गई है सर्दी।

कहीं गुलाबी, कहीं तेज, कहीं सुकूनदायी और कहीं शीत हवाओं से भरी तीर की तरह चुभन से भरी हुई।

ऋतुओं का परिवर्तन सृष्टि का शाश्वत और अपरिवर्तनीय नियम है।

गर्मी और वर्षा के माहों के बाद सर्दी के दिनों का मौसम है।

यह मौसम यों तो हर साल आता है, और चला जाता है। और हम हैं कि इसके न आने तक प्रतीक्षा करते हैं, आ जाने पर थोड़े दिन आनंद और सुकून का अनुभव करते हैं और थोड़ी तेजी आ जाने पर कोसने लगते हैं।

लगभग हर मौसम के साथ हमारा यही अनुभव और प्रतिक्रिया होती है। यह हमारी जिन्दगी का रोजमर्रा का नियम हो गया है।

हर ऋतु कुछ कहना चाहती है, गुनगुनाना चाहती है और नहीं मानने पर वह अनुकूलताएं छीनना और परेशान करना भी जानती है।

हर मौसम के मिजाज को जो समझ जाता है वह इंसान सारी परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लिया करता है, जो समन्वय स्थापित नहीं कर पाते हैं वे दुःखी होते हैं और तनावों में जीते हैं।

मौसम का प्रभाव तो तब पड़ता है जब उनके माह आते हैं। मगर एक आदमी ऎसी जात है जिसकी जिन्दगी में हर मौसम का प्रभाव देखा जा सकता है।

एक ही दिन में आदमी के ढेरों मौसम बदलते रहते हैं और उसका प्रभाव भी साफ-साफ सामने आ ही जाता है।

कब आदमी गुस्सा पाकर गर्म हो जाए, कब किसी भी झिड़क सुनकर या दबावों में आकर ठण्डा पड़ जाए, कब किसी के प्रेम, श्रद्धा और स्नेह की फुहारों से नहा ले, और कब ओलावृष्टि की मार का अहसास करने लगे, कुछ नहीं कहा जा सकता।

आदमियों की जात का सबसे बड़ा खतरा भी यही है और विशेषता भी यही। कुछ लोगों के दिमाग में हमेशा गर्मी चढ़ी होती है। पता नहीं किस बात की गर्मी होती है कि आदमी में। अपने अहंकार की गर्मी से बड़ी और कोई गर्मी नहीं हो सकती ।

और यह भी ऎसी गर्मी है कि जो आदमी को धीरे-धीरे जलाती हुई उस कगार तक पहुंचा दिया करती है जहां उसका खाक होना ही स्वाभाविक है।

ऎसे इंसान की गर्मी से झुलस जाने के डर से और कोई उसके पास आ ही नहीं पाता, सिवाय घर वालों के, यह उनकी मजबूरी भी है, बेचारे क्या करें, जब तक पूरी आग जलकर खात्मा नहीं हो जाता तब तक यही सब देखना, सुनना और भुगतना पड़ता ही है।

इसके सिवाय भी गर्मी की बहुत सारी संभावनाएं सदैव बनी रहती हैंं। और गर्मी हो तो आदमी ठण्डे होने लगे हैं। कोई किसी की मार से ठण्डा हो चला है, कोई संयमहीनता की वजह से ठण्डा पड़ा हुआ है और कोई ऎसा है जो पैदा होने के बाद से ही ठण्डा है।

इसी प्रकार आदमी का आभामण्डल उसके स्वभाव और व्यवहार के अनुरूप ढला होता है। यह कभी अच्छे और कद्रदान लोगों के संपर्क में आता है तो श्रद्धा, स्नेह और प्यार से नहा उठता है।

जब कभी बुरे लोगों के संपर्क में आता है तक नकारात्मकता के काले-घने बादलों और दुष्टों की दुर्गंध से भर उठता है। दोनों ही स्थितियों में नहा जाने की विवशता आदमी के चरित्र और स्वभाव पर निर्भर है।

यह तो हुई आदमी के मौसम की बात। अब सर्दियों का जोर है। हमारा फर्ज है कि जो लोग विपन्न हैं, शीत की कंपकंपी से त्रस्त हैं, जो मवेशी सर्दी से परेशान हैं, उन सभी की चिन्ता करें। उनके लिए ऊनी वस्त्रों और दूसरी सारी व्यवस्थाएं करें। यह हमारा अहम् फर्ज है जिसके लिए हम सभी को मिलजुलकर मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे आने की आवश्यकता है।

सर्दियों में हमारे आस-पास के प्राणी परेशान रहें, ठीक तरह से खान-पान और रहन-सहन न हो सके, यह हम सभी के लिए शर्म की बात है।

अपने भीतर संवेदनाओं को जागृत करें और जिस तरह भी सेवा का कोई सा माध्यम अपना सकते हों, अपनाएं तथा मानवीय मूल्यों का दिग्दर्शन कराएं।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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