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संदीप कुमार सिंह की कविताएँ - पाँच साल की छोटी लड़की

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बेचारा रिक्शा वाला
वाह रे दुनियाँ, वाह!
देख लिया तेरा न्याय
बेबस, मासूम, लाचार रिक्शेवाले से
ये कैसा किया तूने न्याय।

दिन आज वो रिक्शा चलाया
दो पैसा तो दिन में पाया
अंतिम भाड़ा जब वो उठाया
और दो पैसे का ख्वाब सजाया।

जब मांगा भाड़ा तो थप्पड़ लगाया
चोर कह कर उसे सब ने सताया
संघर्ष के वक्त कोई काम न आया
अधमरा हुआ तो सहारा दिखाया।

वाह रे दुनिया, वाह!
क्या खूब रंग दिखाया
दोषी को छोड़ तू
निर्दोष को सताया    
उसे मार-मार कर
तू लहू बहाया।

वो तो बेचारा अधिकार मांगा
अपने रिक्शे का भाड़ा मांगा
बस क्या यही था कसूर
पर वो तो था बेकसूर-बेकसूर।

किया प्रमाण यह तू जालिम है
गरीबों का, हाँ
तू जालिम है
समाज में शोषण कर्ता का
हाँ, तू दुनिया
तू सहयोगी है।

करते हो तुम शोषण उन पर
उठा न पाये जो
आवाज तुम पर
दबा दिये तुम उस आवाज को
जो था अकेला
इस कर्म-भू पर।

वाह रे दुनिया, वाह!
सभी यहाँ पर अत्याचारी
लगाते हो नारा
हम में है भाईचारा
डूब मरो तुम छोटी नाली में
तुम सभी हो अत्याचारी

उच्च वर्ग तो उच्च ही है
मध्य वर्ग भी तो कम नहीं है
साथ देते हो तुम उनकी
क्या तुम
शोषण कर्ता से कम नहीं हो।

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पाँच साल की छोटी लड़की

पाँच साल की छोटी लड़की
जब रस्ते पर होती है
इस दुनिया की धूम-धाम में
मन ही मन वह रोती है।

मुसकाते चेहरों के पीछे
रस कडवे पीती है
इस दुनिया की धूम-धाम में
मन ही मन वह रोती है।

आते जाते लोगों से वह
जब दो पैसा पाती है
तब मन में उल्लास जगाती
फिर एक पल में रोती है।

मेरे ही आँखों के आगे, वह
दर-दर मारी फिरती है
न जाने क्या बात हो गई
जो वह मन में रोती है।

पाँच साल की और एक लड़की
जब उसके सामने होती है
मन में ही वह कहती है, कि
कितनी खुश वह रहती है।

वह जो कहती उसे मिलता हैं
और हम सारे दिन रोते है
अच्छे-अच्छे कपड़ों में
कितनी सुंदर वह दिखती है।
न जाने क्या भूल हो गई
जो हम ऐसे रहते हैं
फटे पुराने कपड़ों में ही
सारा दुख हम सहते हैं।

पर दुनिया की रीति देखो
एक हँसती, एक रोती है
पाँच साल की छोटी लड़की
जब रस्ते पर होती है
इस दुनिया की धूम-धाम में
मन ही मन वह रोती है।

--

 

 
जमाने ने दिखाया है ‘आईना’

जमाने ने दिखाया है हमें हर वक़्त आईना
मगर गलती ये हमने की
जो इसको देख पाए न
हमारी आंखों के आगे से ही सब यूं ही गुजरता गया
ये गलती थी हमारी ही जो इसको रोक पाए न।

बहुत देखे इन आंखों ने उन्हें इस राह को जाते
कभी हँसते, कभी रोते, कभी चलते, कभी गिरते
सोचा इस राह से मैं थाम लूँ उनकी कहानी को
मगर जो राह है अपनी,हम उन तक जा नहीं सकते।

कभी भूखी वह सोती है, कभी रोती ही रहती है
वह इतनी सख्त हो गई है कि आँसू भी न गिरती है
जमाने ने दिखाया है उन्हें यह राह पत्थर का
मगर वह सब समझती है किसी से कुछ न कहती है।

हमारा धर्म क्या है यह तो हम सब भूल बैठे हैं
अपने ही स्वार्थ के चलते हम इनसे दूर रहते हैं
कोई अगर चाहे तो सब कुछ जान सकता है
उन्हें इस राह पर गिरने से पहले थाम सकता है।

अगर चाहे तो हम उनकी जंजीरे खोल सकते हैं
अगर चाहे तो हम उनकी दीवारें तोड़ सकते हैं
अगर चाहे तो हम उनकी हकीकत तौल सकते हैं
अगर चाहे तो हम उनके
ये आँसू पोंछ सकते हैं।

मगर यह कौन कहता है कि हम उनको बचाएँगे
यह तो हम भी नहीं कहते कि उनके पास जाएँगे
जमाने ने सिखाया है हमें बस दूर ही रहना

अगर हम पास जाएँगे तो हमें भी छोड़ जाएँगे।

तुम्हारी आंखों से गिरते आँसू को मैंने देखा है
तुम्हारी गोद में सोते एक जीवन मैंने देखा है
तुम्हारे भीतर जलती ममता को भी मैंने देखा है
तुम्हारे आँसू के मोती में एक माँ को मैंने देखा है।

-संदीप कुमार सिंह

 

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परिचय:
नाम – संदीप कुमार सिंह
जन्म – 21 अक्तूबर 1993, नगाँव, असम।
शिक्षा – हिन्दी साहित्य से एम.ए.(अध्ययनरत) तेज़पुर केन्द्रीय विश्वविध्यालय, तेज़पुर, असम।
संपर्क – +91-8471910640
ई-मेल - sandeepkrsingh405@gmail.com sk114762@gmail.com

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