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प्रदीप कुमार साह की लघुकथा - दुष्प्रभाव

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प्रकाश नाम का एक मेहनती छात्र था. वह परिक्षा में प्रत्येक कक्षा में अव्वल आता था. वह मेहनती तो था ही,काफी सौम्य और आज्ञाकारी भी था. इसलिए उससे शिक्षकगण हमेशा प्रसन्न रहते थे. इससे कुछ छात्र उससे ईर्ष्या रखने लगे. वे तरह-तरह से उसे परेशान करते, बेवजह उसकी शिकायत करते. इससे वह दुःखी रहने लगा.

एक दिन उसके वर्ग शिक्षक जयप्रकाश को उसके उदासी का आभास हुआ तो उसने प्रकाश से कारण पूछा. प्रकाश उनसे अपना सारा दुःखड़ा सच-सच बता दिया. सबकुछ जानकर उन्हें दुःख हुआ. किंतु उन्होने प्रकाश से उसका संयम और आत्मबल अधिकाधिक सबल बनाने कहा. उन्होने उस दोहे का स्मरण कराया जिसमें निंदक को इतना करीब कि आंगन में कुटि बनवाकर रखने की सलाह दी गई थी.

'ऐसा क्या संभव है?'प्रकाश का जिज्ञासा हुआ. वर्ग शिक्षक ने उसे समय की प्रतीक्षा को कहा जब उसका मन-मस्तिष्क इतना परिपक्व होता कि वह प्रश्नोत्तर समझ सकता.समय बीतने लगा. एक दिन वह पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया. उसके कर्तव्य परायणता और ईमानदारी से उसका प्रोन्नत्ति और नामवरी हुआ. अब उससे ईर्ष्या करनेवालों की संख्या भी अधिक हो गई. इससे वह दुःखी हुआ. उसे अपने प्रति अत्यधिक प्रेम रखनेवाले वर्ग शिक्षक जयप्रकाश का स्मरण हुआ. वह उनसे मिलने चला गया. जयप्रकाश बुढ़े हो चुके थे. उसने जयप्रकाश के चरण छुए और अपना परिचय दिया. उन्हें पूर्व की बातें स्मरण करा अपनी समस्या उनके समक्ष रखी.

जयप्रकाश मुस्कुरा कर बोले,"संसार में आये प्रत्येक जीवमात्र द्वारा किये प्रत्येक कर्म का अपना प्रभाव (प्रतिफल) होता है और उसका दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) भी. सुकर्मों का प्रभाव ज्यादा और दुष्प्रभाव कम होता है, इसके विपरीत दुस्कर्मों का. यद्यपि दुःप्रभाव को शून्य नहीं किया जा सकता,किंतु शून्य तक लाया जा सकता है. इसलिये मनुष्य सुकर्म करते हैं. शेष दुष्प्रभाव झेलने के लिये संयम रखते हैं. संयम रखने से आत्मबल बढता है और मनुष्यमात्र दुष्प्रभाव से काम की चीजें भी प्राप्त कर सकता है,जैसे कीचड़ से कमल प्राप्त होता है."

 

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