गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

शशि गोयल का हास्य-व्यंग्य - षट्ऋतु

षट्ऋतु

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कवियों ने बारहमासा और षट्ऋतु पर न जाने कितने ग्रन्थ लिख दिये हैं। नायक, नायिकाओं के जीवन में हर ऋतु अदभुत रोमांच लेकर आती है। रीतिकाल में लिखे महाकाव्य बिना बारहमासा और षट्ऋतु के पूर्ण ही नहीं माना गया।

विवाहित जीवन भी तो जीवन का महाकाव्य है, अगर विवाहित जीवन को इन ऋतुओं का अनुभव न करना पड़े तो समझ लो जीवन बेहद नीरस और उबाऊ हो जायेगा। नायक के लिये कम मगर नायिका के षट्ऋतु वर्णन में कवि खो जाता है । पर जब नायिका की वजह से षट्ऋतु का अनुभव प्रतिदिन नायक को झेलना पड़े तो उस नायक का क्या हो सकता है यह आप अच्छी तरह समझ सकते हैं और सभी भुक्तभोगी हैं यह अलग बात है हमने इन अनुभवनों को षट्ऋतु दिवस का नाम दिया है।

दिवस, जी हां इन ऋतुओं का एहसास एक दिन में होता रहता है, वह दिन होता है जब अधिकांश दुकानों पर एक साथ सेल का बोर्ड लग जाता है, साड़ी सेल पर तो जैसे उनमें एक उन्माद छा जाता है यह दिसम्बर या अप्रैल का कोई भी दिन हो सकता है।

बसंत का आगमन प्रातःकाल ही समाचार पत्र के साथ होता है। बसंत में नवांकुर को देख जहां कोयल के स्वर में कुहुक भर जाती है हमारी श्रीमती जी के स्वर में अखबार में सेल का विज्ञापन देखते ही कुहुक भर जाती है। चाय के साथ साथ हमें उंगलियाँ गुदगुदाती है। बासंती बयार बालों को सहलाती है। वाणी में अमृत रस घुला होता है। चेहरे की दमक हमें शृंगार रस से सराबोर कर देती है। रससिक्त तन बदन हमारी एक एक चाहत को जल्दी जल्दी पूरा करता जाता है।

बिना मांगे एक एक चीज स्थान पर मिलती जाती है, जैसे जीवन हमारे इर्दगिर्द मंडरा रहा हो। लेकिन साथ ही जब अपनी खाली जेब देखते हैं तो ऋतुऐं बदलने लगती हैं। हमारी आंखों में प्रश्न पीछे उभरता है उनकी आंखों में ग्रीष्म की ज्वालाऐं अपना रूप लेने लगती हैं। यदि एक बार भी हमने ना में सिर हिला दिया तो क्रोध का सूर्य पूरी तपन के साथ हमें झुलसा देता है और हमारी छांह भी बचने के लिए आफिस की छांह देखने लगती है। लेकिन उनके मुखाग्नि की ज्वालाऐं हमारे हर बचने के स्थान तक पहुंच जाती हैं । फुंकार के थपेड़ों में सारी कोमल भावनाऐं जल जाती हैं। शरीर का समस्त जल ताप से मस्तिष्क में पहुँच जाता है और प्रारम्भ हो जाती है वर्षा ऋतु, । बादल गरजने के साथ साथ बरसने भी लगते हैं तूफानी हवाऐं उन के बालों को बिखरा देती हैं। कपड़े अस्तव्यस्त हो जाते हैं बिजली हमारे साथ साथ घर के बरतनों पर भी गिरती है। आंसुओं की बाढ़ से घर आप्लावित हो जाता है और मायके प्रस्थान की तैयारी शुरू हो जाती है। हम उन नदी नालों को संवारने के लिए चैक बुक पकड़ा देते हैं तो प्रारम्भ होती है शरद ऋतु।

हमारा शरीर सिहरन से भर उठता है। नायिका शंगार प्रारम्भ कर देती है क्योंकि उसे अपनी प्रिय सखी के साथ नये सेंडिल, पर्स, साड़ी, शाॅल लानी है। वर्षा के बाद धुला धुला उनका चेहरा शरत की चाँदनी सा झिलमिलाने लगता है, शीतल चांदनी छिटक उठती है और चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है। लेकिन हमारे जीवन में शिशिर प्रारम्भ हो जाता है, सोच सोच कर ही कंपकंपी आने लगती है कि न जाने हमारी चैकबुक का क्या हुआ होगा? हमारी धन की सारी गर्मी कड़कड़ाते नोटों में तब्दील होकर दुकानदार के हवाले हो जायेगी। रुपयों पर पड़ने वाला पाला हमें दुःख से काला कर देता है और मस्तिष्क की तंत्रियों को लुंठित कर देता है। न जाने कितने रुपये लुट जायेंगे यह सोच सोच कर हमारी हड्डी हड्डी कांपने लगती है। इधर हमारा हड्डी तंत्र बजता रहता है, उधर न जाने कितने दुकानदान चूना लगाकर अगले साल की तैयारी में जुट जायेंगे । उनके रुपयों का वृक्ष हराभरा बना रहे। हम गम को मोटा लिहाफ ओढ़कर सब भूलने में लग जाते हैं।

उसके बाद आता है पतझड़ जब चैकबुक सामने लुटी लुटी पड़ी होती है। उसकी एक एक टहनी पर से रुपये रूपी पत्ते झड़ चुके होते हैं। हमारा चेहरा सूख जाता है। ठूंठ से असहाय दैव दैव पुकार उठते हैं। एक क्षीण आशा के साथ आगामी माह में मिलने वाले वेतन का इंतजार करते हैं जिससे पास बुक में नवांकुर फूंटे, फिर वृक्ष हरा भरा हो आगामी पतझड़ तक।

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