बुधवार, 9 दिसंबर 2015

. शोभा श्रीवास्तव की कविताएँ - ओ लड़की

ओ लड़की
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                          (1)
   ओ लड़की
   मत खेलो गिल्ली - डंडे
   मत नापो डंडे से
   गिल्ली तक का विस्तार
   पतंग की डोर के सहारे
   मत देखो आसमान

   लड़की होना,  पृथ्वी होना है
   पृथ्वी गोल है,  गेंद की तरह
   अौर गेंद की प्रकृति है लुढ़कना
   इसलिए
   लुढ़को , जिधर लुढ़काया जाए

   या फिर
   हवा का आँचल थामकर
   पहुँचो आकाश में
   और लौटो
   नक्षत्रों की अदम्य चमक लिए
   करो आलोकित पूरी पृथ्वी को
   कि सार्थक हो जाए
   तुम्हारा पृथ्वी समझा जाना
   और गर्व करे पृथ्वी
   अपने लड़की होने पर

   ओ लड़की
    विकल्प तुम्हारे सामने है।

                 (2)
     लड़की
     बेलती है रोटी
     जलाती है चूल्हा
     दहकता है अंगार
     लड़की
     रोटी की गोलाई में
     देखती है पृथ्वी
     आटे की लोई से
     चुनती है शब्द
     बनती है रोटी
     बनती है कविता

      रोटी, जैसे पूरी पृथ्वी
      कविता, जैसे अभी - अभी
      आँच पर सिंकी हुई रोटी।
               ---------
                          डाँ. शोभा श्रीवास्तव
                   प्राचार्य, हायर सेकेंडरी स्कूल
                      राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़

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