सोमवार, 7 दिसंबर 2015

सुधा शर्मा की कविता - ऐ मेरे भाई!

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ए मेरे भाई!
जरा आँख मिलाकर बता,क्यूँ तूने की रूसवाई?
तोडकर सारे प्रेम के बंधन नफरत की रीति निभाई


मुझे पता है....मुझे यकीं है,
बिल्कुल यकीं है,कल वो अवश्य तेरे घर आएगा
होली पर गले मिलेगा,दीवाली की मिठाई खाएगा


मुझे विश्वास है...
सारे तोडकर बंधन तू भी उसके घर जाएगा
ईद की देगा मुबारकबाद,साथ सेवैया खाएगा
फिर क्यों गैरो के व्यूह में फँस,घर में आग लगाता
सदियों की यह प्यार मुहब्बत,पल में भूल जाता


याद रख.......
उसकी राखि के बिन तेरा हाथ सुना रह जाएगा
गर उसके दामन मेम दाग लगा,तू भी सो न पाएगा


भूल गया......
पाक दामन को बचाने हेतु,तूने भी जान गँवाई है
उसका दामन छूने की फिर जुर्रत किसने दिखाई है


अभी तक.....
गंगा,यमुना की संस्कृति है,संग संग यग बहती है
रानी हो या रेहाना माथे की इज्जत रहती है


सोच जरा.. ......
आज जो खून बहाया,कल तू बहुत पछताएगा
अग्रिम संतति के ताने सुन,शीश शर्म से झुकाएगा


कल फिर........
नन्हीं सी रेखा आकर,तुझको मामूजा पुकारेगी
ओर छोटी सी फातिमा,गले में बहिया डालेगी


विचार कर......
उस मंजर को देख तू कितना झुक जाएगा
चाकू खंजर की जरूरत नहीं,ग्लानि से तू मर जाएगा


जाग जा..........
होश में आजा,तुम दोनों को संग जीना,मरना है
इन सियासी चालों में,क्यँ अपना लहू बहाना है

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