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पुस्तक समीक्षा - मक्खनाय नमो नमः

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पुस्तक समीक्षा

समय के सच के साथ समय की बात

कुमार कृष्णन

व्यंग्य लेखन एक प्राचीन विधा है। समकालीनता के साथ इसे जोड़कर देखें तो हरिशंकर परसाई के साथ लालित्य ललित तक की एक समृद्ध पीढ़ी उभरकर सामने आती है। हरिशंकर परसाई के बाद व्यंग्य लेखन करनेवाले डॉ सत्येन्द्र अरूण ने व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में वेहतर काम किया है। अब तक इनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। उन पुस्तकों में ज्यादातर पुस्तकें व्यंग्य पर ही केन्द्रित हैं। जहॉ तक व्यंग्य की निजता और परिभाषा का प्रश्न है तो इस विषय पर डॉ श्रीरंजन सुरिदेव कहते हैं — '' व्यंग्य अंग्रेजी के सैटायर के आधार पर ​निर्मित शब्द है। वि+ अंग = व्यंग्य में 'ण्यत्' प्रत्यय के योग से व्यंग्य शब्द उत्पन्न हुआ है। व्यंजना—शक्ति या परोक्ष संकेत के द्वारा ध्वनित अर्थ ही व्यंग्य है। व्यंग्य के माध्यम से किए गए चुहल और परिहास का संबध जिस रचना से होता है, वही व्यंग्यात्मक रचना होती है''

व्यंंग्य लेखन हिन्दी साहित्य की एक कठिन विधा है। इस विधा में लेखन करना चुनौती के समान है, क्योंकि व्यंग्य में कटाक्ष तो होता ही है। उस कटाक्ष में विचारविहीन दुनिया की कोई तस्वीर नहीं खड़ी होती है। विचार के साथ हास्य का पुट भी रहता है। व्यंग्यकार एक समकालीन यथार्थ के विरूद्ध प्रतिपक्ष में खड़ा तो होता है, लेकिन अपने लेखन की मूल्यांकन की कसौटी भी तय करता है, जिसका प्रमुख उद्देश्य होता है पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करना। हाल में ही प्रकाशित डॉ सत्येन्द्र अरूण की पुस्तक ' मक्खनाय नमो नम:' मीनाक्षी प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित होकर पाठकों के समक्ष आयी है। इस पुस्तक में ललित निवंघ के रूप में 23 रचनाएं हैं जिसमें ऐतिहासिक परंपराओं का पालन करते हुए समकालीन यथार्थ पर करारा प्रहार किया गया है। प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित का इस पुस्तक के संदर्भ में मत है कि लेखक ने इसमें अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक गतिविघियों पर व्यंग्य प्रहार किए गए हैं इन रचनाओं में व्यंग्य विनोद भी है और व्यंग्य वेदना भी। प्राय: प्रत्येक सैटायर व्यंग्य— विद्रूप से ओत—प्रोत हैं। लेखक ने ' मक्खनाय नमो नम:' मक्खन पुराण, मक्खन मंत्र,मक्खन स्तुति की चर्चा करते हुए इस मक्खन युग के मक्खन भक्तों का भण्डाफोड़ किया है। 'गणेश गोबर बल्ले— बल्ले में अरूण जी ने मूर्खो के सर्वशक्तिमान सम्प्रदाय की धज्ज्यिां उड़ायी हैं। ' महान देश के महान नागरिक' में उसने विषधरलाल जैसे बाहुबलियों की छीछालीदर की है। ' तुम मुझको वोट दो मैं तुमको रोटी' नामक रचना में शेरजंग बहादुर सिंह जैसे खलनायकों के वहाने यहां की वर्तमान राजनीतिक विडम्बनाओं पर कसाधाधात किया है। 'महासाहित्यकार को महानमस्कार' तथा 'काव्य के शीर्ष पर हरसिंगार' में भैरव रसिक जैसे कवियों की यहां पोल खोली गयी है। ' गली नं —2 का महात्मय' में रेशमी नायकों की व्यथा कथा प्रस्तुत की गयी है। इसी प्रकार 'जय बोलो जनता की', नेता एक रंग अनेक' आदि में रंग बदलते गिरगिट साहबों की बखिया उघाड़ी गयी है। 'कब दर्शन दोगो राम' में महंथ भोगानंद और भूतनाथ कपाली जैसे जीवों का पाखण्ड— विखण्डन किया गया है।

कुल मिलाकर यह पुस्तक पठनीय है। पूरे हिन्दी जगत में इसका स्वागत होगा।

 

समीक्षित कृति — मक्खनाय नमो नम:

लेखक — डॉ सत्येन्द्र अरूण

मूल्य — 150 रुपये

मीनाक्षी प्रकाशन

एम.बी.32/2बी, गली नं 2

शकरपुर, दिल्ली— 110092

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