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जिह्वा (बालकथा)-प्रदीप कुमार साह

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पेड़ के उस डाली पर बैठे तोता और कौआ दोनों मित्र अभी प्रसन्नचित्त थे. वे आपस में चुहलबाजी कर रहे थे. प्रेमवश उनमें चोंच से एक दूसरे पर मधुर आघात भी चल रहा था. वे पूरी तरह विनोद सागर में डूबे हुए थे.

उसी वक्त उस पेड़ के नीचे से एक कुत्ता गुजर रहा था. वह पेड़ का शीतल छाया देख कर वहाँ रुक गया. पूर्ण चौकन्ना रहकर उसने अपने नथुने ऊपर हवा में उठाकर सूंघते हुए आसपास का मुआयना किया.जब वह पुरी तरह आश्वस्त हो गया कि आसपास कहीं कोई खतरा नहीं तो पेड़ के छाँह में आराम करने चला आया.

उधर अपने चुहलबाजी छोड़ कर दोनों मित्र सावधान हो गए थे. वे ऊपर से पैनी दृष्टि से कुत्ते के प्रत्येक गतिविधि देख रहे थे. उन्होंने देखे कि कुत्ता पेड़ के नीचे आकर बैठ गया है.देर तक उसपर नजर रखने के बाद वे दोनों मित्र भी आश्वस्त हो गये कि उन्हें कुत्ते से किसी प्रकार के खतरा नहीं हैं.

यह प्रत्येक सांसारिक जीव हेतु आवश्यक होता है कि वह सदैव सतर्क रहे.सतर्क रहकर ही अपने अस्तित्व की रक्षा किये जा सकते हैं. सतर्क रहकर ही अपने परिवार, समाज, देश और अपनी स्वाधीनता की रक्षा की जा सकती है.कहे भी गये हैं कि सावधानी हटी और दुर्घटनायें घटी.इसलिये सावधानी रखने से दुर्घटनाओं को कम किया अथवा टाला जा सकता है.

दोनों मित्र जब किसी भी खतरा के प्रति आश्वस्त हो गये तो वे पुनः चुहलबाजी करने लगे.चुहलबाजी करते हुए कौआ की नजर पेड़ के नीचे बैठे कुत्ते पर गया. वह अभी तक हाँफ रहा था. उसके लम्बी सी जिह्वा अधर से बाहर लटक रही थी. कौए को कूट सूझी.उसने कुत्ते को चिढ़ाने अथवा क्रोधित करने के उद्देश्य से तोते के साथ युगलबंदी करते हुए यह कूट करने लगा-

"अजी, इस जुबाँ की क्या कहने?

जीभ-जिह्वा, जबान-रसना हैं इसके कितने नाम,हाँ कितने नाम.

अजी, लम्बी जुबाँ की भी क्या कहने?

चाहो तो कितने को दे दो, वक्त औ वेवक्त किसी के आए ना काम.

अजी, बड़ी जुबाँ की भी क्या कहने?

कितने लालच हैं जेहन में अपने, सबही से बतलाता हाय वह राम.

अजी, छोटे जुबाँ की भी क्या कहने?

संकोची है वह इतना कि सच कहने से हाय शर्माये-घबड़ाये राम.

अजी, तीखे जुबाँ की भी क्या कहने?

बोले रूखे-रूखे बैन कि प्रकटे मन के सारे अहं, बिगड़े सारा काम.

अजी, मीठी जुबाँ की भी क्या कहने?

जी भर गाओ प्रणय-गीत, राष्ट्र-प्रेम में गान चाहे हरि के मधुर नाम,

अजी, उस जुबाँ की भी क्या कहने?

जो सार्थक कर दे जीवन अपना, भर दे प्रति श्वासों में वह उन्मुक्त प्रेम के तान .

इसीलिये तो उसे मैं चाहुँ, उसे मैं मांगूं मेरे प्रभु राम, राम- राम......."

कौआ वैसे कूट करते हुए नीचे झांक कर देखा तो अवाक् रह गया. कुत्ता बिना क्रोधित हुए उनकी बातें बड़े ध्यान अथवा धैर्य से सुन रहा था.अपने प्रयत्न विफल होते कौआ से सहन नहीं हुये. वह दुबारा से चिढ़ाने के प्रयत्न करते हुये बोला,"ओ कृतघ्न, क्या तुम कुत्ते के सारे संस्कार से बिलकुल परे हो गये? माना कि मेरे गायन में सुर-ताल नहीं, एक कवि के मनोरम छंद भी नहीं और ना मुझमें ही एक कवि के कोमल और निर्मल हृदय हैं. किंतु मेरे गायन का कुछ तो तारीफ करते?"

कुत्ता सहानुभूति पूर्वक बोला,"मित्र, मैं तो तुम्हारा पूरा गायन सुनना चाहता था. गायन के मध्य में कुछ बोलकर तुम्हारी तन्मयता भंग करना नहीं चाहता था. इसलिये तुम्हारे गायन के पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहा था. कितने सुंदर तुम्हारे गायन थे, मैं शब्दों में उसे व्यक्त नहीं कर सकता."

कुत्ता थोडा ठहर कर पुनः बोला,"तुम्हारे गायन में विभिन्न जिह्वाओं के बारे में सरस तरीके से कितना-कुछ बताये गए हैं. सुनकर मन आनन्दित हो गए, किंतु हम जैसे मनुष्य से परे जीव के उत्थान और प्रोत्साहन हेतु भी कभी-कभी हमारे जैसे मनुष्येतर प्राणी के आदर्श चरित्र के उदाहरण वाले कुछ गायन सुनाकर हमें कृतार्थ करो."

कुत्ते का जवाब सुनकर कौआ झेंप गया. वास्तव में क्षमा और लज्जा ही उत्तम प्राणी के आभूषण होते हैं. वे इनका त्याग नहीं करते.वे विवेक का त्याग भी कभी नहीं करते, क्योंकि उपरोक्त गुण विवेकशील प्राणी के हृदय में ही अपना स्थान बनाते हैं. वे कभी किसी का उपहास नहीं करते, अनजाने में हुए भूल से सिख लेते हैं कि आगे गलतियों का दुहराव न होने पाये. वे हमेशा क्रोध का त्याग करते हैं.क्योंकि क्रोध आने से विवेकादि सभी सद्गुणों के नाश हो जाते हैं

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

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