सोमवार, 21 दिसंबर 2015

दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - तबाह कर देंगी ये बददुआएँ



हमारा पूरा जीवन धनात्मक और ऋणात्मक आयनों और आयामों से जुड़ा हुआ है। इनमें  धनात्मकता अधिक होने पर हम आत्म आनंद, प्रसन्नता और असीम शांति का अनुभव करते हैं और हमेशा खुद भी मुदित भाव में रहते हैं तथा हमारे संपर्क में आने वाला हर इंसान भी प्रसन्न रहता है।

ऋणात्मकता और धनात्मकता में समानुपात होने पर हम सामान्य जीवन जीने लगते हैं। कभी खुशी और कभी गम वाली स्थितियाँ बनी रहती हैं। लेकिन ऋणात्मकता का प्रतिशत थोड़ा सा भी अधिक हो जाने की स्थिति में हम दुःखी, खिन्न और अवसादग्रस्त होते हैं और यह विषाद हमें मानसिक और शारीरिक दोनों ही दृष्टि से कमजोर कर देता है।

यह ठीक वैसी ही स्थिति है जिसमें कि पाप और पुण्य बराबरी पर होने की दशा में इंसान का जीवन सामान्य रहता है, पाप बढ़ जाने पर दुःख और पीड़ाएं पनपनी आरंभ हो जाती हैं, पुण्य बढ़ने पर आनंद भाव का संचरण होने लगता है।

कारण यह है कि पाप बढ़ने पर कुदृष्टि वाने ग्रह-नक्षत्र हावी हो जाते हैं और अपना प्रभाव दिखाने लगते हैं। यही कारण है कि पुण्यार्जन के लिए प्रयास होने पर कुप्रभावों में थोड़ी कमी आने लगती है।
एक इंसान की पूरी जिन्दगी इसी प्रकार दुआओं और बददुआओं के आधार पर तरक्की और पतन का ग्राफ पाती रहती है। जिन लोगों के पास दुआओं का भण्डार जमा होता चला जाता है वे जीवन में सफलता पाते और आनंदित होते हैं।

इसके विपरीत जो लोग बददुआओं वाले कर्म करते हैं उनका भाग्य कलंकित हो जाता है तथा जीवन में सफलता और आनंद से दूर रहते हैं। सफलता का यह अर्थ नहीं है कि हम वैभवशाली हो जाएं, बड़ा कद पा लें, मद में मस्त हो जाएं और अपने कदों को इतना अधिक ऊँचा कर लें कि आम लोगों की पहुंच या सम्पर्क से दूर हो जाएं।

जिस सफलता में आनंद का भाव न हो, वह इंसान को शव की तरह बना डालता है। ऎसे लोगों से दूसरे भयभीत रहा करते हैं क्योंकि लोग शव और भूतों से भी खौफ खाते हैं। अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में हम सवेरे जगने से लेकर सोने तक जो-जो काम करते हैं, उनका निरपेक्ष भाव से थर्ड पार्टी के रूप में मानकर मूल्यांकन करें तो हमें साफ पता चलेगा कि रोजाना हमारे खाते में बददुआएं जमा हो रही हैं और दुआओं का प्रतिशत नगण्य होता है।

दुआएं लेने लायक कोई काम कभी कर भी दिया करते हैं तो उसकी इतनी अधिक पब्लिसिटी कर डालते हैं कि उससे प्राप्त होने वाला संचित पुण्य समाप्त हो जाता है और हमारे पास इसका कोई श्रेय नहीं बचता।
दुआएं कोई देता या करता है तब हमें प्रत्यक्ष तौर पर भान भी हो जाता है। लेकिन हमारी अपनी नालायकी, खुदगर्जी, शोषण और क्रूरता, हिंसक स्वभाव, लूट-खसोट वाली मनोवृत्ति या दूसरों पर हावी होने की कोशिश करने जैसे हालातों में जो लोग हमारे सम्पर्क में आते हैं वे सभी लोग मन ही मन हमारे लिए बददुआओं का भण्डार हमें गिफ्ट करते रहते हैं।

खूब सारे लोग हमारे संपर्क में आते रहते हैं जो कि अपने घृणित स्वार्थों को पूरा करने तथा अपने खोटे सिक्के चलाने भर के लिए शिकायती स्वभाव पाले हुए हैं या औरों के कंधों पर बंदूक रख कर चलाने और तमाशों का आनंद पाने के आदी हो गए हैं, इन लोगों के सर पर भी रोजाना ढेरों बददुआओं के ढेर जमते रहते हैं।  शिशुपाल के सौ अपराध तक जीने का समय मिल गया। अब कलियुग है, हजार अपराध तक इंसान का कुछ नहीं बिगड़ता, पर एकाध भी ज्यादा हो जाए तो फिर उसे कोई बचा भी नहीं सकता।

रोजाना एक इंसान की भी बददुआएं हमें लगें तो साल भर में तीन सौ पैंसठ बददुआओं का भण्डार हमारे खाते में जमा हो जाता है। यह तो केवल एक ही की बात हुई है। हम रोजाना जाने कितने सारे ऎसे काम करते हैं जिनसे लोग हमसे खफा होते हैं, कितने सारे लोग हमसे निराश होते हैं और बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जिन्हें हम बिना बात के सिर्फ हमारे अपने स्वार्थ और दुष्टता या आसुरी भावों को पूरा करने के लिए तंग करते हैं, तनाव और पीड़ाएं देते हैं तथा उनके जीवन में हताशा,निराशा और दुःख भरते हैं।

ये सारे लोग हमें बददुआएं देते हैं और रोजाना इनकी पुनरावृत्ति तब तक करते रहते हैं जब तक कि हमारा कोई अहित न हो जाए अथवा हम काल कवलित न हो जाएं। ये सारे लोग कातर स्वर में भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि किसी न किसी तरह हम मुख्य धारा से हट जाएं या अस्तित्वहीन ही हो जाएं।

हम अपने अहंकार में भर कर अपने आपको चाहे कितना लोकप्रिय, वैभवशाली और सफल इंसान मानते रहें, हमारी हकीकत कुछ दूसरी ही है। और वह यह है कि हम अपनी पूरी जिन्दगी में लाखों बददुआएं सर पर ढोए हुए चलते हैं।

यह बददुआएं किसी परमाणु बम से कम नहीं हैं। गरीब और पीड़ित की आह और कराह में जबर्दस्त मारक क्षमता होती है। जो जितनी अधिक बददुआएं लेगा, उतना अधिक घातक प्रहार उसके लिए क्रूर मारक सिद्ध होगा।

हर शिशुपाल के संहार लिए एक निश्चित समय निर्धारित है और वह समय उन सभी लोगों के लिए आने ही वाला है जो बददुआएं पाने लायक खोटे कर्म करते हैं। फर्क बस इतना सा है कि जिसके खाते में जितनी अधिक बददुआएं होंगी, वह उतना अधिक निर्ममता से कुचला जाएगा।

और इससे भी बड़ी बात यह होगी कि इनका नामलेवा कोई नहीं बचने वाला। दुनिया में जो आए हैं उन सभी का धर्म और फर्ज है कि दूसरों को प्रसन्नता दें, कोई काम ऎसा न करें कि लोगों की बददुआएं लगें। जितना अधिक हो सके, दुआएं ही लें।

बददुआओं की शक्ल नहीं होती लेकिन वे ज्वालामुखी धधकाने वाले किसी पहाड़ से कम नहीं होती, एक बार कहीं से कोई लावा फूट निकला तो फिर खैर नहीं। ये बददुआएं कहीं हमें तबाह न कर डालें, यह हम सभी को सोचना है। भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya
- डॉ0 दीपक आचार्य
dr.deepakaacharya@gmail.com




















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