बुधवार, 2 दिसंबर 2015

शिव कुमार यादव की कवितायें

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आमंत्रण

डूब रही है संवेदना की नब्ज

आइए – इसे रफ़्तार दीजिये ,

लुट रही रोज उम्मीद की दुल्हन

आइए इसे - श्रृंगार दीजिये ,

भटक रहे स्वर अधरों से

आइए इसे – मल्हार दीजिये ,

 

भोथरी हो रही कलम मानवता की

आइए इसे – धार दीजिये ,

खड़े हो रहे भ्रष्टाचार के रावण

आइए इसे – अंगार दीजिये ,

चल रही वतन में,नफ़रत की आंधी

आइए इसे – तिरस्कार दीजिये ,

 

खो रहा है देशप्रेम का जज्बा

आइए इसे – हुंकार दीजिये ,

लुट रहा चमन से खुश्बू का बसेरा

आइए इसे – बहार दीजिये ,

खुशहाल हो जायेगा-कुदरत का नजारा

आइए इसे – दुलार दीजिये .

 

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फितरत

खुदगर्जी की नाव पर सवार हैं लोग

आदमी नहीं टूटे पतवार हैं लोग

हर लम्हा बदलते फितरत अपनी –

कभी समंदर,कभी किश्ती,कभी मंझधार है लोग

चस्पा है हर किस्सा इनके वजूद में –

मेरे शहर के चलते फिरते अखबार हैं लोग

 

नर्म सपनों की धूप ठहरती नहीं यहाँ

कभी खंजर,कभी तलवार हैं लोग

बदहवास है इंसानियत का चेहरा

हर कदम पर खड़े गुनहगार हैं लोग

 

दूषित हो रहा आदमी का लहू

विकृत संस्कृति, विकृत संस्कार हैं लोग

कोई सरोकार नहीं मजहब औ’ मुहब्बत से

हैवानियत के खुले इश्तहार हैं लोग

बड़ा संगदिल है इस शहर का दस्तूर

सब तरफ जलते अंगार हैं लोग...

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सुकरात की तरह...

दर्द, बरसों मत मेरी जिंदगी में

बरसात की तरह..

बह रहा साँसों का जहर

वजूद में जज्बात की तरह..

खुशियाँ आनी जानी है, सपने बेमानी हैं

दर्द का सफ़र है ,बारात की तरह…

 

सबने छला, सबने ठगा

प्यार भी मिला - आघात की तरह…

दर्द बरसो मत...

समेट लिया सभी बदनामियों को

बेशकीमती – सौगात की तरह…

बिक चुकी अपनेपन की तासीर

उम्र की गली में- बदजात की तरह…

 

दर्द बरसो मत....

नहीं रही अब चाहत रोशनी की

पसर जाऊँगा-अँधेरी रात की तरह…

झेल नहीं पाऊँगा जलजला जिंदगी का

जहर पी जाऊँगा- सुकरात की तरह…

दर्द बरसो मत...

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कितने सितम देखे हैं...

जमाने में कितने सितम देखे हैं

कहते हो फिर भी, बहुत कम देखे हैं

मजबूरी में बंधते चांदी की पायल

हर कदम पर, ऐसे कदम देखे हैं

 

लाश बनकर जी रहे हैं

जिंदगी के ऐसे भरम देखे हैं

भूख की भट्टी में गलते

फौलाद को भी नरम देखे हैं

नंगी हो रही जज्बात की दुल्हन

शर्म को भी बेशरम देखे हैं

 

और कितनी गिरेगी इंसानी फितरत

हर चौराहे पर खुलते हरम देखे हैं

लहू बेरंग हो गया है आदमी का

उसके ऐसे वैसे करम देखे हैं

 

गर्त में जा रही वतन की आबरू

सरपरस्तों के नर्म बिस्तर गरम देखे हैं

सिसक रही इंसानियत जुर्म की गली में

सीने में अनगिनत जखम देखे हैं

कभी न ख़त्म होगा ये जलजला

तस्वीर ये हकीकत की हर जनम देखे हैं

 

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मिजाज

बदलते शहर का मिजाज देखिये

डूब रही मेरी आवाज देखिये .

नपुंसकों ने उठाया है – सियासत का झंडा

कितना बेसुरा है – ये साज देखिये .

 

चमकेगा नहीं आसमां में- उम्मीद का सूरज

इस दौर का नया अंदाज देखिये .

पाँव धोखा दे रहे- खुद की चाल को

लड़खड़ा रहे हैं कैसे-जाबांज देखिये .

 

मुखौटों में गुम है आज का आदमी

अजनबी सा लगता- ये समाज देखिये .

खुदकुशी का आलम है सब तरफ

कल जिंदगी देखी-मौत आज देखिये .

 

बहारें आती नहीं ख़्वाबों के चमन में

मौसम का अजीब ऐतराज देखिये .

अजीब पैमाना है साँसों के सफ़र का

कुदरत का नया आगाज देखिये .

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शिव कुमार यादव

डी. 170 , आर.एम.एस. कालोनी

टैगोर नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़

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