शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

पुस्तक-समीक्षा जो इन पन्नों में नहीं है- स्त्री स्वायत्तता का अनोखा आख्यान

साहित्य जगत में किरन अग्रवाल उन गिने-चुने शीर्षस्थ साहित्यकारों में एक हैं, जो अनूठे प्रतीक तथा अभिव्यक्ति की सहज और सुबोध शैली के लिए मशहूर हैं। किरन का कथालोक कल्पना की भित्ति पर खड़ा न होकर यथार्थ की वास्तविकताओं से निर्मित है। प्रख्यात साहित्यकार भालचन्द्र जोशी ने ‘जो इन पन्नों में नहीं है’ के इंगितार्थ को स्पष्ट करते हुए ‘प्रतिदान’ को प्रेम की सकारात्मकता को बचाये रखने पर बल देती कहानी बताते हुए मॉर्निंगवॉक की नायिका चेतना के जीवन सापेक्ष दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में ठीक ही लिखा है- “चीजों और स्थितियों को देखने-समझने की दृष्टि और निर्णय का धैर्य इसी लड़की को आगे ‘जो इन पन्नों में नहीं है’ की यातना के दुर्ग को तोड़ने के साहस तक ले जाती है।”

    संग्रह की पहली कहानी ‘प्रतिदान’ देश की रक्षा के लिए सीमा पर अपना सर्वस्व लुटानेवाले सैनिकों के प्रति रश्मि की राष्ट्रवादी सोच को दर्शाती है। रवि की डायरी और परमवीर चक्र को सहेजकर रखना उसके निष्काम प्रेम का अनूठा उदाहरण है। यह कहानी सैनिकों की निर्दयता को लेकर जन सामान्य के बीच प्रचलित धारणाओं को निर्मूल सिद्ध करती हुई उनके जीवन की कटु सच्चाइयों से परिचित कराती है। पाश्चात्य शिक्षा के प्रति उच्च वर्ग के गहरे रुझान तथा स्त्री शिक्षा और उसकी स्वायत्तता को लेकर पितृ सत्तात्मक समाज के भेदभाव पूर्ण रवैये को भी लेखिका ने भलिभाँति रेखांकित किया है। बाल सुलभ चेष्टाओं की मनोहरता इस कहानी के कथानक को रोचक और रमणीय बनाती है। आवाज़ों को कंधे से झटकना, आँखों में उदासी का दबे पाँव उतरना, हृदय का खरगोश की तरह मुलायम होने की प्रतीकात्मकता अनूठे भाव-बोध को व्यंजित करती है।

    संग्रह की कहानियाँ स्त्री जीवन की शास्वत विडम्बनाओं को बेनकाब करती हुई उन जिन्दादिल एवं जुझारू महिलाओं के साहस और संघर्ष की बातें करती हैं जो संस्कारों के नाम पर जमी धूल को बहुत हद तक झाड़ चुकी हैं और नारी प्रकृति को स्वीकारती हुई अपराध बोध के चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए उद्यत हैं। ‘अपना पता’ के शकुन की आपबीती इतनी हृदय विदारक है कि पढ़कर द्रवित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। पुरुष मानसिकता की पड़ताल करती यह कहानी अमूमन आज की भारतीय स्त्रियों के अपने होने को लेकर उनकी छटपटाहट को उजागर करती है। मीता का शकुन को लिखे पत्र की ये पंक्तियाँ – ‘अपना पता नहीं लिख रही हूँ क्योंकि अपना पता ही तो ढूँढना है मुझे’ की उक्ति का इंगितार्थ देखते बनता है। ‘न हन्यते’ का कथ्य भी प्रतिदान कहानी-सा ही सैनिक जीवन की सच्चाइयों पर आधारित है। देश में बढ़ रही आतंकवादी गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए सैनिक जीवन के त्याग को कहानी का वर्ण्य विषय बनाना लेखिका के गहरे राष्ट्रानुराग को दर्शाता है।    

जीवन में समझौते की आदतें तो प्रायः स्वभाव का हिस्सा बन ही जाती हैं। किन्तु अपनी अस्मिता के लिए आखिरी साँस तक लड़ते रहने की रीमा की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण बैक ‘गीयर संग्रह’ की      अन्य कहानियों से अलग है। यह ऐसी कहानी  है जिसकी कौंध मन-मस्तिष्क पर देर तक बनी  रहती है।

ध्वन्यात्मकता के संदर्भ में अभिषेक की  पत्नी रीमा का गेहूँ की बोरी–से धमाक से गिरने की जगह बेहतर होता यदि वह भद्द से गिरती। वहीं ‘डॉक्टर हैरिस’ की कहानी में ‘गोली गले के अंदर निगलकर पूछती हूँ मैं’ की ‘जगह गोली निगलकर पूछती हूँ मैं’ होता तो कथन की स्वाभाविकता बनी रहती।

त्याग और आपसी विश्वास की नींव पर निर्मित मनुष्यत्व संसार के सारे रिश्ते-नातों से श्रेष्ठ होता है। मन का काला होना मुँह के काले होने से कितना अधिक त्रासद होता है ‘डॉक्टर हैरिस’ कहानी में देखा जा सकता है। भाव-भंगिमा निरूपण में प्रयुक्त किरन जी का रंग-कौशल भी मन को खूब आकृष्ट करता है।

‘जो इन पन्नों में नहीं है’ स्त्री स्वायत्तता के विभिन्न आयामों को रेखांकित करती आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई एक मार्मिक कहानी है। कहानी की नायिका का कथन-‘हर नाम मुझे अपना ही लगता है। हर स्त्री का चेहरा अपने चेहरे जैसा लगता है। जब कभी भीड़ में अकेली किसी स्त्री को देखती हूँ तो लगता है कि यह तो मैं हूँ। तब बड़े पसोपेश में पड़ जाती हूँ कि अगर वह मैं हूँ तो मैं कौन हूँ’ जैसी उक्तियाँ स्त्री की पीड़ा के विविध पक्षों को भलीभाँति चित्रित करती हैं।
   
संग्रह की अन्य कहानियाँ भी कहानी-कला की कसोटी पर खरी प्रतीत होती हैं। शब्द, शिल्प और शैलीगत सहजता के साथ-साथ प्रवाहमयता भी इनमें खूब है। शब्द संयोजन लयात्मक आरोह-अवरोह से इस तरह आबद्ध है कि कदम-कदम पर काव्यात्मक छवियाँ जीवन्त हो उठी हैं। ‘जो इन पन्नों में नहीं है’ की कहानियाँ स्त्री जीवन के तल्ख एवं त्रासद पक्ष को समझने में सहायक सिद्ध होंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।


आचार्य बलवन्त
पुस्तक : जो इन पन्नों में नहीं है (कहानी संग्रह)
लेखिका : किरण अग्रवाल

समीक्षक-आचार्य बलवन्त

विभागाध्यक्ष हिंदी
कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज
450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053
मो. 91-9844558064  
Email- balwant.acharya@gmail.com

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