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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - जो पहल करे वही सच्चा इंसान

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इंसान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपनी बुद्धि का पूरा-पूरा उपयोग करते हुए हर अच्छे कार्य में पहल करे। आत्मीय जुड़ाव रखे और ऎसे श्रेष्ठ कार्यों में भागीदार बने। जो अच्छे हैं उनमें मददगार बनें और जो बुरे हैं, उन कार्यों से परे रहें और ऎसे कार्यों को हतोत्साहित करें। इंसानियत से भरे-पूरे एक अच्छे आदमी की यही ख़ासियत है।

अपने स्वार्थ से कोई अच्छे काम या अच्छे आदमी को बुरा बताये अथवा बुरे काम या बुरे आदमी को अच्छा बताये, यह अलग बात है। आमतौर पर हर इंसान यह समझता जरूर है कि दुनिया में क्या सही, क्या गलत है। क्या स्वीकार्य व क्या तिरस्कार योग्य है। लेकिन जहाँ उसके कोई से छोटे-मोटे स्वार्थ, खुदगर्जी और नाजायज काम सामने आ जाते हैं, वहां इंसानियत को ताक में रखकर वह सब कुछ भूलकर भेड़ों की मानिन्द उधर बढ़ चलता है जहाँ से उसे कुछ मिलने की उम्मीद होती है।

यह उम्मीद न हो तो आदमी एक कदम भी आगे न बढ़े। आजकल इंसानाें के मामले में भी बहुत सी विभिन्नताएं देखी जा रही हैं। आदमी के भीतर वह सब कुछ खत्म होता जा रहा है जिसके लिए कहा जाता था कि इंसान में वो ताकत है कि जहां ठोकर मारेगा वहीं पानी निकाल देता है।

अब आदमी में उतनी जीवनी शक्ति नहीं है, वह जीवट नहीं रहा, जिजीविषा नहीं रहीं और इन सबका स्थान पा लिया है दरिद्रता, आलस्य, कामचोरी व हरामखोरी ने।

आदमी एटीएम मशीन की तरह हो गया है जो तभी  हरकत में आता है जब उसके तार किसी न किसी लाभ के मौके से जुड़े हों। लाभ न हो तो वो आदमी अधमरा या बेसुध पड़ा रहेगा। जगाये नहीं जगता। ऎसा अभिनय करता है जैसे बरसों से टीबी का मरीज हो और कुपोषण उसके जीवन की नियति बन गई हो।

एक भूखा और प्यासा आदमी जिस तरह टुकर-टुकर कर देखता है, कुछ पाने के लिए जीभ लपलपाता है। किसी हिंसक जानकार की तरह माँस के लोथडे़ पर लपक कर टूट पड़ता है। उसी तरह आदमी पैसों की खनक सुनते ही जागकर उधर भाग उठता है जिधर कोई रसभरी मिठाई चाशनी से लबालब जलेबी या कोई सुनहरे पैकेट में बँधा हुआ गिफ्ट सामने हो।

आदमी के बारे में न कोई सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है और न हीं आदमी के चेहरे को देखकर उसके दिल व दिमाग में उभरते विचारों को पढ़ा जा सकता है। इसलिए अब परफेक्शन के लिए चिंतित न हो, किसी को भला-बुरा न कहे। जो जैसे हैं उन्हें स्वीकारें।

कोई जरूरी नहीं कि जिसे हम स्वीकार कर रहे हैं वह जर्सी गाय की तरह दूध देने वाला ही हो, गाय दूध भी देती है और लातें भी मारती है। इस स्थिति में अपेक्षाओं से मुक्त होकर जीना ही आज का सबसे बड़ा युगधर्म है।

वह जमाना अब चला गया जब लोग समुदाय या अपने बाडे़ का काम स्वेच्छा से कर लिया करते थे। अब आदमी इतना निष्ठुर, निर्लज्ज व नाकारा हो गया है कि वह अपनी ओर से कभी पहल नहीं करता। वह उन्हीं कामों को करने का आदी हो गया है जो काम उसे किसी प्रलोभन या दबाव से सौंपे जाते है। पहल करना अब आदमी के स्वभाव से पूरी तरह गायब हो चुका है।

इंसान के मामले में अब यह कहा जा सकता है जो अपनी ओर से पहल करते हुए आगे आता है, अच्छे कार्यों को खुद करने का ज़ज़्बा दिखाकर पूरी आत्मीयता से करता है और बेहद सफल परिणाम देता है।

इस दृृष्टि से जो लोग पहल करते हैं वे इंसानियत के सच्चे रखवारे और कर्मयोगी कहे जा सकते हैं। दूसरों के बारे में भगवान भी नहीं बता सकता कि ये इंसान कैसे बन गये। इंसान जग में कुछ पाना चाहे, अपनी प्रतिष्ठा बनाना चाहे तो कार्यों से दूर नहीं भागे, खुद पहल करते हुए आगे आएं और अपने आप को पक्के इंसान के रूप में प्रतिष्ठित करें। जो दीनता दिखाता है, पलायन करता है वह अपने पूर्वजन्मों की जड़ता और पशुता पाले रखता है।

 

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

  dr.deepakaacharya@gmail.com

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