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पुस्तक समीक्षा - जूठन और अन्य लघुकथाएँ- स्त्री स्वायत्तता का उद्घोष

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कथा साहित्य में लघुकथा गद्य की प्रमुख विधाओं में एक महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में विकसित हुई है। प्रभावोत्पादक तो यह इतनी होती है कि मन पर सूक्ति जैसा असर डालती है। इंगितार्थ भी इसके अद्भुत होते हैं। बोधगम्य होना तो इसका विशेष गुण है ही। विद्यालाल के लघुकथा संग्रह की ‘जूठन और अन्य लघु कथाएँ’ उपरोक्त मानकों पर खरी उतरती हैं। इनकी लघुकथाएँ स्त्री जीवन की विडम्बना और सामाजिक व्यवस्था की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करती हैं। समाज में व्याप्त वर्ण वैषम्य, लैंगिक भेदभाव एवं वैचारिक असमानता इनके वर्ण्य विषय हैं। व्यवस्था को लेकर लेखिका के कथन की व्यंग्यात्मकता जहाँ पाठक के हृदय को बेधती है, वहीं आगे के औत्सुक्य से बाँधे भी रखती है। लेखिका के मन का उद्वेलन यहाँ सामाजिक यथास्थिति पर गम्भीरतापूर्वक सोचने-विचारने की माँग करता प्रतीत होता है।

संग्रह की अधिकांश लघुकथाओं के कलेवर कसे हुए हैं। शब्द, शिल्प और शैलीगत सहजता अद्भुत है। ‘वर्ण व्यवस्था’ संग्रह की प्रथम लघुकथा है, जिसमें समाज में प्रचलित भेदभावजनित वर्ण व्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए लेखिका ने सवर्ण मानसिकता को जिम्मेवार बताते हुए समाज के अन्य वर्गों के खिलाफ इसे रची गई गंभीर साजिश के रूप में चित्रित किया है। ‘काशी करवट’ परिवार के बड़ों व बुजुर्गों के प्रति हमारी सोच और सरोकारों में आये बदलाव को रेखांकित करती है। पर इसे लेखिका का वर्तमान पीढ़ी की एकांगी सोच के साथ सहमत होना नहीं समझा जाना चाहिए।

कहा जाता है कि आदतें आगे चलकर व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं। झूठ भी उन्हीं आदतों में एक है, जो बेटी-बेटे के बीच समानता की डींगें हाँकनेवालों की हकीकत को सामने लाता है। ‘पहलू’ सामाजिक यथार्थ को निरूपित करती विचारपरक रचना है। प्रायः होता यही रहा है कि विवाह के बाद घर में घटी किसी भी अप्रिय घटना के लिए लड़की को ही उत्तरदायी मान लिया जाता रहा है। हद तो तब होती है, जब लड़की के माँ-बाप व सगे-संबंधी भी लड़केवालों की हाँ में हाँ मिलाते उनके साथ खड़े दिखाई देते हैं। इस स्थिति में पूर्णिमा जैसी बहादुर बेटियाँ ही अपशकुन के लिए बहू को दोष देने वाली रूढ़िग्रस्त मूंढ़ माँओं का मार्गदर्शन करती रही हैं।

लघुकथा ‘आजकल’ विधवा पुनर्विवाह को लेकर समाज में व्याप्त नकारात्मक अवधारणा को दर्शाती है। ‘जिम्मेदारी’ दुर्घटना को नियति से जोड़ने जैसी सोच पर सवाल खड़े करती है। ‘महक’ उन बेटे-बहुओं की संवेदनहीनता की पोल खोलती है, जो माँ के पेंशन के पैसे पर मजे तो करते हैं, पर उनकी सेवा-सुश्रुषा के नाम पर नाक-भौंह सिकोड़ लेते हैं। ‘चार अक्षर’ स्त्री स्वायत्तता का उद्घोष करती एक हृदयस्पर्शी लघुकथा है। “औरत भला काबिल कैसे होगी चार अक्षर पढ़कर! काबिल तो आप पुरुष लोग होते हैं न? चाहे चार अक्षर पढ़े हों तो भी, चाहे काला अक्षर आप लोगों के लिए भैंस बराबर ही क्यों न हो।” जैसी सुधा जी की उक्तियाँ पुरुषवादी सोच को आईना दिखाती-सी प्रतीत होती हैं।

 

लघुकथा ‘सहोदर’ उस प्राचीन पारम्परिक सोच पर सवाल खड़े करती है जिसमें पुरुष को अपनी पत्नी का पक्ष लेकर सगे भाई से नहीं लड़ने की नसीहत दी जाती रही है। ऐसे मामलों में माँएं यह कहते हुए बीच में आ जाती हैं कि बीवी के लिए भाई की जान के पीछे पड़े हो, बीवियाँ तो तुम्हें कई मिल जायेंगी, पर पीठ का भाई कहाँ मिलेगा?

लघुकथा ‘सीख’ में प्रयुक्त निम्न पंक्तियाँ मनोरमा जैसी माँ की सोच पर व्यंग्योक्ति हैं। “जेठ-जेठानी तो छोड़ो, सास-ससुर तक को सीधा कर दिया है हमारी लल्ली ने। महेश से कहो हमारी लल्ली से सीखे।” ‘अपना’ अपने और पराये के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है। ये भी बताती है कि रिश्ते जाति एवं धर्म की कपोलकल्पित मान्यताओं से नहीं, अपितु अपनेपन के भाव से निर्मित होते हैं।

लघुकथा ‘तलाक’ की कथावस्तु आम जीवन से ली गई है। अब तक पुरुष स्त्री पर बदचलन होने का मिथ्या आरोप मढ़कर उसे प्रताड़ित करता रहा है। पर विनीता के द्वारा अपने चरित्रहीन पति से संबंध विच्छेद कर नये जीवन की ओर कदम बढ़ाना उसकी सकारात्मक सोच का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे ईंट का जवाब पत्थर से देना भी कहें तो अनुपयुक्त न होगा। ‘समावेश’ भले-बुरे का विचार करने के बाद ही किसी तथ्य को अपनाने की नसीहत देती है। साथ ही इस बात पर भी बल देती है कि समाज के लिए जो शाश्वत एवं उपादेय है, उसे भी परम्परा के नाम पर अस्वीकार न किया जाये।

लघुकथा ‘धर्म’ अन्तर्जातीय संबंधों से जन्मी संतानों के धर्म को लेकर चल रही उहापोह को सही दिशा देने की सार्थक कोशिश है। लेखिका ने स्त्री को उसके अधिकारों के प्रति जागरुक बनाने में शिक्षा की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण बताया है। संग्रह की अंतिम लघुकथा ‘कब तक’ का सही जवाब अभी भी प्रतीक्षित है। अशिक्षित तो अशिक्षित, पढ़े-लिखे उच्च शिक्षितों में भी विधवाओं के प्रति जो भेदभाव है, वह सामाजिक सोच की संकीर्णता को भलीभाँति उजागर करता है। संग्रह की अन्य कहानियाँ भी रोचक, शिक्षाप्रद और उद्देश्यपूर्ण हैं। विद्यालाल की लघुकथाएं सामाजिक बदलाव में सहायक सिद्ध होंगी, ऐसी सम्भावना है।

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पुस्तक (लघुकथा) -जूठन और अन्य लघुकथाएँ

लेखिका - विद्यालाल

 

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समीक्षक-आचार्य बलवन्त

विभागाध्यक्ष हिंदी

कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज

450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053

मो. 91-9844558064

Email- balwant.acharya@gmail.com

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