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अनंत वडघणे का आलेख - संत साहित्य में जनवादी दृष्टि


                                                                                          - अनंत वडघणे

भारतभूमि के लिए सबसे बड़ी देन संतों की रही है, जिन्होंने सुख, दुख, काम, वासना से परे होकर सामाजिक सरोकार होने का किर्दार निभाया। एक असीम संकट के समय में अगर छोटा-सा तिनका भी अपनी उपयोगिता सिध्द करता है तो वह हिमालय से भी बढ़कर होता है। ऐसे ही संतों की वाणी रही है। जिन्होंने बड़े-बड़े बादशाओं तथा धर्म मांर्तड़ों के विरोध को खारिजकर जनवादी होने का सबूत पेश किया है। इसलिए उनकी वाणी समाज में उस तिनके के भांति श्रेष्ठ कहीं जा सकती है, जो समाज उपयोगी हो। इसीलिए तो आज 21 वीं शती में भी उनके वाणी का जब पाठ करते हैं। तो मनुष्य का सिर सहज ही नतमस्तक हो जाता है तथा विज्ञान के  नये-नये अविष्कारों के कारण बदलते जीवनमूल्यों में भी चिंरतम सत्य का अनुभव करता है। जिसमें अप्रासंगिता की कोई गुजाईश नहीं है। जब कहां जाता है कि, वैश्वीकरण के कारण दुनिया 'ग्लोबल गांव' में तबदील हुई है। तभी उससे आगे जाकर बात करनेवाले संत ज्ञानेश्वर याद आते हैं जिन्होंने एक समय कहा था 'यह विश्व ही मेरा घर है' इसलिए संतों की वाणी समाज के लिए उर्जा देनेवाली रही है। जिसकों भले ही एक छोटे-छोटे अणु-रेणु के रुप में देखे किन्तु जिस तरह अणु-रेणु के सहयोग से ही अणुबम बनता है। उसी रुप में सभी सन्तों के विचारों को संग्रहीत करें तो वे समस्त विश्व में वैश्विक शांति का कार्य कर सकते हैं। जिनमें संत कबीर, संत नामदेव,संत तुकाराम, संत रैदास, संत -ाानेश्वर,संत अक्कमहादेवी, संत गुरु नानक, संत बसवैश्वर जैसे कही संतों के वाणी में हम वैश्वीकता के दर्शन करते हैं तथा उनमें जनवादी की दृष्टि पाते हैं। जिसमें कोई सीमा का बंधन नहीं है। जो असीम है, जिसमे न क्षेत्र भिन्नता है। जो जन की बात नहीं बल्कि 'वैश्वीक जन' की बात करते हैं।

आज 21 वीं शती में भी हम दुनिया को धर्मवाद, जातिवाद, वर्णवाद, उच्च-निचता के बंधन में जखडे हुए पाते हैं। जो आज भी इन बंधनों से मुक्त नहीं हो रहे हैं तथा नित दिन एक-दूसरे को मारने को उतावले बने हैं। ऐसी कई वारदाते नित टि.व्ही. चैनलों, वर्तमानपत्रों की सनसनी खबरें बनी हुई है। जो दिल को दहला देती है। जिसके पीछे जाति भिन्नता, धर्म भिन्नता जैसे कई कारण है। इन सभी संकुचित विचारों की कड़ी आलोचना संतों ने की है। इसके संन्दर्भ में संत तुकाराम कहते हैं कि, मनुष्य के शरीर की रचना एक जैसी है। जैसा निम्न जाति के लोगों का शरीर उसी तरह ब्राम्हण का भी है तो दोनों का खुन भी एक जैसा है फिर कैसे यह भिन्नता।
जैसे- "तुम्ही करु नका गर्व।। उंची याती मिळुनी सर्व।।1।।
        शुक्रशोणीताच्याखाणी।। तुम्हा आम्हा एकच योनी।।2।।
रक्त मांस चर्महाडे।। सर्वाठायी समपाडे।।3।।
तुका म्हणे हेचि खरे।। नाही देवासी दुसरे।।4।।"1

तो उसी  बात को लेकर संत कबीर कहते हैं कि, जब एक ज्योति से सभी निर्मित है तो फिर कौन ब्राम्हण ? कौन शूद्र ? यह कैसा भेद है ?
"एक जोति थैं सब उतपना, कौन ब्राम्हन कौन सूदा।"2
संत रविदास ने भी राम, रहीम, अल्ला, ईश्वर में कोई भेद न मानते हुए उन्हें एक ही माना है। वे कहते हैं कि- "वेद कतेव पढ़े वे कुतवा, वे मुल्ला वे पाण्डे।
     विविध के नाम धराए, सब इक मिट्टी के भाण्डे।।"3

इस तरह संतों के विचारों में जाति-भेद विरहीन एक मनुष्य को मनुष्य के रुप में स्थापित करनेवाली दृष्टि है। जो आज के युग में समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए आवश्यक है।
संतों के विचारों में जाति-पाति से परे समाज स्थापना की दृष्टि थी। इसीलिए इन्होंने स्त्री को पूज्य स्थान दिया है तथा उसके गौरमयता की तारिफ की है। संत कबीरदास ने "कई साखियों में पतिव्रत्य और प्रतिव्रता नारी की प्रशंसा की है।"4

उसी तरह संत अक्कमहादेवी ने स्त्री-पुरुष में कोई भिन्नता नहीं मानी है। वह स्त्री को स्तन-चोटी से स्त्री कहलाती है, तो पुरुष मूँछ से पुरुष कहलाता है। लेकिन इनमें वास करनेवाला आत्मा एक है। वे कहते हैं - "थन चोटी से स्त्री कहलाएगी,
   मूँछ-दाढ़ी से पुरुष कहलाएगां।
  दोनों में स्थित आत्मा न स्त्री है न पुरुष है हे रामनाथ!"5
  संत तुकाराम ने ईश्वर भक्ति के एकनिष्ठता को सम-ााने के लिए उन्होंने प्रतिव्रता नारी का पति के प्रति एकनिष्ठता का उदाहरण दिया है-"प्रतिव्रता जैसा भ्रतार प्रमाण। अम्हा नारायण तैशा परी।"6

संतों के विचारों में लोकमांगल्य की दृष्टि सर्वपरि है। जिसमें वे सभी बंधनों से परे जाकर समाज के हीत की बात करते हैं। उच्च-निच, दीन-दलित, उपेक्षित जैसा भेद उनके विचारों में नहीं है। इसीलिए संतों के विचार सर्वग्राही है। आज जब दुनिया 'वैश्विक बाजार' का रुप ले रही है। जिसमें बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। ऐसे युग में लोकमंगल के अलावा स्वमंगल के विचार हावी होता दिखाई दे रहा है। ऐसे समय मनुष्य का मनुष्य होने का ऐसास संतों के विचारों से होता है। इसलिए तो संत अक्कमहादेवी ने मनुष्य को ज्ञान की महत्ता को समझाया है क्योंकि इससे मनुष्य जीवन मंगलमय होता है। यथा- "अज्ञानियों  की संगति मानो
  पत्थर रगडकर चिंगारी पाना है।
   -ज्ञानियों की संगति मानो,
   गोरस मथकर माखन पाना है।"7
तो दूसरी ओर संत कबीरदास ने मनुष्य को सामाजिक लोकमंगल के लिए मनुष्य वाणी में मिठास को जरुरी माना है। क्योंकि तभी सद्भाव उत्पन्न हो सकता है और सभी को शांति मिल सकती है-
"ऐसी वानी बोलिए, मन का आपा खोय।
  औरन को शीतल करै आपहु शीतल होय।"8
संत -ज्ञानेश्वर ने तो विश्वधर्म की बात की है। जिससे सभी मनुष्य में सत्कर्म एवं मैत्रीभाव के स्थापन की है जिसमे द्वैष भावना नहीं रहे हैं-
"जे खळांची व्यंकटी सांड़ो। तया सत्कर्मी रती वाढ़ो।
  भूता परस्परे जड़ो। मैत्र जीवांचे।
  दूरितांचे तिमीर जाओ। विश्वस्वधर्म सूर्ये पाहो।
  जो जे वांछिल जो ते लाहो प्राणिजात।।"9
संत रोहिदास यह ऐसे राष्ट्र और राज्य की इच्छा करते हैं। जो सभी लोगों को सुख दे, सभी की आवश्यकता की पूर्ती करे। जिसमे छोटा-बड़ा इस तरह का भेदाभेद न हो। अर्थात संतों के विचारों में समस्त दुनिया के मांगल्य का विचार है। संत रोहिदास के विचार द्रष्टव्य है। यथा-
"ऐसा चाहौं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
  छोटा बड़ो सभ सम बसै, 'रविदास' रहै प्रसन्न।"10

जिस तरह मनुष्य के चिरन्तन सुख की कामना संतों ने की है, उसी तरह वे सृष्टि के सभी प्राणीमात्र के प्रति सद्भाव दर्शाते हैं। पशु, पक्षी, वृक्ष आदि के प्रति भी उनके मन में सद्वृति है। वे उसके संवर्धन की सलाह इन्सान को देते हैं। वक्षों की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कबीर कहते हैं कि "तरवर तास बिलंबिए, बारह मास फलंत।
 सीतल छाया गहरा फल, पंबी केलिकंरत।।"11

अर्थात वृक्षों की छाया शीतल होती है जो सभी को सुख देती। उसी के साथ कुछ वृक्ष साल भर फलों से लदे होते हैं। जो मीठे फल देते हैं। इतना ही नहीं पक्षी उसपर अपना घर बनाकर उसके सानिध्य में अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

आज का मनुष्य यह सत्ता, संपत्ति एवं अहंकार के कारण दुनिया को अस्थिरता की ओर लेकर जा रहा है। जिसकी परिणिती विनाश के अलावा और क्या हो सकती है? हम तमाम दुनिया में भय का साम्राज्य देखते जिसके पीछे मनुष्य की स्वार्थ भरी दृष्टि है। इसी बात को समाप्त कर एक सद्भावना से भरा मार्ग दिखाने का कार्य संतजनों ने किया है। संतो ने मनुष्य को यह समझाने का प्रयास किया है कि हे मानव तू जिस वस्तु को मेरी-मेरी कहकर भागदौड कर रहा है। वह तेरी नहीं हो सकती क्योंकि तू भी नाशवंत है। तेरा देह ही तेरा नहीं है तो यह सभी भौतिक वस्तुओं पर अधिकार जमाना चाहता है, वह तेरी कैसे हो सकती है ? संत तुकाराम कहते हैं-
"देह हे देवाचे धन कुबेराचे। तेथे मनुष्याचे काय आहे।।
  देता देवविता, नेता नेवाविता। येथे याची सत्ताकाय आहे।।
निमित्याचा धनी केला असे प्राणी। माझे-माझे म्हणोनि व्यर्थ गेला।।"12

संतो ने मनुष्य को नम्रता, परोपकार, दानवृति आदि मूंल्यों को महत्व दिया है। वे कपट, अहंकार को मनुष्य का दुर्गुण समझते हैं। संत दादूदयाल कहते हैं-
"आपस को मारै नहीं, पर मारन जाय।
  दादू आपा मारे बिना, कैसे मिले खुदाय।।"13

अर्थात हे मनुष्य तुझे ईश्वर की प्राप्ति करनी है तो मैं को भूल जा। इस तरह अहंकार का संन्तो ने खण्डन किया है। संत साहित्य की सबसे बड़ी बात मैं की जगह हम अर्थात जिसमें एक व्यक्ति के हीत नहीं बल्कि समहीत समाया हुआ है। वे समस्त प्राणी मात्र की बात करते है। वे ईश्वर से इतनी जिज्ञासा रखते हैं जितनी व्यक्ति की आवश्यकता है। संत कबीरदास कहते हैं-
"साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।।"14

संतों के साहित्य के महती के संदर्भ में नासिराबादकर कहते हैं कि-"21 वीं शती में भौतिक प्रगति हुई है किन्तु मनुष्य सुखी नहीं है। युध्द नहीं किन्तु शान्ति भी नहीं है। ऐसे वातावरण में वह जीवन जी रहा है। जो विभिन्न समस्याओं से घिरा हुआ है। सभी ओर भीड़ है किन्तु फिर भी अकेला महसूस करता है।...आज भी संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम के विचार पढ़ ले तो शांति मिल सकती है।"15 उसी बात को लेकर डॉ.सुनिल कुलकर्णी कहते हैं कि "शताब्दियों से संत साहित्य मानव का मार्गदर्शन करता आ रहा है। सदियों से लेकर आजतक उसकी प्रासंगिता  तनिक भी ढ़ली नहीं है। आज के मूल्यहीनता के युग में तो वह ओर अधिक प्रासंगिक लग रहा है।"16 इस तरह संत साहित्य यह समाज उपयोगी तथा समाज को राह दिखानेवाला है। जिसमे मानवता के सभी तत्व समाय हुए है। जो परोपकार, विश्व शांति, मानवी मूल्य, नारी सन्मान, जाति-धर्म विरहीत विश्वसंघटन की बात करता है। जिसमे सद्भावना कूट-कूट कर भरी है। पशु, पक्षी आदि समस्त जीवों के लिए उसमे करुणा है। इसलिए हम पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि संतों के विचार जनवादी है तथा चिरकाल तक प्रासंगिक है!

संदर्भ :-
1.श्री.तुकाराम महाराज-सं.डॉ.अशोक चोपडे पृ.47
2.कबीर ग्रंथावली-सं.रामकिशोर शर्मा पृ.73
3.संत रोहिदास चरित्र आणि वाड्मय-द.मित्र,मा.कारंडे पृ.24
4.कबीर और तुकाराम के काव्य प्रगतिशील चेतना-डॉ.सुनिल कुलकर्णी पृ.153
5.अक्कमहादेवी और स्त्री-विमर्श-डॉ.काशीनाथ अंबलगे पृ.39
6.सर्वात्मभावी तुकाराम-डॉ.अनिल गवली पृ.237
7.अक्कमहादेवी और स्त्री विमर्श-डॉ.काशीनाथ अंबलगे पृ.78
8. कबीर और तुकाराम के काव्य प्रगतिशील चेतना-डॉ.सुनिल कुलकर्णी पृ.175
9.संत -ाानेश्वर आणि संत मीराबाई यांची मधुराभक्ती-डॉ.दीपा क्षीरसागर पृ.40
10. संत रोहिदास चरित्र आणि वाड्मय-द.मित्र,मा.कारंडे पृ.219
11. कबीर और तुकाराम के काव्य प्रगतिशील चेतना-डॉ.सुनिल कुलकर्णी पृ.162
12.संत तुकारामांचा जीवन विचार-निर्मलकुमार फडकुले पृ.89
13.संत साहित्य की आधुनिक अवधारणाएँ-डॉ.सुनिल कुलकर्णी पृ.44
14.वही पृ.44
15.संत कवयित्री जनाबाई काव्यदर्शन-डॉ.रेखा जगदाळे पृ.9
16.संत साहित्य की आधुनिक अवधारणाएँ-डॉ.सुनिल कुलकर्णी पृ.9


                                                                                                  हिंदी विभाग,
                                                                                    डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा
                                                                                      विश्वविद्यालय, औरंगाबाद (महा.)
                                                                                             मो.08554006708


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