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प्रदीप कुमार साह की कहानी - आदर्श और मजबूरी

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  आदर्श और मजबूरी (कहानी)प्रदीप कुमार साह ______________________________ मेरे अजीज मित्र एक नौकरीपेशा व्यक्ति थे और वर्तमान में उसकी पोस्ट...

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आदर्श और मजबूरी (कहानी)प्रदीप कुमार साह

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मेरे अजीज मित्र एक नौकरीपेशा व्यक्ति थे और वर्तमान में उसकी पोस्टिंग मेरे गाँव से करीब ढ़ाई सौ किलोमीटर दूर शहर में थी. उसने मुझे किसी ख़ुशी के मौके पर आमन्त्रित किये. मैं उससे मिलने उसके शहर गया और अब वापस अपने गाँव लौट रहा था. उस शहर तक आने-जाने के लिये कोई सीधा रास्ता नहीं था बल्कि करीब आधा रास्ता सड़क मार्ग से और शेष रेल मार्ग से सफर का था. मैं ट्रेन से नियत स्टेशन पर अपने सामान के साथ उतरा, सामान के नाम पर तो मेरे पास पीठ से लटकाने वाला एक बैग मात्र ही था जिसमें जरूरत भर सामान भरे थे. बैग ज्यादा भारी नहीं था और आगे सड़क मार्ग के सफर थे. बस पड़ाव ज्यादा दूर नहीं था इसलिये बिना किसी इंतजार के बस पड़ाव के तरफ चल दिया.

मैं बस पड़ाव पहुँचकर अपने गाँव से होकर गुजरने वाले बस के समय वगैरह जानकारी पता करने लगा. उक्त बस का समय तब से करीब एक घण्टे बाद थी अर्थात मुझे यहाँ रुककर करीब घन्टे भर बस का इंतजार करने थे. समय शाम के करीब पाँच-साढ़े पाँच हो रहे थे. दिसम्बर के महीना में सर्द मौसम होता है और शाम भी जल्दी हो जाते हैं. मैं बस पड़ाव में एक चाय दुकानदार के पास रुककर चाय पीने लगा. वहाँ रुके हुए कई एक यात्री सर्द मौसम में गरमागरम चाय का आनन्द ले रहे थे. तभी दुकानदार बारह-चौदह बरस के एक लड़के को देखकर बेहद मर्माहत हो गया और हमलोगों से उसे देखने हेतु इशारा करते हुये उसकी आपबीती बताने लगा. लोग चाय के स्वाद का चटखारे लेते हुए उस लड़के को आश्चर्य से देखने लगे और उसके किस्से सुनते हुए विस्मय तथा हमदर्दी में आहें भरते रहे.

वह कोई मामूली सा सरकारी स्कूल का छात्र था जो स्कूली लिबास में था और उसके पीठ पर किताबों का बैग टँगा था. किन्तु सामने उसके गले से एक सफेद तख्ती भी लटक रहा था जिसमें लाल रंग में हिदायत अंकित था कि यह पागल है, इसके बातों का ध्यान मत दो. शायद लड़के को देख कर उस बस पड़ाव के लगभग सभी दुकानदार जो संभवत: उसी इलाके के लोग थे इस दुकानदार के भाँति ही मर्माहत थे. वहाँ मौजूद राज्य सरकार के पुलिस महकमें के टोही दस्ते का एक सिपाही भी उन्हीं दुकानदारों के तरह नजर झुकाये था. किंतु आँख के कोने से देखकर शायद उसके सम्भावित गतिविधि समझने की कोशिश कर रहा था. वह लड़का जिधर से गुजरता उधर मौजूद बस पड़ाव के तथाकथित संचालन कर्मी दबे पाँव खिसक लेते.यहाँ तक की सदैव कृतघ्न समझे जाने वाले वहाँ मौजूद छोटे-बड़े वाहन चालक भी नतमस्तक हो जाते.

चायवाले ने उस बालक की जो आपबीती बताई वह इस प्रकार थी कि एक दिन बस पड़ाव संचालन कर्मी किसी छोटी-मोटी बात पर किसी छोटे वाहन चालन कर्मियों की बुरी तरह पिटाई कर रहे थे. उसकी पिटाई चुपचाप देखने वाले बहुतेरे लोग थे. किंतु किसी में प्रतिरोध अथवा बीच-बचाव करने का साहस नहीं था. तभी स्कूल से पढ़ाई कर वापस घर जाते यह कोमलांग बालक भारी भीड़ देखकर यहाँ आ गया और बीच-बचाव करने लगा.इस जमाने में जबकि सत्य और अहिंसा नामक शब्द एक मिथक समझे जाते हैं तथा वह धारणा बहुलता से प्रचारित है कि हारे के हरि नाम या मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी इत्यादि-इत्यादि......वह कोमलांग बालक अहिंसात्मक प्रयोग कर रहे थे.वह प्रयोग जिसे बड़े-बड़े तजुर्बेदार नहीं साध सकते, वह मासूम बालक आजमा रहा था.

जवाब में पड़ाव संचालन कर्मी धक्कम-मुक्की जैसे अंग्रेजी तानाशाही पर आमादा हो गए.किंतु उस कोमलांग बालक के अति सशक्त मनोबल न टूटे और उसने अपना सत्याग्रह जारी रखे. इससे उन आततायियों के रिश उत्तरोत्तर बढ़ते गये और उन्होंने अंग्रेजों के तर्ज पर दमन करने का रास्ता अख्तियार कर लिये. पहले से पिट रहे वाहन चालन कर्मी बालक की भावी दुर्गति समझ पड़ाव संचालन कर्मी से उसे नादान समझकर दया कर छोड़ देने की दुहाई देने लगा जिससे दर्शक-दीर्घा भी सहमत थे. किंतु उन आततायियों को उस छोटे से बालक के हाथों पराजय बिल्कुल भी हजम नहीं हो रहा था. उन्होंने बदस्तूर उनकी पिटाई जारी रखा.महज संयोग से उस रास्ते से पुलिस पेट्रोलिंग दस्ता गुजर रहा था.जिसे किसी ने अपनी पहचान छुपाते हुए गुप्त सूचना दी. गुप्त सूचना पर पुलिस मौके वारदात पर पहुँचकर घायल लोगों को अपने सुरक्षा में लेकर इलाज हेतु अस्पताल पहुँचा दिया.

हमारे संसार का एक शाश्वत सत्य यह है कि किसी सज्जन के मन में लोभ, ईर्ष्या,क्रोध और घृणा कभी हो नहीं सकते.वे किसी दुर्जन के प्रति भी यथासाध्य उपरोक्त भाव नहीं रखते. बल्कि उन्हें सत्य से अनभिज्ञ और कर्म के अनुरूप ईश्वर कृपा से वंचित समझकर उसके प्रति मन में दया भाव रखते हैं. क्योंकि उनके मन में प्रेम और दया के अतिरिक्त कुछ होते ही नहीं. ऐसे सज्जन से फिर किसी के अस्तित्व को भला क्या खतरा? किंतु संसार का यथार्थ है कि दुर्जन सदैव अपने मनोभाव अनुरूप उसे अपने अस्तित्व पर सबसे बड़े खतरे के रूप में लेते हैं.क्योंकि आशंकित रहना उनका स्वभाव है.उन्हें सज्जन से सदैव भय मालूम होता है.क्योंकि उन्हें पता है कि स्वनुशासन कितना कठिन हैं.स्वनुशासन हेतु कितने साहस और पराक्रम की आवश्यकता होती है. फिर ऐसे लोग इरादे के कितने पक्के और सदैव सजग तथा अन्याय अथवा अनुचित कर्म के धुर विरोधी होते हैं.अत:बहुत कुछ करने में समर्थ होते हैं. ये कुछ काम ठान ले तो इनके रोक पाना असंभव है.

पन्द्रह दिन में जब वह बालक इलाज से स्वस्थ हो गया तो अस्पताल प्रबंधन उसे मुक्त कर दिये. किंतु उस आक्रांत वाहन चालन कर्मियों को पुलिस उठा ले गयी.अस्पताल से बाहर आकर उस लड़के को किसी तरह पता चला कि गंभीर मामले के दबंग आरोपी, उनके तगड़े गैंग और क़ानूनी धाराओं की लचकताओं के फायदे उठाने में माहिर इन कुख्यात लोगों की प्रतिशोध की भावना के भय से तथा गवाह के अभाव की मजबूरी से कुछ पुलिस कर्मी इतने डरे-सहमे थे कि उनके द्वारा रिपोर्ट में बालक के जख्मी होने का कारण उन आक्रांत वाहन चालन कर्मियों द्वारा लापरवाही से गाड़ी चलाना बताया गया. फिर आगे सफाई में बताया गया की वाहन चालन कर्मियों की पिटाई दुर्घटना होने पर जन-आक्रोश के वजह से अज्ञात हमलावरों के हाथ हुई.

अस्पताल से छूटकर उसने यह भी देखे की वहाँ बस पड़ाव के किसी व्यवस्था में किंचित मात्र भी बदलाव न आया था. वह दुबारा अकेले ही सत्याग्रह छेड़ दिया.पहले की भाँति इसबार भी दमन करने की चेष्टा हुई. लड़के की पिटाई हो रही थी कि संयोग से वहाँ मौजूद एक कांस्टेबल से रहा नहीं गया और उसने साहस कर अकेले ही बीच-बचाव के प्रयत्न किये. उन बहुतेरे दबंगों के सामने एक मामूली कांस्टेबल की क्या औकात-जिसे क़ानूनी विधियों की पूरी जानकारी तक नहीं होती. किंतु आज लोगों की जमीर शायद अंगड़ाई ले लाये.भीड़ द्वारा बस पड़ाव संचालन के प्रबंधक और उनके गुर्गों की जमकर पिटाई होने लगी. वे सब अपनी-अपनी जान बचाकर मुख्य संचालक के पास भागकर गये.पीछे एकमत से वहाँ के सभी वाहन चालक बस पड़ाव संचालक के विरोध में खड़े हो गये.

संसार में बहुत से अच्छे अथवा किसी बुरे काम का होना बिना धन के संभव नहीं होता. इसलिये जनमानस और वाहन चालकों के विरोध के खबर पाते ही दबंग संचालक के होश फाख्ता हो गये. धन आगमन के श्रोत बंद होने के आशंका मात्र से संचालक विचलित हो गया.बुद्धिमानों के विचार हैं की यदि शत्रु असाद्ध्य हैं तो उससे जतन कर परहेज कर लेने में ही भलाई है और तत्समय उसने भी दबंगई छोड़ लोगों की बात मान लेना ही उचित समझा. उनसे डरने वाले पुलिसकर्मियों को इस बात की भनक लगी तो मौके का फायदा उठाते हुए अपनी कर्तव्य निष्ठा निभाने की कोशिश करते हुये निर्दोष और पड़ाव संचालक से आक्रांत वाहन चालन कर्मियों के मामले को गुप्त तरीके से रफा-दफा कर उन्हें मुक्त कर दिये. किंतु वह दबंगों से भयमुक्त होने की आंशिक सफलता अथवा निशानी न थी और अब भी उनके समक्ष शायद वही मजबूरियाँ थी.तभी वे लोग निष्पक्ष जाँच करने का साहस नहीं कर पाये.

संचालक द्वारा लोगों की बातें मान लिये गये थे जिसका त्वरित असर भी दिखने लगा.लोग उतने सफलता से ही संतुष्ट हो गये, क्योकि अधिक की आशा करना खतरनाक हो सकता था. फिर सभी के कुछ न कुछ अपनी मजबूरी होती है. किंतु उधर बस पड़ाव के मुख्य संचालक इस छोटे से बालक के अतुल्य साहस देखकर चकित और भयभीत थे. उसे अपने दबंगई और भय के बलबूते स्थापित अपने साम्राज्य के अस्तित्व पर संकट महसूस हो रहा था. वर्तमान परिस्थिति में वह अपने हिसाब से 'कुछ भी ऐसा-वैसा'नहीं कर सकता था.किंतु उसके पास अब भी एक अचूक उपाय थे जिसके समक्ष अच्छे-अच्छे महारथी घुटने टेक देते हैं. वह इस बालक अथवा उसके अभिभावक के मन में लोभ जागृत तो कर ही सकता था. ऐसा करने से उसका भावी खतरा तो टल ही जाता साथ ही बिन ढूंढे उसमें एक भावी नमकहलाल दुर्जेय गुर्गे का पृष्टभूमि भी तैयार किया जा सकता था.

उसने एक रणनीति अपनाया. उसने बालक के पिता को बुलवाकर बहुत से धन तोहफे में दिया और बालक की शिक्षा आधुनिक तरीके से करवाने हेतु किसी अच्छे प्राइवेट स्कुल में दाखिला कराने कहा. उसने बालक के आगे की पढ़ाई का खर्च वहन करने के आश्वाशन भी दिये. साथ में उससे यह भी कहा गया कि वह बालक को नियंत्रण में रखे अन्यथा भविष्य में उसे सपरिवार गंभीर अंजाम भुगतने होंगे.बालक के पिता के समक्ष कुँए और खाई में किसी एक को स्वेच्छा से चुनने की परिस्थिति उत्पन्न हो गयी. सामने अजेय शत्रु था, जिसका वह चाहकर भी कुछ कर नहीं सकता था. फिर बालक के शरीर और मन पर जो स्थाई जख्म हुए किसी तरह उसकी भरपाई तो हो नहीं सकती थी. इसलिये उसने बच्चे पर हुए अत्याचार को स्मृति में दबाकर तोहफा कबूलने में ही अपनी भलाई समझी.

बालक को उस बात के खबर हुए तो उसने स्वयं संचालक से मिलकर अपने वैचारिक विनिश्चय से अवगत कराने का निश्चय किया. उसने संचालक के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया कि मनुष्य को मिहनत और ईमानदारी की कमाई ही सर्वप्रथम करनी चाहिये. अनुचित लाभ लेने की प्रवृति अंततः दुष्कर होती है, इसलिये उसका सदैव त्याग करना चाहिये. वे बातें संचालक के मंसूबे पर कुठारा घात थी. उसे ना शब्द सुनने की आदत नहीं थी, उसे बालक पर अत्यंत क्रोध आया. किंतु बालक के अद्भुत साहस देखकर वह मन ही मन उसे अपना भावी गुर्गा बनाने का दृढ़ निश्चय कर लिये. वह समझदार और अत्यंत कुटिल भी था. उसे अपने मतलब साधने हेतु कोई भी जुगत करने में कोई गुरेज न था.

उसने गुर्गों को बुलवाकर आदेश किया कि वह (बालक) जबभी पड़ाव में अपने कदम रखें उसके गले में एक तख्ती लटका दिया जाये जिसमें लिखे हों कि वह पागल है, उसके किसी बात पर ध्यान मत दें. ऐसा करने में कभी चूक न हो इसलिए एक अतिरिक्त तख्ती हमेशा तैयार रखो. तुमलोग अच्छी तरह समझ लो की इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाये कि यह जबतक पड़ाव में रहे इसके गले में तख्ती पड़ा रहे.गुरगों ने स्वीकारोक्ति में अपने सिर हिलाकर सब कुछ समझ जाने के संकेत किये. इसके पश्चात संचालक गर्व से ठहाका लगाते हुये बोला,"आदमी जब मानसिक स्तर से टूटता है तो उसके सारे हेकड़ी स्वतः ही टूट जाते हैं. एक दिन यह भी हमारे कदमों में पड़ा गिड़गिड़ा रहा होगा."

उसके बात पर बालक मुस्कुरा कर बोला,"यह तो ईश्वर ही जाने कि आपकी मनोकामना कभी पूरी होगी या नहीं. किन्तु मैं आपको इस बात के लिये अवश्य आस्वस्त करता हूँ कि आपको रोज नये तख्ती के इंतजाम करने की जहमत उठाने नहीं होंगे. क्योंकि मैं जितने समय पड़ाव में रुकूँगा स्वयं ही वह तख्ती अपने गले में धारण रखूंगा."

उसकी बातें सुनकर संचालक जलभुन गया. उसके नेत्र आग बरसाने हेतु आतुर हो गया. वह क्रोध से हथेली आपस में रगड़ने लगा. उसके एक इशारे मात्र से गुरगे बालक को लेकर बाहर आ गए. थोड़ा दूर सभी बिल्कुल ख़ामोशी से चले. गुरगे इस बालक के अद्भुत साहस के कायल हो रहे थे.वे बालक के जवाब का मन में स्मरण कर दबंग संचालक के हाथों बारंबार प्रताड़ित और अपमानित होने से अपने मन में उपजे खुन्नस में शांति महसूस कर रहे थे. आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ते हुए उन्होंने बालक से पूछ ही लिये,"क्या तुम्हें उनसे डर नहीं लगे?'

'क्या आपलोगों को उनसे डर लगता है?' बालक ने प्रतिप्रश्न किया. किंतु उनलोगों ने कोई जवाब न दीये. हाँ,उनके सिर प्रतिप्रश्न सुनकर झुक जरूर गये.जिसका तातपर्य था कि उन्हें संचालक से डर लगता है. बालक बोला,"आपको उनसे और बहुत चीजों से डर अवश्य होता है क्योंकि आपके कोई सच्चे आदर्श नहीं हैं जिसपर आपका संपूर्ण विश्वास टिके हो. आपके यदि कोई आदर्श हैं भी तो वह स्वयं ही कमजोर, प्रतिकूल परिस्थितियों में बदल जाने की प्रवृतिवाले और क्षणभंगुर हैं,फिर आपके विश्वास दृढ़ कैसे हों.किंतु मुझे बिल्कुल भी किसी चीज के डर न हुआ."

"वह आदर्श क्या है?"

" मेरे एक सबल आदर्श है और मेरा उसपर संपूर्ण विश्वास है. क्योंकि संपूर्ण जगत में एकमात्र,पक्का और सच्चे आदर्श वही हो सकते हैं और वह है-सत्य. सत्य अर्थात मन,वचन और कर्म में प्रेम, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और अहिंसा इत्यादि सद्गुणों और सतकर्मों के खान. सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर हैं. फिर जिसके आदर्श ही शिव हो उसे भय कैसा? जाके राखे साइयां मार सके न कोई."

कुछ दूरी ख़ामोशी से चलकर बालक पूछा,"क्या आप भी इस आदर्श के लाभ चाहेंगे? उस दलदल से निकल कर भयमुक्त होकर ईमानदारी की रोटी खाना चाहेंगे?"

उस बात पर वे गुर्गे बालक से नजर चुराने लगे. बालक के दुबारा पूछने पर उसे निष्कपट और अपना शुभाकांक्षी समझकर उनके दर्द उनकी जुबाँ पर आ गयी,"इस दलदल में एकबार आकर बाहर निकलने हेतु जितनी चेष्टा करोगे वह उतना ही अंदर खिंचेगा और प्राणभय और तबाही ला देगा."

बालक बोला,"ईश्वर पर विश्वास करो और अंगुलिमाल डाकू के तरह उनके शरण में आकर भय त्याग कर तड़ (मुक्त) जाओ."

उस बालक की आपबीती बताते हुए दुकानदार के आँखों में आंसू आ गये थे जिसे उसने अंगुली से पोछा और उन बस पड़ाव संचालन कर्मियों के तरफ इशारा कर पुनः कहने लगा,"साहब देखो, तब तो इन्होंने दबे जबान में ही सही सुधरने की कोशिश करने की बात स्वीकार कर ली. अब हरेक दिन वह बच्चा उन्हें अच्छे काम हेतु प्रोत्साहित करने उसके पीछे भागते हैं और वे बालक के नजर में आने से.उसे विश्वास है की एक दिन वे सब सही रास्ते पर आ जायेंगे.

मैंने जिज्ञासावश दुकानदार से पूछा,"किंतु आपलोग उस बच्चे के सत्याग्रह में साथ लंबे समय तक क्यों नहीं देते? यहाँ दुकान लगाना छोड़ कर?"

"साहब अपनी मजबूरी है कि अपना और अपने परिवार के पापी पेट को कैसे भरूँ? उन्हें सुधरने में कितने समय लगेंगे और यह शरीर कब तक बिना दाने के टिकेंगे? फिर हमारे अनुपस्थिति में हमारे स्थान पर कोई और दुकान लगाना शुरू कर दिये तो?"

अपने जगह पर उसका कहना भी तो सही था.मैंने बालक की आपबीती सुनने वाले सज्जनों से जानना चाहा की हम लोग उसकी मदद किस तरह कर सकते हैं? इस पर सबकी राय यह आई की जब स्थानीय लोग कुछ नहीं कर पाते तो हम मुसाफिर इसमें भला क्या मदद कर सकते? वास्तव में उनके कहना भी तो सही हैं कि वे भी मजबूर हैं,बिना स्थानीय लोगों के सहयोग के कोई क्या कर सकते? मुसाफिर तो मजबूर ही होते हैं, इसलिये उस महान बालक के सामने से दर्शन मात्र कर धन्य क्यों न हो लिये जाये. मन में ऐसे शुभ विचार आते ही शरीर पुलकित हो गए और मैं उतावला हो गया.

वैसा सोचकर उस बालक के सामने गया. वह दिखने में बिलकुल सामान्य बालक थे. किंतु उसके बड़े-बड़े कार्य का स्मरण कर उससे पूछा,"आपके बारे में बहुत कुछ सुने हैं.वह सब किस तरह संभव हुआ?"

"मैं तो कुछ किया ही नहीं, जो ईश्वर की मर्जी है वही हुआ." उसने मुस्कुरा कर जवाब दिये.

"आपके ईश्वर-विश्वास के सम्बंध में सुने हैं,और महसूस भी हो रहा है. क्या आपके ईश्वर के दर्शन हुए ?"मैं आश्चर्य से पूछा.

"ईश्वर की प्रतिमाऐं बनाकर लोग जिस रूप में पूजते हैं,उस रूप में तो कदापि नहीं. किंतु ईश्वर कहाँ नहीं हैं."

"यदि ईश्वर के निर्दिष्ट रूप में दर्शन नहीं हुए, यदि उनकी मदद भी निर्दिष्ट समय पर न हुये तो उस विश्वास के क्या होंगे?"

" यदि मुझे यह विश्वास भी हो जाये की वह नहीं हैं तब भी मैं उसे (सत्य)अपना आदर्श मानूं. फिर मेरे साथ मेरे आदर्श तो होंगे? क्योंकि आदर्शहीन जीवन किसी काम के नहीं. वैसे जीवन न तो वांछित सफलता पाते हैं और ना प्रसन्नता देते हैं. फिर बिना आदर्श के एक जीवन हो नहीं सकता. तब जीवन में एक आदर्श वैसा ही क्यों न हो जो सदैव प्रेम, प्रसन्नता, असीमित धैर्य और साहस दे. और वह चीज केवल सत्य से मिल सकते हैं."

"आपके विचार अतिउत्तम हैं, किंतु मुझे क्षमा करें कि मैं आपके विचार से सहमत होकर भी कुछ कर नहीं पाऊँगा क्योंकि मैं एक मुसाफिर हुँ."

"कोई बात नहीं,संसार में सभी मुसाफिर हैं." उसने अर्थपूर्ण मुस्कान बिखेरे किंतु मैंने हाथ जोड़ लिया.हमारा निर्दिष्ट बस आ चूका था इसलिये उससे विदा लेकर बस में सवार हो गया.मैं सीट पर आकर राहत महसूस किया और खिड़की से बाहर की तरफ देखा. उसने मुस्कुराकर हमें बाय-बाय कहा फिर मेरे नजर से ओझल हो गया. बस प्रस्थान का समय हुआ और बस चल पड़ा. मैं सीट से चिपक कर आँखे बंदकर लिये और सिर को भी सीट के सहारे ढीला छोड़ दिये.

मैं विचार गंगा में डूबने उतराने लगा. मेरे नजर में जितने भी लोग आये सभी की अपनी मजबूरियाँ थी. किंतु वह लड़का पहला और संभवत: आखिरी मनुष्य थे जिसे शायद कोई मजबूरी न थी.अथवा जो स्वयं इतना सशक्त था कि उसने घर बाहर की मजबूरियों पर विजय पा लिये थे. क्या सचमुच उसे मजबूरियाँ परीशान नहीं करते.क्या उन वजह से उसे अपने माता-पिता और सम्बंधियों के विरोध झेलने नहीं होते, क्या उसे स्कूल और अपनी पढ़ाई की चिंता न थी? क्या उसने अपना भविष्य संवार और सुरक्षित कर लिये थे अथवा मृत्यु पर विजय पा लिये.

वास्तव में वैसा कुछ नहीं था. प्राणिमात्र का यह स्वभाव है की वह सुख चाहते हैं और खतरे से यथासम्भव बचना भी चाहते हैं. किंतु संसार में बिना जोखिम उठाये कोई काम नहीं होते.यह सभी जानते हैं, फिर उनकी यह कोशिश होती है कि कम खतरा उठाकर अधिक प्रतिफल प्राप्त किये जाय. अथवा कम प्रतिफल देनेवाले जोखिम बाद में उठाया जाये.वह टालने की प्रवृत्ति एक सीमा में उचित है.किंतु कुछ जोखिम वैसे भी होते जिसे उठाना अनिवार्य होते हैं किंतु वह भविष्य में प्रतिफल देतें हैं.उसके प्रतिफल बहुआयामी और सदैव शुभता देने वाले होते हैं. चूँकि वह भविष्य में प्रतिफल देने वाले होते हैं इसलिए उसे बारम्बार टालने की कोशिश होती है. फिर टालने की उस कोशिश को मजबूरी का नाम देकर स्वयं (मन को)और दूसरे को समझाने के प्रयत्न किये जाते हैं.वास्तव में वह बारम्बार टालने की प्रवृत्ति ही वास्तविक मजबूरी है.एक कहावत है कि यदि एक झूठ सौ बार दुहराये जाये तो वह सत्य सा प्रतीत होता है. इसी तरह बारम्बार मजबूरी शब्द दुहराते रहने से उत्तरोत्तर मन और हमारा कार्य क्षमता प्रभावित होता है और हमारा आत्म शक्ति भी दुर्बल हो जाते हैं.

तभी बस कंडक्टर टिकट जांचने के लिये टिकट दिखाने बोल कर मेरे ध्यान भंग किये. मैंने अपना टिकट दिखाया. कंडक्टर हँसमुख स्वभाव और खुशमिजाज थे. उसी बात के फायदा उठाते हुए मैंने उस बालक के बारे में अधिक जानने के लिहाज से उससे उक्त बालक के सम्बंध में पूछा. उस बालक को वह अच्छी तरह जनता था और मैंने मानो उसके दुःखते रग पर हाथ डाल दिये थे. वह बेचैन होते हुए बोला,"साहब, हम जैसे खोटे किस्मत के लोगों से कुछ मत पूछो.कोई हमारे भले के लिये आवाज बुलंद करता है और हमारी बस मजबूरियाँ ही मजबूरियाँ हैं, हर जुल्म देखने,सहने और चुप रह जाने की. कभी-कभी जी करता है की ऐसा जीवन जीना ही किस काम के?"

इतना कहते कहते उसके चेहरे का भाव बदल गया, आँखों में बेबसी झलकने लगी.धत यह भी कोई प्रश्न था? जिससे कुछ समय के लिए ही सही एक खुशमिजाज और भला व्यक्तित्व न जाने कहाँ गुम हो गये.कंडक्टर कुछ समय के लिये खामोश होकर खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था तो मैंने भी उसकी स्थिति देखकर और अधिक पूछना उचित न समझा.फिर वह अपने काम में लग गया और मैं पुनः अपने विचार में.

उसने सच ही तो कहे, इनके वर्ग की मजबूरियाँ तो काफी हैं, जब स्थानीय जनमानस, दुकानदार, पुलिस और मुसाफिरों की अपनी-अपनी मजबूरी हैं तो इनलोगों का क्या? मैं कल्पना करने लगा कि यदि सामने एक पत्रकार अथवा प्रेस या मीडिया रिपोर्टर होता तो इस मामले में उसके क्या राय होती? यही न कि जब जनसामान्य,पुलिस-प्रशासन,नेता-मंत्रालय सभी वर्गों की मजबूरियाँ हैं तो हमारा वर्ग समाज से बहुत अलग-नैसर्गिक थोड़े न है.फिर किसी अकेले पत्रकार का हैसियत ही क्या.अकेले चना भाड़ नहीं फोड़ते.फिर कहाँ वे समृद्ध लोग और कहाँ वह हजार- पन्द्रह सौ रुपये महीने कमाने वाले पत्रकार.फिर उसके पीछे खड़े रहने वाले प्रकाशक वर्ग और मिडिया समूह के अपने व्यवसायिक समस्या हैं. आजकल तो सी.सी.टीवी कैमरे के बदौलत खिलाता होकर खबर भी आने लगे हैं कि ऐसे वर्ग में भी कुछ ईमान बेचने और ब्लैकमेल करने पर उतारु हो गए हैं. फिर कौन सा रिपोर्टर किस तरह निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने की जहमत उठाए? रही बात साहित्यकारों की, सो गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, विद्यापति,रहीम और कबीरदास से बढ़कर कौन हुये? इनके प्रयत्न के सेनापति अपने लिपिकीय योद्धा के साथ तो पुस्तक के बैरक रूपी कन्दराओं में ही फंसे रह जाते हैं.

इतना कुछ विचारने के बाद मुझे महसूस हुये कि जितने भी मत्वपूर्ण वर्ग और हस्तियॉं हैं सबके सब मजबूर हैं. साथ में सबका संरक्षण करने वाले जनसाधारण भी मजबूरी से पीड़ित हो गये हैं.मैंने निश्चय किया कि मैं भी कोई विशिष्ठ व्यक्ति नहीं बल्कि इन्ही जनसामान्य में एक हूँ. इसलिये, बेशक मेरे कोई आदर्श न हों लेकिन मेरी भी कोई तो मजबूरी होंगी? नही भी हुये तो इस मजबूरी नामक झूठे शब्द को रोजाना सौ बार बोलूंगा और अपने इस नादान हृदय को समझाऊँगा कि तुम तो मजबूर हो, तुमसे कुछ नहीं हो सकता. ऐ मन,तू धीरज धर! पृथ्वी पर जब-जब पाप बढ़ता है, धर्म की हानि होती है तब तब पापियों के उद्धार करने स्वयं ही प्रभु आते हैं. इसलिये मौन रहकर इतने पाप वृद्घि तो होने दे.

इस तरह मैं बाकी के पूरे सफर में अपने मन को समझता रहा. रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे और बस मेरे गाँव पहुँच गया. मैंने बस रुकवाये और अपना सामान लेकर उतर गया.उतरते ही एकबार फिर से मेरे ख्याल में वह बालक आने लगा. मन को उससे जितना मोड़ना चाहता वह हठ पूर्वक उतना ही उधर जाता. मन बिलकुल विचलित होने लगा और पास का समान (बैग)जरूरत से ज्यादा भारी और मजबूरियों की पोटली मालूम होने लगा. उसके वजन मुझसे झेले नहीं गये और उसे एक तरफ रख दीये और वहीं धम्म से जमीन पर बैठ गया.

उसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं.कहते हैं ईश्वर सब ही की इच्छा पूरी करते हैं.जो जिस रूप में चाहते हैं उसे उसी रूप में उनके दर्शन होते हैं. उनसे चाहो तो अपना आदर्श बनने हेतु याचना कर अनुगृहीत होओ, वरदान मांगों या मजबूरी के राग अलापने हेतु नि:वरुद्ध कंठ.यदि मजबूत आदर्श चाहिये तो स्वयं को देखना-जानना अर्थात आत्मनिरीक्षण करने होते हैं.यदि मजबूरियों की इच्छा हो तो दूसरे के जन-धन,शील- स्वभाव और परायी चीज ही अधिकाधिक देखनी चाहिये.तुलसीदास जी भी कहते है कि जिसे जिस चीज से प्रीति होती है उसे वही चाहिए होता है.फिर जैसे विचार होते हैं वैसा कर्म होता है.जैसा कर्म होता है वैसे फल प्रदान करने के लिये ईश्वर बाध्य हैं. और उसी अनुरूप में दर्शन भी, इसलिये शायद मुझे तब से स्मृति दोष हो गये.

(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

विनीत निवेदन

___________

सांसारिक कोई वस्तु, कृति अथवा विचार स्वत: संपूर्ण कदापि नहीं हो सकते. किन्तु उपरोक्त सभी वस्तुओं निमित्त सतत विकास, परिष्कार और कलुषित तथ्यों के परिमार्जन की वृति सदैव अपेक्षित, अनुकरणीय और प्रकृति प्रदत्त वरदान होते हैं. तभी वह सर्व सुखाय,सर्व हितायोपयुक्त बन सकते हैं. इस निमित्त सभी सुविज्ञ पाठकों से उनके बहुमूल्य विचार अपेक्षित एवं सादर आमन्त्रित हैं-प्रदीप.

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रचनाकार: प्रदीप कुमार साह की कहानी - आदर्श और मजबूरी
प्रदीप कुमार साह की कहानी - आदर्श और मजबूरी
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