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दीपक आचार्य का प्रेरक आलेख - मतलब रखें अपने से



- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

हम लोग हमारे बारे में कुछ नहीं सोचते। जो कुछ सोचते हैं वह दूसरे लोगों के बारे में और वह भी उन लोगों के बारे में जिनसे हमारा न कोई रिश्ता होता है, न जिनसे जीवन में कभी कोई काम पड़ सकता है।

बहुत सारे लोग सभी स्थानों पर ऎसे हैं जो हमेशा ऎसे काम करते हैं जैसे कि वे पिछले जन्म में पोस्टमार्टम विशेषज्ञ रहे हों या फिर गंदी नालियों के कीड़ों की तरह छिद्रान्वेषण में एक्सपर्ट रहे हों। ये लोग जीवन भर अपना व्यवहार ऎसा ही रखते हैं जैसे कि औरों का खून पीने के लिए पैदा हुए हैं, ये जिन्दगी भर जोंक की तरह व्यवहार रखते हैं और दूसरों को बेवजह चूसते ही रहते हैं।

इन लोगों के पूरे जीवन का एक ही धर्म है और वह है दूसरों के जीवन में बेवजह झाँकना और परेशान करना। इस मामले में बहुत सारे लोग सभी स्थानों पर विद्यमान हैं जिनका एक ही धर्म है और वह है जमाने भर के बारे में खबर रखना और अपने भीतर के तीखे दाँतों, नाखूनों और सिंगों से औरों को कुरेदना, मिट्टी उछालना और कीचड़ फेंकना।

अपने भीतर की गंदगी और मलीनताओं भरे महासागर से नावाकिफ ऎसे लोग जमाने भर में जहाँ-जहाँ जाते हैं वहाँ-वहाँ अपनी प्रदूषण फैलाते हैं। यही नहीं तो ये लोग अपने दुर्जनी इरादों के लिए सभी सीमाओं से परे रहते हैं और कहीं भी सैटेलाईट की तरह रहकर अपने विकिरणों से जमाने भर के पर्यावरण को  प्रदूषित  करते रहते हैं।

दुनिया भर में ऎसे खूब सारे लोग हैं जो इन लोगों की वजह से परेशान हैं। ये लोग जहाँ भी होते हैं वहाँ बिना किसी कारण के किसी के भी खिलाफ किसी के भी कान फूँक सकते हैं, कहीं भी बारूदी सुरंगें बिछा कर कितने ही पुराने संबंधों को ध्वस्त कर सकते हैं, किसी भी तरह के विध्वंस को अंजाम दे सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि इनसे इन्हें कोई लाभ हो, न हो।

इनका मकसद सिर्फ यही है कि ये लोग औरों को परेशान करने का सुकून पाएँ । सपनों में भी ये लोग दूसरों को दुःखी, पीड़ित एवं तनावग्रस्त करते हुए आनंद रस की प्राप्ति करते रहते हैं और इन्हीं ख्यालों में दिन-रात रहते हैं।

दुनिया में इस विचित्र प्रजाति के लोग हर तरफ बढ़ते जा रहे हैं। असल में इस तरह के लोग अपना ख्याल रखने की बजाय औरों के कामों और व्यवहारों को झाँकने लगे हैं। इसके अलावा उनके पास कोई काम है ही नहीं।

ये लोग इसी काम के लिए पैदा होते हैं और यह सब करते हुए खूब सारे लोगों को दुःखी करते हुए, बद्दुआओं का भण्डार जमा करते हुए अन्तततोगत्वा नरकगमन कर लेते हैं। जीवन के लक्ष्य और सामाजिक लोक व्यवहार से अनभिज्ञ ऎसे नासमझों के लिए इन्हीं की तरह के लोग सर्वत्र सहज ही मिल ही जाते हैं।

यह सब ठीक उसी तरह होता है जैसे कि किसी महानगर के नाले में सीवरेज के छोटे-छोटे स्रोत खुले रहकर एक साथ मिल जाते हैं।  हमारे जीवन में भी ऎसे लोग दिखने में आते हैं और यही वजह है कि मूल्यों का क्षरण होता जा रहा है, भारी पैमाने पर प्रदूषण बढ़ता जा रहा है और आबोहवा में जहर घुलता जा रहा है।

जो लोग अपने जीवन के प्रति एकाग्र नहीं होते, अपनी नहीं सोच कर दूसरों के बारे में सोचते हैं वे लोग भले ही अपने आपको महान और स्वयंभू हो जाने का भ्रम पाल लें, मगर इनकी आत्मा कमजोर रहती है और ये जीवन भर अपराध बोध से ग्रस्त रहा करते हैं।

जीवन में जहाँ कहीं भी हों, वहाँ सिर्फ अपने ही अपने बारे में सोचें, औरों के बारे में ज्यादा चिन्तन नहीं करें, औरों को अपने काम करने दें, दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो अपने से अधिक समझदार, विद्वान और काबिल हैं और अपने से अधिक कर्तव्यनिष्ठ होने के साथ ही इंसानयित से भरे हुए हैं। उन्हें अपने काम करने दें, दुनिया हम तक ही सीमित नहीं है। हमारे पहले भी थी, हमारे बाद भी रहने वाली है।

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